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“गोवा” जिसकी वजह से भारत का हिस्सा है उसी को भूल गए!


लेख - दीपक मिश्रा

दीपक मिश्रा


गोवा 1498 में पुर्तगाली यात्री वास्कोडिगामा के आने के बाद पुर्तगालियों की दृष्टि में आया। 17वीं शताब्दी के पूर्वाद्ध तक यहाँ पुर्तगालियों का कब्जा हो गया। भारत के आजाद होने के बाद भी गोवा गुलाम रहा और 19 दिसम्बर 1961 को मुक्त हुआ। गोवा की आजादी का सिंहनाद डा0 लोहिया ने किया था।


वहाँ के लोकगीतों में डा0 लोहिया का वर्णन पौराणिक नायकों की तरह होता है। मो0 आजम का यह लेख इसी इतिहास की ओर इशारा करता है। यदि गोवा की आजादी का श्रेय किसी एक व्यक्ति को देना हो तो वे डा0 राममनोहर लोहिया है, जिन्होंने पहली बार गोवा के आजादी के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बनाया और अस्वस्थता के बावजूद गोवा मुक्ति संग्राम की अगुवाई की गिरफ्तारी दी।



गोवा ब्रिटानिया हुकूमत का नहीं पुर्तगाल का उपनिवेश था। 11 अपै्रल 1946 को 20 मई 1944 से गिरफ्तार लोहिया को रिहा किया गया। वे 9 अगस्त 1942 को भूमिगत हुए थे तब से लेकर 11 अपै्रल 1946 तक झंझावातों में रहे, लगभग 4 साल की असहनीय पीड़ा से शरीर का अस्वस्थ होना स्वाभाविक था, ऐसे में उनके गोवा निवासी मित्र जूलियो मैनेजिस ने गोवा आराम करने के लिए बुलाया। श्री मैनेजिस आसोलना में रहते थे। जैसे गोवावासियों को पता चला कि बयालिस के नायक लोहिया आए हैं, कंपन मच गई। प्रसिद्ध नेता पुरुषोत्तम काकोड़कर अपने साथियों के साथ मिलने आए।


15 जून 1946 को पंजिम में डा0 लोहिया की सभा हुई जिसमें तय हुआ 18 जून से 'सविनय अवज्ञा' प्रारम्भ होगा। पुलिस ने टैक्सी वालों को मना कर दिया था, डा0 लोहिया मड़गाँव सभा स्थल घोड़ागाड़ी से पहुँचे। घनघोर बारिश, 20 हजार की जनता और मशीनगन लिए हुए पुर्तगाली फौज। गगनचुम्बी नारों के बीच डा0 लोहिया के ऊपर प्रशासक मिराण्डा ने पिस्तौल तान दिया, लेकिन लोहिया के आत्मबल और आभामण्डल के आगे उसे झुकना पड़ा। पाँच सौ वर्ष के इतिहास में गोवा में पहली बार आजादी का सिंहनाद हुआ।


लोहिया और मैनेजिस गिरफ्तार कर लिए गए। पूरा गोवा युद्ध-स्थल बन गया। पंजिम थाने पर जनता ने धावा बोल कर लोहिया को छुड़ाने का प्रयास किया, एक छोटी लड़की को जयहिन्द कहने पर पुलिस ने काफी पीटा। 21 जून को गवर्नर का आदेश निर्गत हुआ कि आम-सभा व भाषण के लिए सरकारी आदेश लेने की आवश्यकता नहीं। लोहिया चौक पर झण्डा फहराया गया। गोवा को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा पुर्तगाल को तीन माह की नोटिस देकर लोहिया लौट आए।



26 जून 1946 के अंक में महात्मा गांधी ने लेख लिख कर लोहिया की गिरफ्तारी का पुरजोर विरोध किया। तीन महीने पश्चात डा0 लोहिया दोबारा गोवा के मड़गाँव के लिए चले। उन्हें कोलेम में ही गिरफ्तार कर लिया गया। 29 सितम्बर से 8 अक्टूबर तक उन्हें आग्वाद के किले में कैदी बनाकर रखा गया, बाद में अनमाड़ के पास लाकर छोड़ा गया। 2 अक्टूबर को अपने जन्मदिन के दिन 'बापू' ने 'लार्ड बेवेल' से लोहिया की रिहाई के लिए बात की। लोहिया पर गोवा-प्रवेश के लिए मनाही हो गई। नेहरु का रवैया उदासीन रहा। इसीलिए डा0 लोहिया लोकसभा के चुनाव में नेहरु के खिलाफ उतरे और गोवा की आजादी के सवाल को राष्ट्रीय तथा अन्र्तर्राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना दिया।


गोवा के लोकगीतों में डा0 लोहिया का नाम मिलता है।


एक गीत काफी गाया जाता है, ‘‘पहिली माझी ओवी, पहिले माझी फूल, भक्ती ने अर्पिन लोहिया ना।’’


कवि बोरकर की पंक्ति से सभी परिचित हैं ‘धन्य लोहिया, धन्य भूमि यह धन्य उसके पुत्र’।


लेखक दीपक मिश्रा जी वैश्विक हिंदी भाषा के प्रचारक, समाजवादी विचारक राजनीतिक रुप से सक्रिय जनसेवक हैं।


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