क्यों है पत्रकारों के देवता 'देवर्षि नारद' पहले आद्य पत्रकार



आद्य पत्रकार देवर्षि नारद का जन्म/ अवतरण ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया को हु आ था। उन्हें ब्रम्हा जी के मानस पुत्र के रूप में जाना जाता है। सभी पुराणों में देवर्षि नारद एक प्रमुख भूमिका में दिखाई देते हैं उन्हें देवर्षि की संज्ञा दी गयी। उनकी मित्र, सलाहकार देव दानवों के बीच अलग पहचान है। इसी कारण पुराणों में नारद जी को भागवत संवाददाता के रुप मे प्रस्तुत किया गया है। तो वहीं हमारी संक्कृति में नारद जी का एक विशिष्ट चरित्र एवं स्थान है। हमारी ऋषि परम्परा और लोक परम्परा दोनों परंपराओं के इतिहास में उनकी समान लोकप्रियता है। देवर्षि नारद सूचना के सम्प्रेषण अथवा प्रसारक होने के साथ साथ नारद पुराण, नारद स्मृति, नारदीय ज्योतिष आदि ग्रंथों के रचयिता थे। वीणा नामक वाद्ययंत्र का उन्होंने आविष्कार किया। नारद जी संगीत शास्त्र के श्रेष्ठ ज्ञाता थे। वे सूचनाओं के संवाहक , धर्मशास्त्रो के सृजनकर्ता, देव दैत्य सभी के मित्र, सर्वलोक हितकारी तथा इंद्रलोक के स्वतंत्र पत्रकार हैं।


कुछ लोगो के मन में यह प्रश्न अवश्य उठ सकता है कि नारद आद्य पत्रकार कैसे ? इस प्रकार के प्रश्नकर्ता के मन में समाचार पत्र, पत्रिका , रेडियों एवं टेलीवीजन की सूचना से जुड़ा पत्रकार समाया है। इस कारण उनके मन में प्रश्न स्वाभाविक है लेकिन जब पत्रकारिता के व्यवहार पक्ष पर विचार करेंगे तो उनका भ्रम स्वत समाप्त होगा। देवर्षि नारद वास्तव में आद्य पत्रकार थे क्योंकि वे पत्रकार का काम करते थे। पत्रकारिता वास्तव में पत्रकार के व्यवहार से जुड़ा कार्य है। वर्तमान में पत्रकारिता के अंतर्गत पत्रकार – सूचना के संग्रह सूचना के संपादन एवं सूचना को भेजने का कार्य करते हैं। आद्य पत्रकार नारद जी भी तीनों लोगों की सूचना के संग्रह, संपादन एव सूचना के भेजने का कार्य करते थे इस कारण वे पत्रकार ही थे। उनकी पत्रकारिता सज्जन रक्षक एव दुष्ट विनाश की थी। समुद्र मंथन में विष निकलने की सूचना सर्व प्रथ्म आद्य पत्रकार नारद जी ने मंथन में लगे पक्षों को दिया , परन्तु सूचना पर ध्यान ना देने से विष फैला।


आद्य पत्रकार नारद जी ने सती द्वारा दक्ष के यज्ञ कुंड में शरीर त्यागने की सूचना सर्वप्रथम भगवान शिव को दी। नारद जी ने एक पत्रकार के रुप में जगन्नाथ की रथ यात्रा को प्रारंभ कराया । महाभारत युद्ध समाप्ति की सूचना बलराम जी को दी। इतना ही नहीं पत्रकार के रुपमें काशई, प्रयाग, मथुरा , गया, बद्रिकाश्रम, केदारनाथ, रामेश्वरम सहित सभी तीर्थों की सीमा के महत्व का वर्णन किया है। पुराण समीक्षा भी आज पुस्तक समीक्षा का श्रेष्ठ उदाहरण है। नारद जी ने समीक्षा के दौरान सही उत्तर देने वालों पर पुरस्कार देने की परंपरा प्रारंभ की। इसी कारण नारद जयंती पर पत्रकारों को सम्मानित करने का काम संघ के प्रचार विभाग ने प्रारंभ किया।



आद्य पत्रकार नारद जी ने वर्तमान के पत्रकारों के लिए जो मानक रखे हैं उनका विवेचन आवश्यक है। उन्होंने माया के ज्ञान के लिए एक बार स्त्री रुप धारण किया। यह उनकी अनुभवात्मक पत्रकारिता का श्रेष्ठ उदाहरण है। उन्होंने मृत्यु का भी जीवन व्रत लिखा है जो दुनिया में अन्यत्र नहीं है। कलियुग में धर्म की रक्षा एवं समाचरण के लिए सत्यनारायण कथा को प्रकट किया तथा लोक विस्तार दिया। महर्षि वाल्मीकि को रामायण लेखन की प्रेरणा दी। महर्षि वेद व्यास को भगवान श्री कृष्ण के चरित्र का गुणगान करने के लिए भगवत गीता को लिखने को प्रेरित किया। साथ ही इंद्रप्रस्थ एवं कुरुक्षेत्र के नामकरण के इतिहास का भी वर्णन है। आद्य पत्रकार नारद की पत्रकारिता आध्यात्म पर आधारित थी। उन्होंने स्वार्थ, लोभ एवं माया के स्थान पर हमेशा परमार्थ को श्रेष्ठ माना है।

आद्य पत्रकार नारद जी ने सृष्टि के प्रारंभ मे ही पत्रकारिता के समक्ष जो आदर्श एवं स्वरुप प्रस्तुत किया उस पर स्वतंत्र अध्ययन आवश्यक है। हमें आद्य पत्रकार के रुप में नारद जी के योगदान को सदा याद रखना होगा। महान विपत्ति से मानवता की रक्षा का कार्य किया। एक समय जब अर्जुन दिव्यास्त्रों का परीक्षण करने जा रहे थे उस समय नारद जी ने अर्जुन को ऐसा करने से रोका और अर्जुन को समझाते हुए कहा क दिव्यास्त्र परीक्षण व प्रयोग की वस्तु नहीं हैं। इसका प्रयोग आसुरी शक्तियों से सृष्टि की रक्षा के लिए किया जाना चाहिए. इस प्रकार नारद जी ने सुचिता के साथ पत्रकारिता के कार्यों का निर्वहन किया। इसी कारण देवर्षि नारद का पत्रकार व्यवहार श्रेष्ठ एवं सर्वोत्तम है। उनकी पत्रकारिता में आदर्शों की खोज या आदर्श प्तरकार की पहचान ही हमें दवर्षि नारद तक ले जाती है। खबर लेने देने या संवाद रचना में जो आदर्श और परम्परा को नारद जी ने स्थापित किया वह आज की पत्रकारिता के लिए आदर्श हो सकती है।


नारद की पत्रकारिता लोक कल्याणकारी थी लेकिन वर्तमान समय में आज की पत्रकारिता अपने आधुनिक कलेवर में एख व्यवसाय बन कर दिखाई देती है। लेकिन फिर भी इसके लिए आदर्शों की तलाश तो करनी ही होगी। आदर्शों के बिना पत्रकारों के फिसलने का खतरा बना रहेगा। नारदीय परंपरा पत्रकारिता के उन्हीं आदर्शों में है जिन्हें देवर्षि नारद ने युगों पहले देवलोक , पृथ्वीलोक में स्थापित कर चरैवेति चरैवेति यहीं तो मंत्र अपना को साकार कर तीनों लोगों की खबरों को अपने पास रखते थे और भेजते थे।



राजेंद्र सक्सेना (विश्व संवाद केंद्र, वाराणसी)
राजेंद्र सक्सेना (विश्व संवाद केंद्र, वाराणसी)

आज पूरे देश में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रचार विभाग के आयाम विश्व संवाद केंद्र द्वारा भारी संख् में नारद जयंती , नारद पत्रकारिता सम्मान समारोह एवं नारद जी पर विचार गोष्ठियां हो रही हैं तो देश के तथाकथित सेक्युलर लोग, पत्रकार इस आयोजन को भगवाकरण के रुप में देखने लगे और नारद यतंती को हंसी का पात्र मानकर विवाद का पर्याय मानते थे लेकिन धीरे धीरे संपूर्ण भारत में बल्कि उत्तर भारत में ज्येष्ठ द्वितीया को नारद जयंती विश्व हिंदी पत्रकारिता दिवस, पत्रकार स्मान सफलता पूर्णक संपन्न होने लगे तो वही सेकुलर जो नारद जयंती को भगवाकरण करते थे वे सव्यं नारद जयंती कार्यक्रम में आने लगे।


आप सभी को ज्ञात होना चाहिए कि संघ स्थापना के 99 वर्ष पूर्ण कानपुर के निवासी पंडित युगल किशोर तिवारी ने कोलकाता से पहला हिंदी समाचार पत्र उद्दंड मार्तण्ड 30 मई 1826 को प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने अपनी संपादकीय में लिखा है कि यह पत्र आदि पत्रकार नारद जी को समर्पित है। आज 3- मई 1826 को ज्योष्ठ कृष्ण द्वितीया तिथि नारद जयंती है। आज की सेकुलर पत्रकार 30 मई को हिंदी दिवस मनाती है लेकिन नारद जयंती मनाने में भगवाकरण दिखाई देता है। विश्व संवाद केंद्र लखनऊ में सन 1998 को देवर्षि नारद जयंती का पहला कार्यक्रम उस समय के क्षेत्र प्रचार प्रमुख निवर्तमान खिल भारतीय प्रचार प्रमुख रहे स्मृति शेष श्री अधीश कुमार जी के उपस्थिति में सम्पन्न हुआ। तब से आज तक पूरे देश में हजारों स्थानों पर ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया को नारद जयंती , नारद सम्मान, विश्व पत्रकारिता दिवस को भारी संख्या में प्रसिद्धि मिली है।


संकलन कर्ता

राजेंद्र सक्सेना

विश्व संवाद केंद्र , माधव कुंज, वाराणसी

ई मेल- rajendra20668@gmail.com