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इस प्रकार कीजिए पूजा करने के बाद दुर्गा प्रतिमा व कलश का विसर्जन


मंजू जोशी, ज्योतिषाचार्य

आप सभी श्रेष्ठ जनों को शुभ संध्या सादर प्रणाम दिनांक 11 अप्रैल 2022 दिन सोमवार चैत्र शुक्ल पक्ष दशमी तिथि को नवरात्रि व्रत का पारण एवं कलश विसर्जन किया जाएगा। आइए जानते हैं कलश विसर्जन की पूर्ण विधि-:

माता रानी की 9 दिनों तक श्रद्धा पूर्वक पूजा अर्चना करने के बाद अब बारी आती है कलश विसर्जन और देवी विसर्जन की जैसे हमारे घर में कोई अतिथि आते हैं हम उनका आतिथ्य करने के उपरांत उनको सम्मान पूर्वक विदा करते हैं ताकि वह प्रशन्न होकर विदा हो उसी प्रकार हमें माता रानी को नौ दिनों तक पूजा अर्चना करने के उपरांत बहुत आदर सत्कार से उनका विसर्जन करना चाहिए। फिर सभी जातकों के मन में सवाल यह आता है कि कलश विसर्जन किस दिन करना चाहिए कई जातक कलश विसर्जन नवमी के दिन करते हैं जो कि शास्त्र संगत नहीं है क्योंकि नौ रात्रि पूर्ण होने के उपरांत ही कलश का विसर्जन किया जाता है यानी कलश विसर्जन दशमी तिथि करना चाहिए। नवमी को केवल कन्या पूजन हवन इत्यादि कीजिए।

मूहूर्त

दशमी तिथि को प्रातः काल 6 बजे से 11 बजे तक कलश विसर्जित कर सकते हैं।

आइए जाने इसकी पूजन विधि

माता की प्रतिमा व स्थापित कलश पर रोली कुमकुम , गंध, अक्षत, पुष्प, आदि से पूजा करें व भोग अर्पित करें तथा इस मंत्र से देवी की आराधना करें।

रूपं देहि यशो देहि भाग्यं भगवति देहि मे।

पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वान् कामांश्च देहि मे।।

महिषघ्नि महामाये चामुण्डे मुण्डमालिनी।

आयुरारोग्यमैश्वर्यं देहि देवि नमोस्तु ते।।

आपको बताना चाहूंगी कलश में जो पूजा सामग्री रखी होती है उन सभी वस्तुओं का क्या करना होता है (नारियल को अपने माथे पर लगाए और नारियल-चुनरी आदि अपने घर पर सुहागन महिलाओं को दे सकते हैं । इसके बाद कलश लेकर आम के पत्तों से कलश के जल को अपने घर के चारों कोनों पर छिड़किए। ( प्रशाद रूप में भी जल को ग्रहण कर सकते हैं) सबसे पहले रसोई घर में छिड़कें, क्योंकि माना जाता है कि यहां लक्ष्मी जी का वास होता है। इसके बाद, अपने शयन कक्ष में, तत्पश्चात पूरे घर और अंत में घर के प्रवेश द्वार पर छिड़किए परंतु बाथरूम में जल न छिड़कें। बचे जल को तुलसी के पेड़ पर अर्पण कर दें। जो सिक्का कलश में डाला हो, उसको अपनी तिज़ोरी में रख लें। कलश पर बंधे कलावे को अपने हाथ पर बांध सकते हैं और गले में पहन सकते हैं। यह देवी का सिद्ध रक्षाकवच कहलाता है जो हर मुसीबत से रक्षा करता है। यह सूत्र घर के सब सदस्य पहन सकते हैं। इस तरह नवरात्र व्रत का पारायण संपन्न होता है। नवमी व दशमी तिथि को व्रत का पारायण करने वाले इस विधि से कलश विसर्जन करेंगे तो उनको लाभ प्राप्त होगा। बता दें कि अष्टमी या नवमी तिथि को व्रत पारायण करने वालों को अखंड ज्योति को दशमी तिथि के पूजन तक प्रज्जवलित रखना चाहिए। क्योंकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दशमी तिथि को भगवान राम ने अपराजिता देवी का पूजन किया था।)

इस प्रकार प्रार्थना करने के बाद हाथ में चावल व फूल लेकर देवी भगवती का इस मंत्र के साथ विसर्जन करें।

गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठे स्वस्थानं परमेश्वरि।

पूजाराधनकाले च पुनरागमनाय च।।






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