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भारत के हर हिस्से में बन चुकी हैं ‘चिकननेक’


नागरिकता संशोधन कानून बनने के साथ ही देश भर में इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी है। विरोध अगर सिर्फ सरकार के एक फैसले के खिलाफ रहता तो बात समझ में आती, लेकिन अब वो एजेंडे भी सामने आ रहे हैं जो शायद अब तक मुसलमान अपने मन में भीतर ही भीतर रखे बैठे थे।


शरजिल इमाम का पूर्वोत्तर राज्यों को शेष भारत से अलग करने वाला भाषण और उस भाषण का प्रचार सोची समझी रणनीति नजर आता है।


2005 के बाद जैसे जैसे टेलीवीज़न चर्चाओं का प्रभाव बढ़ा है ऐसे मुस्लिम नेता, मुल्ला, मौलवी और मुस्लिम स्कॉलर टेलीवीज़न स्क्रीन पर बढ़ते चले गए जो हिन्दुस्तान के ताने बाने की आड़ में मुस्लिम कट्टरता को बढ़ावा देते हैं। एक ओर मुसलमानों की तरफ से बयानबाजियां होती रहीं तो दूसरी तरफ बांग्लादेश, पाकिस्तान, म्यांमार जैसे देशों से मुसलमानों की घुसपैठ बढ़ती चली गई। बाहरी देशों के मुसलमानों की घुसपैठ उन जगहों पर ज्यादा कराई जहां भारतीय सीमा दूसरे देशों से सटी हुई है।


सिर्फ इतना ही नहीं ऐसे सीमावर्ती इलाकों में मुसलमानों की तादात बढ़ने पर राज्य सरकारों ने ऐसे इलाकों को हिंदू बहुल इलाकों से काटने का भी काम किया।


एक तरफ पूर्वोत्तर के साथ सौतेलों जैसा बर्ताव कांग्रेसनीत सरकारों ने किया तो दूसरी तरफ राज्य सरकारों ने मुसलमानों के वोट पक्के करने लिए परिसीमन का महीन खेल खेला।


पूर्वोत्तर राज्यों और शेष भारत के बीच चिकननेक



शरजिल इमाम ने साफ साफ असम को शेष भारत से काटने के लिए चिकन नेक कहे जाने वाले सिलीगुड़ी गलियारे को बाधित करने की बात की है। यहां से बिहार का किशनगंज जिला कुछ ही दूरी पर है। किशनगंज से बांग्लादेश की दूरी केवल 22 किलोमीटर है। यही वो इलाका है जिससे पूर्वोत्तर के आठ राज्य – सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, मेघालय और असम शेष भारत से जुड़े हैं। ऐसे में इस चिकन नेक के महत्व का अंदाजा लगाना कठिन नहीं है।


सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण किशनगंज बिहार का एक मात्र मुस्लिम बहुल जिला है जिसे लालू प्रसाद यादव ने अपने शासनकाल में पूर्णिया जिला से काटकर बनाया था। आजादी के समय इस जिले का किशनगंज प्रखंड हिंदू बहुल था। 1961 में किशनगंज प्रखंड में मुसलमानों की आबादी 46 प्रतिशत थी जो अब बढ़कर लगभग 61 प्रतिशत हो गई है। बिहार विधानसभा के लिए हुए उपचुनावों में किशनगंज विधानसभा से असद्दुदीन ओवैसी की पार्टी का उम्मीदवार चुनाव जीता है। इसके शक की कोई गुंजाइश नहीं कि बिहार के पूर्वी और बंगाल के उत्तरी पूर्वी जिले घुसपैठ प्रभावित हैं।


पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टों ने मिथ ऑफ इंडिपेंडेस में लिखा है कि पाकिस्तान का भारत के साथ मतभेद केवल कश्मीर को लेकर नहीं है बल्कि असम बंगाल और बिहार के सीमावर्ती जिले जो बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान से सटे हुए हैं उन्हें लेकर भी है। इस कथन के संदर्भ में देखें तो आजादी के बाद जिस प्रकार योजनाबद्ध ढंग से बांग्लादेशी घुसपैठिए भारत आ रहे हैं उसके कारण भारत के लिए खतरा गहराता जा रहा है।


ये जानना और भी महत्वपूर्ण है कि बिहार के किशनगंज और बंगाल के दिनाजपुर, मालदा और मुर्शिदाबाद मुस्लिम बहुल जिले हैं। इन्ही से होकर असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में जाया जा सकता है। वर्ष 1961 का ग्वालपाड़ा जिला आज के ग्वालपाड़ा कोकराझार और बोगाईगांव एवं धुबरी जिलों के रुप में बंट गया है। किशनगंज प्रखंड की तरह ही यहां भी मुस्लिमों की जनसंख्या तेजी से बढ़ी है।


रेलवे-हाइवे-शहर-मोहल्ले-मुसलनमान और चिकननेक


सिर्फ सड़क मार्ग ही नहीं रेल मार्ग से पूर्वोत्तर जाने के लिए भी यही मुस्लिम बहुल रास्ते हैं। कोकराझार के बाद आने वाला प्रमुख स्टेशन बोगाईगांव है जो मुस्लिम बहुल है। बोगाईगांव तेल और प्राकृतिक गैस रिफाइनरी के लिए प्रसिद्ध है। बोगाईगांव जिला 2001 तक हिंदूबहुल था लेकिन फिर वह मुस्लिम बहुल जिला इसलिए हो गया क्योंकि पुराने बोगाईगांव जिले के हिंदूबहुल हिस्से को काटकर एक नया जिला चरांग बना दिया गया। मुस्लिम बहुल जिलो से गैर मुस्लिमों के पलायन का सिलसिला कायम है। बोगाईगांव में 1991 -2001 के बीच हिंदूओं की आबादी मात्र 3.6 प्रतिशत की दर से बढ़ी है।


पूर्वोत्तर राज्यों के लिए न्यू जलपाईगुड़ी रेलवे स्टेशन का महत्व किसी से छिपा नहीं है। भारत चीन सीमा पर तैनात देश के जवान इसी स्टेशन पर आकर ट्रेन पकड़ते हैं। 1999 के कारगिल युद्ध के समय 22 जून को इस स्टेशन पर एक भयानक बम विस्फोट हुआ था जिसमें 10 लोग मारे गए थे और 80 के करीब घायल हुए थे। उस दौरान किशनगंज-न्यू जलपाई गुड़ी के रेलवे ट्रैक पर भी बम रखे गए थे। समय रहते एक किसान की नजर इन विस्फोटकों पर पड़ गई और एक बड़ी दुर्घटना टल गई थी। शरजील इमाम अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में इसी किशनगंज न्यू जलपाईगुड़ी रेलवे लाइन को बाधित करने की बात कर रहा था।


आपके इर्द गिर्द भी बन चुकी हैं चिकननेक


अगर आपको लगता है कि शरजिल इमाम और उस जैसे लोग असम या पूर्वोत्तर की बात कर रहे हैं तो आप गलतफहमी में हैं। अबकी बार जब घर से निकलिये तो नजर डालियेगा आप जिस रास्ते पर जाएंगे मुख्य मार्गों पर और कुछ मिले या मिले मस्जिद जरुर मिलेगी। जाहिर है मस्जिद है तो आस पास मुस्लिम आबादी भी होगी। ताजा अध्ययन से पता चला है कि हिंदुस्तान के ज्यादातर हिंदू इलाकों को मुस्लिम आबादी ने बीते दशकों में ब्लॉक कर दिया है। मुसलमानों की इस ब्लाकिंग से हाइवे तक नहीं बचे हैं। किसी भी नेशनल हाइवे पर एक निश्चित दूरी के बाद हाइवे से सटी मस्जिदों का निर्माण किया गया है ताकि अगर हिंदू पलायन की नौबत आए तो वो भाग भी ना पाए। किसी भी रास्ते पर उसका रास्ता रोका जा सके।


जाहिर है नागरिकता कानून में हुए संशोधन और एनआरसी तैयार करने की चर्चा से डरे घुसपैठियों के वापस बांग्लादेश लौटने की आ रही खबरों से देश में वोटबैंक के सौदागर तिलमिला उठे हैं। भारत को फिर तोड़ने का सपना देख रहे पाकिस्तान परस्त भी अपनी मांद से निकलकर सक्रिय हो गए हैं। दिल्ली का शाहीनबाग हो या लखनऊ का घंटाघर ऐसे धरना स्थलों पर शरजील इमाम और उस जैसे लोग तो एक चेहरा भर है। पर्दे के पीछे ऐसे कई चेहरे छिपे हैं जो पाकिस्तानी नेता जुल्फिकार अली भुट्टटो के सपने को साकार करने के लिए मौके का इंतजार कर रहे हैं।


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर दिए गए शरजील इमाम के बयान को कतई हल्के में नहीं लिया जा सकता। घुसपैठ रोकने और मुस्लिम देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यकों यानी गैर मुस्लिमों के लिए मौजूदा भारत सरकार ने जो रास्ता खोला है उसे नाकामयाब करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय मुस्लिम एजेंडे के तहत ही भारत के भीतर मुसलमानों ने उत्पात और अराजकता मचा रखी है।


(टीम स्टेट टुडे)

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