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मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए बनाए गए राजीव गांधी के कानून को झटका - सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला A blow to Rajiv Gandhi's law made for Muslim appeasement - Supreme Court's big decision



सुप्रीम कोर्ट ने आज पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में बने एक बेहद विवादित कानून को बड़ा झटका दिया है। देश की सर्वोच्च अदालत ने तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को भी आपराधिक दंड संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ते की मांग करने का हकदार बताया है। राजीव गांधी सरकार ने शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट के इसी तरह के आदेश को पलटने के लिए नया कानून बना दिया था। आज सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिला (तलाक संबंधी अधिकारों का संरक्षण) कानून, 1986 की सीमाओं को तोड़ते हुए कहा कि महिला चाहे किसी भी धर्म की हो, उसे शादी टूटने पर पति से गुजारा-भत्ता मांगने का हक है। शाह बानो नाम की मुस्लिम महिला को जब सुप्रीम कोर्ट ने पति से गुजारा भत्ता लेने का हकदार बताया था तब मुस्लिम समुदाय के आक्रोश के आगे झुककर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने संसद से उपर्युक्त कानून पारित करवा दिया था।

 

सीआरपीसी की धारा 125 सभी धर्मों पर लागू

ताजा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 सभी धर्म की महिलाओं पर लागू होता है यानी यह एक धर्मनिरपेक्ष प्रावधान है। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कह दिया है कि यह फैसला हर धर्म की महिलाओं पर लागू होगा और मुस्लिम महिलाएं भी इसका सहारा ले सकती हैं। इसके लिए उन्हें सीआरपीसी की धारा 125 के तहत कोर्ट में याचिका दाखिल करने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने यह फैसला सुनाया है। कोर्ट ने इस मामले में 19 फरवरी को फैसला सुरक्षित रखा था।

 

सुप्रीम कोर्ट के सामने आया शाह बानो जैसा केस

दरअसल, यह पूरा मामला तेलंगाना के एक व्यक्ति अब्दुल समद और उसकी तलाकशुदा पत्नी से जुड़ा हुआ है। फैमिली कोर्ट ने अब्दुल समद को 20 हजार रुपये प्रति माह गुजारा भत्ता देने को कहा था। समद ने इसे तेलंगाना हाई कोर्ट में चुनौती दी। तब हाई कोर्ट ने गुजारा भत्ते की रकम आधी करके 10 हजार रुपये प्रति माह कर दी। समद फिर भी संतुष्ट नहीं हुए और हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले आए।

 

 

1986 के कानून का हवाला

उन्होंने अपनी याचिका में दावा किया कि मुस्लिम महिला और इस मामले में उनकी तलाकशुदा पत्नी सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता मांगने की हकदार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में समद के वकील वसीम कादरी ने दलील दी कि दरअसल तलाकशुदा महिला के हितों के लिहाज से सीआरपीसी की धारा 125 से कहीं ज्यादा फायदेमंद मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 है जिसे राजीव गांधी की सरकार ने लाया था। आज राजीव गांधी होते तो सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले का गूंज कुछ ज्यादा होती। मीडिया उनकी प्रतिक्रिया मांगता और विपक्ष हमलावर होता।

 

 

याचिकाकर्ता का दावा- सीआरपीसी से बेहतर है 1986 का कानून

कादरी ने कहा कि मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 की धारा 3 में मेहर, दहेज और संपत्ति की वापसी से संबंधित प्रावधान है और यह किसी भी मुस्लिम महिला के लिए ज्यादा फायदेमंद है। उन्होंने कहा कि 1986 का कानून के तहत मुस्लिम महिला के लिए ताउम्र 'उचित और निष्पक्ष' प्रावधान हैं जो सीआरपीसी की धारा 125 के तहत नहीं है। समद के वकील ने यह भी दलील दी कि अपना भरण-पोषण करने में स्वयं सक्षम तलाकशुदा महिला सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ते की मांग नहीं कर सकती है जबकि 1986 का कानून सक्षम महिला को भी अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता मांगने का अधिकार देता है।

 

 

सीआरपीसी मुस्लिम महिला पर भी लागू

इसके जवाब में एमिकस क्यूरी गौरव अगरवाल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ किसी महिला से सीआरपीसी के तहत राहत पाने का उसका अधिकार छीन नहीं सकता है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने एमिकस क्यूरी की दलील मानते हुए अब्दुल समद की याचिका खारिज कर दी और हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया।

 

 

शाह बानो केस को पलटने राजीव सरकार ने लाया था कानून

सुप्रीम कोर्ट ने ही 1985 में शाह बानो केस में कहा था कि सीआरपीसी की धारा 125 हर किसी पर लागू होता है, चाहे वह किसी भी धर्म से हो। लेकिन राजीव गांधी की सरकार ने 1986 का कानून बनाकर लागू कर दिया ताकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर रोक लग जाए। नए कानून में कहा गया कि मुस्लिम महिला तलाक के बाद सिर्फ इद्दत के 90 दिनों तक गुजारा भत्ता पाने की हकदार होती है। 2001 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस कानून पर अपना मुहर लगाया था।

 

 

सुप्रीम कोर्ट ने समझाया पूर्व पति का दायित्व

लेकिन अब जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस मसीह की पीठ ने स्पष्ट कर दिया कि सीआरपीसी की धारा 125 धर्मनिरपेक्ष प्रावधान है जिस पर कोई पर्सनल लॉ हावी नहीं हो सकता है। यानी, मुस्लिम समाज के लिए राजीव गांधी सरकार का लाया कानून साफ-साफ दरकिनार हो गया है। पीठ ने यह भी कहा कि जब तक महिला की दूसरी शादी नहीं हो जाती या वो खुद सक्षम नहीं हो जाती है तब तक उसके भरण पोषण का खर्च उठाना उसके पूर्व पति का दायित्व है।

 

 

गुजारा भत्ता तलाकशुदा महिला का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट

कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि भरण पोषण का खर्च उठाना कोई दयालुता नहीं बल्कि तलाकशुदा महिला का अधिकार है। जस्टिस नागरत्ना ने कहा, 'कुछ पतियों को पता ही नहीं कि पत्नियां जो गृहिणी हैं, वो उन पर भावनात्मक और अन्य दूसरे रूप से भी उन्हीं पर निर्भर होती हैं। समय आ गया है कि भारतीय पुरुष गृहणियों की भूमिका और उनके त्याग को जरूर समझें।'

 

 

अब 1986 के कानून का क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने अब्दुल समद केस में यह भी कहा कि सीआरपीसी के सेक्शन 125 के तहत याचिका सुनवाई के अधीन हो तो इस दौरान मुस्लिम महिला (निकाह संबंधी अधिकारों का संरक्षण), 2019 के तहत भी राहत की मांग की जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई मुस्लिम महिला अगर दोनों कानूनों से संरक्षण देने की मांग करती है तो उसे दोनों कानूनों से संरक्षण दिया जा सकता है। इस तरह देखें तो मुस्लिम महिलाओं को सीआरपीसी, 1986 और 2019 तीनों कानूनों से संरक्षण प्राप्त करने का अधिकार मिल गया है। अगर कोई मुस्लिम महिला 1986 के कानून के तहत भरण पोषण मिलने से संतुष्ट नहीं है तो वह सीआरपीसी के तहत भी खर्चे की मांग कर सकती है। मतलब 1986 का कानून रद्द नहीं हुआ है, वह भी अपनी जगह कायम है।

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