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त्रिपुरा में हिंदुओं के खिलाफ गहरी साजिश का भांडाफोड़ होने के बाद एकजुट हुआ हिंदू समाज



त्रिपुरा में हुई हिंसा को लेकर देश में लगातार चर्चा चल रही है। मानवाधिकार संगठनों के अलावा राजनीतिक दल भी अपनी अपनी तरह से इसे भुनाने में जुट गए हैं। कारण साफ है त्रिपुरा में रहने वाले मुस्लिम समुदाय के खिलाफ स्थानीय लोगों का स्वस्फूर्त गुस्सा फूटा तो उनकी सारी हेकड़ी निकाल दी गई।


मीडिया में लगातार ऐसे संगठनों का नाम उछाला जा रहा है जो हिंदू समाज के बड़े संगठन हैं। इसके पीछे भी वजह स्पष्ट है, विपक्ष राष्ट्रविरोधी तत्वों को आड़ देने के लिए हिंसा का सारा दोष हिंदू संगठनों और सरकार पर मढ़ कर भविष्य के लिए ध्रुवीकरण कर रहा है।


बीते दशकों में भारतीय जनता पार्टी और देश के लगभग सभी हिंदू संगठनों को असमाजिक, सांप्रादायिक और अराजक बताकर अब तक ध्रुवीकरण की राजनीति परवान चढ़ती रही है। जिसका फायदा हमेशा से सत्ता में बैठने वाले दल लेते रहे हैं।


उत्तर पूर्व का त्रिपुरा ऐसा राज्य है जहां लंबे समय तक वामपंथियों का शासन रहा। कांग्रेस भी सत्ता का सुख भोगती रही। बड़ी संख्या में बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिमों को राज्य के अलग अलग इलाकों में योजनाबद्ध तरीके से बसाया गया। त्रिपुरा के मूल समाज को धर्मांतरण के जरिए ईसाई और मुस्लिम बनाया गया।



इसके बाद जब वामपंथी सरकार और घुसपैठियों से घिरे त्रिपुरा के लोगों को अपने वजूद की चिंता हुई तो उन्होंने एक झटके में वामपंथी सरकार को उखाड़ फेंका। 9 मार्च 2018 को बिप्लव कुमार देव ने माणिक सरकार का किला भेद दिया और भारतीय जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई।


इस राज्य में बीजेपी की जड़े गहरी करने का काम तत्कालीन त्रिपुरा प्रभारी सुनील देवधर ने किया। जिन्होंने महाराष्ट्र का होते हुए ना सिर्फ त्रिपुरा की स्थानीय भाषा को सीखा बल्कि जन-जन तक संवाद स्थापित किया। जिसका नतीजा ये हुआ कि दशकों से काबिज माणिक सरकार और कांग्रेस की असलियत ना सिर्फ लोगों को समझ आई बल्कि स्थानीय समाज ने खुल कर स्वीकार किया कि त्रिपुरा का मूल खतरे में है लेकिन वामपंथी शासन की क्रूरता और घुसपैठियों के बढ़े हुए मनोबल को तोड़ने का विकल्प लोकतांत्रिक माध्यम से चुनाव के दौरान सत्ता परिवर्तन करके किया जा सकता है।


बिप्लव देव बीते चार वर्षों से ना सिर्फ शानदार तरीके से सरकार चला रहे हैं बल्कि स्थानीय मूल निवासियों का भरोसा जीतकर उनके मन से हर प्रकार के भय को भी निकाल रहे हैं। शासन प्रशासन भी अपने कर्तव्यों को समझकर राष्ट्र और प्रदेश हित में कार्य कर रहा है।


जाहिर है ये शासन विपक्ष को कभी हजम नहीं होना था। इसलिए जब बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए अत्याचार के खिलाफ पूरे भारत में विरोध के सुर तेज हुए तो त्रिपुरा भी इससे अछूता नहीं रहा।



विरोधियों ने इस मौके को तेजी से लपका और त्रिपुरा के मूल हिंदू समाज के खिलाफ घुसपैठियों की मदद से एक बड़ी साजिश रची। साजिश परवान चढ़ती उससे पहले ही सजग हिंदू समाज ने जैसे को तैसे की भाषा में स्वस्फूर्त सबक दे दिया।


जैसे ही त्रिपुरा के मूल निवासियों ने अराजकता फैला रहे मुस्लिमों को सबक सिखाया, मुसलमान एक बार फिर बेचारा बन गया। मानवाधिकार की आवाज बुलंद करने वाले बिलों से बाहर आ गए।


अब हर तरफ त्रिपुरा में हुई हिंसा का रोना रोया जा रहा है। इल्जाम हिंदू समाज के सभ्य संगठनों पर लगाया जा रहा है।



आपको बताते चलें कि पूर्वोत्तर का राज्य त्रिपुरा बांग्लादेश की सीमा से लगा हुआ है। बीते दिनों बांग्लादेश में हिंदुओं का ना सिर्फ व्यापक नरसंहार हुआ बल्कि धर्मस्थल भी तोड़े गए। बांग्लादेश सरकार द्वारा की गई कार्रवाई का होना या ना होना बराबर ही रहा। उधर पश्चिम बंगाल में भी ममता बनर्जी की सरकार बनने के साथ ही हिंदुओं का बड़े पैमाने पर ना सिर्फ नरसंहार हुआ बल्कि कई लाख हिंदू परिवारों को बगल के बीजेपी शासित राज्य असम में शरणार्थी के रुप में जाना पड़ा है।


ऐसी घटनाओं से सबक लेकर अगर त्रिपुरा के लोगों ने समय रहते अपने राज्य और खुद की रक्षा की है तो इसे हिंसा कहना कतई उचित नहीं कहा जा सकता। त्रिपुरा की आबादी करीब चालीस लाख है जिसमें 10 फीसदी के आसपास मुसलमान हैं। जिनमें ज्यादातर ऐसे घुसपैठिये हैं जो बीते 25 सालों में वामपंथी शासन के दौरान घुसपैठ के जरिए भारत में घुसे और हर बार की तरह अपने दस्तावेज बनवा लिए।



क्या है विश्व हिंदू परिषद का पक्ष


विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ नेता पूर्णाचंद्रा मंडल के मुताबिक त्रिपुरा के कुल 51 जगहों पर बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले की घटनाओं को लेकर विरोध प्रदर्शन किए गए थे। सभी जगह शांति बनी हुई थी। हिंसा तब शुरू हुई जब एक प्रदर्शनकारी पर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों ने पत्थर से हमला किया और अशोक कुमार सरकार नाम के एक व्यक्ति को अस्पताल ले जाना पड़ा। पानीसागर पुलिस स्टेशन में इस घटना के बाद अशोक कुमार की पत्नी रानी शिल सरकार ने शिकायत भी दर्ज कराई है।


सबसे बड़ी बात ये है कि हिंसा के बाद जिस फैक्ट फाइंडिंग टीम ने इलाके का दौरा किया और फिर राजधानी अगरतला में प्रेस कांफ्रेंस की उसमें से कई लोग ऐसे हैं जो अब हो रही जांच में षडयंत्रकारी के रुप में सामने आए हैं। चौंकाने वाली बात ये है कि इनमें ज्यादातर वकालत के पेशे से जुड़े हैं और अलग अलग तरह के मानवाधिकार संगठन भी चलाते हैं। जानकारी तो यहां तक मिल रही है कि त्रिपुरा की मस्जिदों से हिंदुओं के खिलाफ जेहाद का ऐलान तक हुआ।


अब क्यों उठ रहे हैं पुलिस की कार्रवाई पर सवाल


अगरतला पुलिस ने अब तक हुई कार्रवाई में आईपीसी की धारा 153ए, 153बी, 469, 471, 503, 504, 120B 153ए, 153बी, 469, 471, 503, 504, 120बी के तहत और गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम की धारा 13 के तहत मामला दर्ज किया है। पुलिस ने अंसार इंदौरी और मुकेश नाम के दो लोगों को नोटिस भेजा है। पुलिस का दावा है कि उनके सोशल मीडिया हैंडल पर किसी दूसरी घटना की तस्वीरें या वीडियो के साथ भ्रामक बातें लिखी गई हैं, जिससे इलाके में सांप्रदायिक तनाव फैल सकता है। ध्यान देने वाली बात है कि ये दोनों शख्स 'लॉयर्स ऑफ़ डेमोक्रेसी' के सदस्य हैं और सुप्रीम कोर्ट के वकीलों की चार लोगों की फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग टीम का हिस्सा भी थे जो हाल ही में राज्य की यात्रा पर आए थे।


इसमें कोई दोराय नहीं है कि विपक्षी राजनीतिक दलों के साथ साथ तमाम मुस्लिम संगठन भी हिंदू समाज से जुड़े संगठनों और त्रिपुरा सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ेगें और ना ही छोड़ रहे हैं। चूंकि इस मामले को तूल देकर बढ़ाने में वकीलों की भूमिका सामने आ रही है इसलिए अदालतों में ये मामला किस तरह की दलीलों और पेंचीदगियों के साथ आगे बढ़ेगा.. ये समझना ज्यादा कठिन नहीं हैं। त्रिपुरा की घटना में हाईकोर्ट ने पूरे मामले का खुद ही संज्ञान ले लिया है जबकि पड़ोस के पश्चिम बंगाल में हिंदुओं पर हुए अत्याचार पर ना तो हाईकोर्ट सनका और ना ही सुप्रीम कोर्ट।


टीम स्टेट टुडे


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