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स्वराज्य भारत की प्राचीन धारणा है-हृदयनारायण दीक्षित



हृदयनारायण दीक्षित


स्वराज्य भारत की प्राचीन धारणा है। ऋग्वेद (5.66.6) में मित्र और वरूण देवों से स्तुति है “हे दूरद्रष्टा मित्रवरूण हम आपकी स्तुति-आवाहन करते हैं। हम देवों द्वारा संरक्षित स्वराज्य प्राप्त करें - यतेमेहि स्वराज्ये।” स्वराज्य और स्वतंत्रता 5-6 सौ बरस पहले के यूरोपीय पुनर्जागरण काल की देन नहीं है। ऋग्वेद का एक पूरा सूक्त (1.80) स्वराज्य की कामना है। यहां इन्द्र स्वराज्य की कामना करने वाले लोगों के सहायक हैं। इन्द्र स्वराज्य के लिए कूटनीति का भी सहारा लेते हैं - माययाव धीरर्चनु स्वराज्यं। (1.80.7) इस सूक्त के सभी 16 मन्त्रों के अन्त में “अर्चन् अनु स्वराज्यम्” है। स्वराज्य प्राथमिक आवश्यकता है। स्वराज्य न हो तो पराधीनता का दुख दंश देता रहता है। पराधीन सपनेहु सुख नाही। स्वराज के अभाव में स्वभाव का दमन होता है। स्वभाव में ही स्वछंद उगते हैं। प्रकृति संस्कृति बनती है। भारत में वैदिक काल से ही स्वराष्ट्र का भाव था। धरती माता और आकाश पिता थे। लेकिन विदेशी हमलावरों ने भारत का अवनिअम्बर आहत किया। विवेकानंद, अरविन्द, गांधी, सुभाष चन्द्र, जे0पी0, डॉ0 लोहिया एक स्वतंत्र सनातन प्रवाह के तीर्थ बने। ऐसे लाखों उपासकों ने स्वराष्ट्र, स्वराज और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किये, प्राण दिये। स्वाधीनता संग्राम में सारा देश लड़ा था लेकिन श्रेय कांग्रेस ले गयी।


15 अगस्त 1947 से लेकर आज तक 75 वर्ष बीत गए हैं। 1942 की क्रांति ने ब्रिटिश सरकार के छक्के छुड़ा दिए थे। 9 अगस्त 1942 के दिन ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की घोषणा हुई। पूरे देश में व्यापक हिंसा हुई। संयोग है कि 5 वर्ष बाद अगस्त में ही 15 तारीख को भारत स्वाधीन भी हुआ। कांग्रेस कार्यकारिणी (1954) ने एक प्रस्ताव द्वारा अगस्त क्रांति में हुई तोड़फोड़ की निंदा की। इसे दिशाहीन पथ विचलन बताया। प्रस्ताव में प्रमुख कांग्रेसी नेताओं की गिरफ्तारी के कारण भारत की जनता को ‘मार्गदर्शन विहीन’ शब्दों से नवाजा गया। अगस्त क्रंाति के दो प्रमुख नेताओं अच्युत पटवर्धन व अरूणा आसफ अली ने कांग्रेस अध्यक्ष को पत्र लिखा - “आपने जानबूझकर इस तथ्य की अवहेलना की है कि हम लोगों ने आपकी गैरमौजूदगी में दिशा और मार्गदर्शन प्रस्तुत करने का संकल्पपूर्ण प्रयास किया। आपकी राय में अपनाए गए तौर-तरीके अहिंसा की कांग्रेसी नीति से सुसंगत नहीं रहे। जिनके प्राण गए उनकी शहीदी तारीफें, लेकिन उनके कार्य की निंदा विरोधाभासी है।” (कांग्रेस एंड दि क्विट इंडिया मूवमेंट, एसआर बख्शी, पृ0 237-44)


‘अगस्त क्रांति’ जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, डॉ0 राममनोहर लोहिया और अरूणा आसफअली जैसे समाजवादी नेताओं की रणनीति से ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने में कामयाब हुई। महात्मा गांधी ने अगस्त, 1944 में कहा था - “9 अगस्त, 1942 का दिन मैंने आत्मनिरीक्षण और समझौते के लिए बातचीत का सूत्रपात करने के लिए निश्चित किया था, लेकिन सरकार व भाग्य ने कुछ और ही सोच रखा था ...... तोड़फोड़ और बहुत सारी चीजें कांग्रेस अथवा मेरे नाम पर की गई।” (संपूर्ण गांधी वाड्.मय 78/12) कांग्रेस ने क्रांति कर्म को ही गलत बताया। आन्दोलनकारी नेताओं की गिरफ्तारी के बाद मुंबई सरकार की आंखों में धूल झोंककर देश को एक कार्यक्रम दिया। वे ही अंत तक आंदोलन की ज्योति को जलाए रखने वाले भी थे।” दरअसल भारतीय स्वाधीनता संघर्ष के लिए 1920-30 के बीच के 10 वर्ष महत्त्वपूर्ण हैं। इस दशक में कांग्रेस मृतप्राय थी। गांधी भी करीब-करीब अलग थे, लेकिन कांग्रेस ने इसी दशक के आखिर (1929) में पूर्ण स्वराज की मांग की। इसकी मोटामोटी 6 वजहें थीं: ब्रिटेन में लेबर पार्टी जीती। भारत के कथित मित्र रेम्जे मेक्डोनाल्ड प्रधानमंत्री बने। वायसराय ने अक्टूबर 1929 में घोषणा की कि साइमन रिपोर्ट के बाद सर्वदलीय गोलमेज सम्मेलन होगा। (2) इसी दशक के मध्य (1925) में एक प्रख्यात क्रांतिकारी नेता डॉ के0बी0 हेडगेवार ने राष्ट्रवाद के विचार पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बनाया। संघ देखते ही देखते राष्ट्रीय फलक पर था। (3) भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के क्रांतिधर्म से भारत का अवनि अंबर आंदोलित था। (4) कांग्रेस के भीतर समाजवादी विचार के नेताओं/कार्यकर्ताओं का दबाव बढ़ा। (5) स्वतः स्फूर्त कारणों से किसान मजदूर आंदोलन बढ़े और (6) इन सबके चलते कांग्रेस से मोहभंग का वातावरण बना। कांग्रेस के सामने अस्तित्व का संकट था। उसने दिसंबर 1929 में पूर्ण स्वराज की मांग की। सिर्फ 25 दिन बाद (26 जनवरी, 1930) प्रथम स्वतंत्रता दिवस भी मना डाला। सविनय अवज्ञा आंदोलन चला। गांधी की गिरफ्तारी हुई, लेकिन आंदोलन की घोषणा और समझौता कांग्रेसी नीति के अंग थे। गांधी-इरविन वार्ता में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी न देने का भी मुद्दा था। इरविन ने साफ मना किया तो कांग्रेस और गांधी जी ने यह मुद्दा छोड़ दिया। फांसी के 6 दिन बाद कराची कांग्रेस अधिवेशन में गांधी और कांग्रेस को लेने के देने पड़ गए।


मजबूरन शहीदों के पक्ष में एक गांधीवादी प्रस्ताव आया, “किसी भी तरह की राजनैतिक हिंसा से अपने को अलग रखते हुए और उसे अमान्य करते हुए कांग्रेस बलिदान के प्रति अपनी प्रशंसा व्यक्त करती है।” क्रांति कर्म की निंदा और बलिदान की प्रशंसा कांग्रेस का इतिहास है। भगत सिंह उस वक्त गांधीजी की ही तरह लोकप्रिय थे।

कांग्रेसी इतिहास के अधिकृत लेखक गांधी भक्त पट्टाभिसीतारमैय्या के अनुसार - “भगत सिंह का नाम सारे देश में गांधी जी की ही तरह लोकप्रिय था।” ‘भारत छोड़ो’ आंनदोलन का नेतृत्व भी कांग्रेस ने गांधीजी को ही सौंपा। अ0भा0कांग्रेस की बैठक (मुंबई 7 अगस्त, 1942) में जवाहरलाल नेहरू ने प्रस्ताव रखा। इसके अगले दिन 8 अगस्त, 1942 को गांधीजी ने सवा घंटे के भाषण में कहा - “आपने अपने सारे अधिकार मुझे सौंप दिए। अब मैं वायसराय से मिलकर कांग्रेस की मांग स्वीकार करने का अनुरोध करूंगा।” हालांकि 9 अगस्त की सुबह के पहले सारे विरष्ठ कांग्रेसी गिरफ्तार कर लिए गए। आगे का आंदोलन समाजवादियों ने चलाया। कांग्रेस बेहद कमजोर थी। सन् 42 के पहले के गांधी विचार इसका खुलासा करते हैं। गांधीजी विश्वयुद्ध में अंग्रेजों की बेशर्त सहायता के पक्षधर थे। उन्होंने अक्टूबर 1941 में लिखा - “यदि हम इस अवस्था में सरकार को परेशानी में डालेंगे तो सत्ताधारी निश्चय ही इसका बुरा मानेंगे।” (सम्पूर्ण गांधी वाड्.मय 75/66) 21 जून, 1940 को कांग्रेस कार्यसमिति ने भावी कार्यक्रमों और नीतियों की जिम्मेदारी से गांधीजी को मुक्त कर दिया, लेकिन गांधी जी कांग्रेस से जुड़े रहे। 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के ठीक 8 माह पूर्व 30 दिसंबर, 1941 को कार्यसमिति ने उन्हें दोबारा मुक्त किया। गांधी कांग्रेस से अलग हो गए। अगस्त 42 के आंदोलन के एक माह पूर्व 5 जुलाई को उन्होंने चक्रवर्ती राजगोपालचारी को कांग्रेस छोड़ने के लिए आग्रह पत्र लिखा।


गांधी जी ने कहा - “कांग्रेस के भीतर अनुशासनहीनता और हिंसा भरी है।” जो कांग्रेस गांधीजी के लिए अनुशासनहीन और भारत छोड़ो आंदोलन के एक माह पहले तक त्याज्य थी उसी कांग्रेस को लेकर कांग्रेस ऐतिहासिक ‘अगस्त क्रांति’ नहीं ही कर सकती थी। अंग्रेजीराज की केन्द्रीय असंेबली में एक सवाल के जवाब में बताया गया, “9 अगस्त से 31 दिसंबर, 1942 के बीच 940 लोग पुलिस/सेना की गोली से मारे गए। 60,229 गिरफ्तार हुए। 18000 नजरबंद किए गए और 1630 घायल हुए। 538 स्थानों पर पुलिस फायरिंग हुई। 60 स्थानों पर फौजी कार्रवाई हुई। इतिहासविद् प्रोफेसर विपिन चंद्रा ने लिखा - “आंदोलन की बागडोर अच्युत पटवर्धन, अरूणा आसफअली, डॉ0 लोहिया, सुचेता कृपलानी, बीजू पटनायक और जेल से छूटने के बाद जयप्रकाश पर थी। ..... ये गुप्त समूह मुंबई, पूना, सतारा, बड़ौदा, कर्नाटक, केरल, आंध्र, यूपी, बिहार और दिल्ली में सक्रिय थे।” श्रेय कांग्रेस ने लिया। भारतीय जनता प्रति वर्ष स्वतंत्रता दिवस मनाती है। अगस्त क्रांति भारतीय राष्ट्रभाव का शक्ति प्रदर्शन था। लेकिन अंग्रेजों ने जीती हुई बाजी को पलट दिया। नेताओं ने भारत विभाजन पर हस्ताक्षर बनाये। देश बंट गया। स्वाधीनता दिवस ही विभाजन दिवस भी बना। हम सब संकल्प ले कि भारत अब एक रहेगा। राष्ट्रीय एकता अक्षुण्ण रहेगी।


टीम स्टेट टुडे




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