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Haryana में मुख्यमंत्री का चेहरा बदलने से बदल गए यूपी की सियासत में समीकरण, नायब सिंह सैनी को सौंपी गई कमान – जानिए ये क्यों हुआ और कैसे हुआ !!   



हरियाणा को 56 साल बाद अन्य पिछड़ा वर्ग से नायब सैनी  के रूप में मुख्यमंत्री मिला है। मध्य प्रदेश में मोहन लाल यादव के बाद हरियाणा दूसरा ऐसा राज्य है  जहां भाजपा ने अन्य पिछड़ा वर्ग से मुख्यमंत्री दिया है। भाजपा के इस दांव से कांग्रेस नेता राहुल गांधी का जातीय कार्ड खेलने की रणनीति को गहरा धक्का लगा है।

 

1967 से हरियाणा को अब मिला OBC सीएम


पहली नवंबर, 1966 को हरियाणा अस्तित्व में आया था। 1967 में पहली बार ओबीसी से राव बिरेंद्र सिंह ने हरियाणा के दूसरे मुख्यमंत्री और ओबीसी वर्ग के पहले मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली थी।


हरियाणा में ओबीसी की संख्या करीब 33 प्रतिशत है, जो किसी भी चुनाव में राजनीतिक दलों की हार जीत का बड़ा कारण बनते हैं। जबकि मनोहर लाल के नेतृत्व में पंजाबियों को पार्टी से जुड़ने का काफी लाभ मिलने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

 

गुरुग्राम में ही नायब को मिल गया था इशारा


द्वारका एक्सप्रेस-वे के गुरुग्राम खंड के लोकार्पण कार्यक्रम के दौरान सोमवार को पूर्व मुख्यमंत्री मनोहरलाल ने प्रदेश अध्यक्ष नायब सिंह सैनी से कहा था- मेरे साथ चंडीगढ़ चलो। अपनी सुविधा के अनुसार शाम तक पहुंच जाओ। चंडीगढ़ में मंगलवार सुबह जरूरी मीटिंग है। इसमें उनका रहना जरूरी है। किस बारे में मीटिंग बुलाई गई है यह नहीं बताया। एक्सप्रेस-वे के लोकार्पण कार्यक्रम में प्रधान नरेन्द्र मोदी से इशारा मिलने बाद पूरा घटनाक्रम तेजी आगे बढ़ता गया। मनोहर लाल को पहले से ही इसकी जानकारी थी।

 

आप मेरे साथ चलें- नायब सैनी से बोले मनोहर लाल


नायब सैनी गुरुग्राम से रात आठ बजे कुरुक्षेत्र स्थित अपने कार्यालय पहुंचे थे। कुरुक्षेत्र में कुछ जरूरी काम निपटा कर रात 10 दस बजे चंडीगढ़ के लिए रवाना हो गए। तब तक नायब सैनी को भी नहीं पता था कि मीटिंग किस बारे में है।


मंगलवार को हुई मीटिंग के बाद ही नायब सैनी के मुख्यमंत्री बनने की घोषणा हुई। मंगलवार शाम उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। जननायक जनता पार्टी (JJP) और बीजेपी का गठबंधन टूटने के बाद मनोहर लाल खट्टर ने राज्यपाल को सुबह ही अपना इस्तीफा सौंप दिया। चंद घंटों के भीतर ही पूरे राज्य की सियासत ही बदल गई। हाल के दिनों में जिस तरीके से बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व में जो बड़े फैसले हुए हैं उसके बाद हरियाणा वाले फैसले पर लोगों को कम आश्चर्य हो रहा है। हालांकि इस बदले हुए राजनीतिक घटनाक्रम में एक चर्चा और भी तेज है कि क्या दुष्यंत चौटाला की ओर से लोकसभा में अधिक सीटों की मांग की वजह से गठबंधन टूटा या कोई और भी कारण है। बीजेपी ने न केवल लोकसभा बल्कि हरियाणा में जल्द होने वाले विधानसभा चुनाव की ओर भी कदम बढ़ा दिए हैं।

 

एंटी इनकम्बेंसी वाले फैक्टर को कर दिया दूर


साल 2014 में बीजेपी की जीत के बाद मनोहर लाल खट्टर को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया। उस वक्त भी कई लोगों को इस पर आश्चर्य हुआ। मनोहर लाल खट्टर ने अच्छे से सरकार चलाई लेकिन 2019 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को पहले के मुकाबले कम सीटें हासिल हुई। राज्य में बीजेपी और जेजेपी की मिलकर सरकार बनी। मनोहर लाल खट्टर दोबारा सीएम बने और दुष्यंत चौटाला राज्य के डिप्टी सीएम। 9 वर्षों के दौरान राज्य में किसान आंदोलन और कुछ दूसरे मुद्दों को लेकर खट्टर सरकार के खिलाफ एंटी इनकम्बेंसी बनने लगी थी। कुछ चुनावी सर्वे में भी यह बात सामने आई। ऐसा लगता है कि एंटी इनकम्बेंसी को दूर करने के लिए पार्टी ने नए सीएम पर विचार किया है। ऐसा प्रयोग बीजेपी उत्तराखंड और गुजरात में कर चुकी है।

 

जाट- गैर जाट के बीच बीजेपी का यह कार्ड


हरियाणा की राजनीति इस वक्त जाट और गैर जाट के बीच बंटी नजर आ रही है। ऐसा नहीं कि यह हाल के दिनों में हुआ है। यह कहानी कई साल पहले की है। जाट वर्ग का अधिक झुकाव इस वक्त कांग्रेस, इनेलो और जेजेपी की ओर दिखता है। वहीं गैर जाट का झुकाव राज्य में बीजेपी की ओर दिखाई पड़ता है। गैर जाट वोटर्स में सबसे अधिक संख्या ओबीसी की है। राज्य के नए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी भी इसी वर्ग से आते हैं। जाट वोटों का झुकाव फिलहाल राज्य में बीजेपी की ओर नहीं दिखता है लेकिन गैर जाट वोटों को एक साथ लाने में यह फैसला कारगर सिद्ध हो सकता है।

 

गठबंधन टूटा लेकिन दोनों फायदे में


इस बदलाव के बाद चर्चा यह शुरू है कि इससे जेजेपी और बीजेपी दोनों को फायदा है। जेजेपी अब बीजेपी के साथ नहीं लेकिन उसकी ओर से अब तक बीजेपी पर कोई कड़ा प्रहार नहीं किया गया है। वहीं यह भी कहा जा रहा है दोनों के अलग होने से दोनों को फायदा है और नुकसान कांग्रेस को हो सकता है। जब से दुष्यंत चौटाला बीजेपी के साथ थे दोनों के बीच कोई बड़ी खटपट की खबर कभी सामने नहीं आई।


दरअसल, जजपा लोकसभा चुनाव में हरियाणा में 1 से 2 सीटें मांग रही थी, जबकि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व और राज्य संगठन सभी 10 सीटों पर खुद लड़ने के पक्ष में है। यही गठबंधन टूटने की वजह बनी। जजपा के राष्ट्रीय महासचिव और हरियाणा के डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला सोमवार को दिल्ली में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से मिले थे, लेकिन सीट शेयरिंग पर बात नहीं बनी।


ये भी सच है कि हरियाणा के भीतर किसान आंदोलन के दौरान जेजेपी को विरोध भी झेलना पड़ा। आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का गठबंधन हो गया है। दोनों दल मिलकर लड़ेंगे। साथ ही यह भी तय है कि अब जेजेपी भी मैदान में होगी ऐसे में इस पूरे घटनाक्रम में बीजेपी को फायदा मिल सकता है।

 

बड़े फैसले लेने से नहीं चूकेगी पार्टी, दिया ये खास मैसेज


राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को लेकर बीजेपी की ओर विधानसभा चुनाव के बाद बड़े और कड़े फैसले लिए गए। राज्य के नए मुख्यमंत्रियों को लेकर भी काफी चर्चा हुई। साथ ही यह भी कहा गया कि बीजेपी आगे की ओर देख रही है। लोकसभा चुनाव करीब थे उसके बावजूद इन राज्यों में बड़े चेहरों को किनारे कर नए चेहरों पर दांव लगाया गया। वहीं गुजरात और उत्तराखंड की तरह हरियाणा में चुनाव से पहले पार्टी ने राज्य की कमान नए हाथों में सौंप दी है। पार्टी की ओर से इसके साथ ही यह संदेश भी देने की कोशिश की गई है कि बड़े फैसले लेने से पार्टी कभी हिचकेगी नहीं।

 

कंप्यूटर ऑपरेटर से सीएम बनने तक का रोचक सफर


हरियाणा के 15वें मुख्यमंत्री बने नायब सिंह सैनी कभी भारतीय जनता पार्टी में निवर्तमान मुख्यमंत्री मनोहर लाल के साथ संगठन में काम करते हुए कंप्यूटर आपरेटर होते थे। मनोहर लाल भाजपा में संगठन मंत्री थे तब वह अपने कार्यालय के कर्मचारियों में सबसे अधिक भरोसा कंप्यूटर आपरेटर नायब सिंह पर ही करते थे। कई साल तक भाजपा मुख्यालय में काम करने वाले नायब सिंह सैनी ने कुछ समय संगठन की राजनीति को छोड़कर अंबाला जिले के नारायणगढ़ में केबल आपरेटर के रूप में भी काम किया।

 

कुछ समय के अंतराल के बाद वह फिर से भाजपा की सक्रिय राजनीति में लौटे और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। सैनी को संगठन में काम करने का लंबा अनुभव है। 1996 में उन्हें हरियाणा बीजेपी के संगठन में जिम्मेदारी दी गई थी। उसके बाद वर्ष 2002 में नायब सैनी अंबाला बीजेपी युवा मोर्चा के जिला महामंत्री बने थे। 2005 में नायब सिंह सैनी भाजपा अंबाला युवा मोर्चा के जिला अध्यक्ष बने। इसके बाद उन्हें बीजेपी हरियाणा किसान मोर्चा का प्रदेश महामंत्री भी बनाया गया।

 

साल 2012 में नायब सैनी का प्रमोशन हुआ और उन्हें अंबाला का जिला अध्यक्ष बना दिया गया। 2014 के विधानसभा चुनाव में नायब सिंह सैनी को नारायणगढ़ से टिकट दिया गया और वह जीतकर विधानसभा पहुंच गए। नायब सिंह सैनी को मनोहर लाल के करीबी होने का भी फायदा मिला। वर्ष 2016 में उन्हें मनोहर लाल के नेतृत्व वाली हरियाणा सरकार में राज्य मंत्री बनाया गया।

 

2019 के लोकसभा चुनाव में नायब सिंह सैनी को कुरुक्षेत्र से टिकट दिया गया और वह सांसद बन गए। सैनी मनोहर लाल के करीबी हैं। 27 अक्टूबर 2023 को ही उन्हें हरियाणा भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया था। अब मंगलवार को उन्हें प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया गया।

 

सैनी को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने राज्य में पंजाबी और पिछड़ा वोट बैंक पर पकड़ मजबूत की है। जबकि पार्टी को इसका दूसरा लाभ उत्तर प्रदेश के चुनावों में भी मिल सकता है।


यूपी पर असर 


यूपी में पिछड़ों का अच्छा खासा वोट बैंक हैं। सपा पीडीए (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक) की सियासत के साथ आगे बढ़ रही है। इस दिशा में भाजपा का ये बड़ा दांव माना जा रहा है। हाल ही में मध्यप्रदेश के सीएम डॉ. मोहन यादव ने उत्तर प्रदेश के यादव समुदाय और पिछड़ों के साथ तालमेल बढ़ाना शुरू किया है।

 

नायब सिंह सैनी को राज्य के पूर्व सीएम मनोहर लाल खट्टर का करीबी माना जाता है। साल 2019 में भाजपा ने उन्हें कुरुक्षेत्र लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतारा और वह संसद पहुंचे। भाजपा ने सैनी को 2023 में प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दी थी। ज्यादातर कार्यक्रमों में खट्टर के साथ देखे जाते हैं।

 

सैनी ओबीसी समुदाय से आने वाले भाजपा के प्रमुख नेता हैं। सैनी संघ की पृष्ठभूमि से आते हैं। साल 1996 में सैनी को राज्य में भाजपा संगठन की जिम्मेदारी दी गई थी। इसके बाद 2002 में उन्हें भाजयुमो का जिला महामंत्री बनाया गया। 2012 में सैनी को अंबाला भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद सैनी का प्रमोशन होता गया। वह 2014 में नारायणगढ़ से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। साल 2016 में सैनी को खट्टर सरकार में राज्य मंत्री भी बनाया गया था।

 

 

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