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डॉ. आशुतोष और मास्ट्रिच यूनिवर्सिटी की रिसर्च - कोरोनाकाल में नकारात्मकता से लड़ने का उपाय "W.A.R.A."



इस लेख को समझने के लिए जरुरी है कि कुछ सवाल आप अपने आप से पूछें

- क्या आपको कभी बेचैनी होती है।
- क्या आप किसी विचार से परेशान होकर इधर उधर टहलने लगते हैं।
- क्या बेचैनी के दौर में आपके मन में नकारात्मक ख्याल आने लगते हैं।
- क्या आपके विचार इतने नकारात्मक  हो जाते हैं कि आप अकेले रहना चाहते हैं।
- क्या ऐसे हालात में आपको परिवार या आसपास लोग अच्छे नहीं लगते।
- क्या आपको जीवन कभी नीरस और बोझिल लगता है। 

अगर इन सवालों का जवाब हां में है तो ये लेख पूरा पढ़िए। ये लेख एक मनोवैज्ञानिकों की रिसर्च पर आधारित है। जिसमें ऐसे प्रभावों का पता लगाकर उन्हें खत्म करने की विधि खोजी जा रही है जिससे मनुष्य की नकारात्मकता को ना सिर्फ कम किया जा सके बल्कि उसकी खोई हुई ऊर्जा को वापस लाकर सकारात्मक रुप से उसे स्वस्थ किया जा सकता है।


इस रिसर्च में भारतीय मनोवैज्ञानिक डॉ. आशुतोष श्रीवास्तव के अलावा PaulaWeerkamp-Bartholomeus-ab, DonatellaMarazziti-c

Edward chand, AshutoshSrivastava-ef, Theresevan Amelsvoort-a,

a- Department of Psychiatry and Neuropsychology, School for Mental Health and Neuroscience, Maastricht University, Maastricht, the Netherlands

b- ReAttach Therapy International Foundation, Voerendaal, the Netherlands

c- Dipartimento di Medicina Clinica e Sperimentale, Section of Psychiatry, University of Pisa, Italy

d- International Psychology Centre, Kuala Lumpur, Malaysia

e- Bharatiya Counselling Psychology Association, New Delhi, India

f- Psyuni Trust, Lucknow, India से शामिल हुए.

अब दो महत्वपूर्ण बातें उदाहरण से समझिए -


- समाज या परिवार से हमारा शारिरिक जुड़ाव उस लैंडलाइन टेलीफोन की तरह होता है जिसकी वायरिंग होती है। यानी तारों का बहुत बड़ा जाल एक लैंडलाइन को दूसरे लैंडलाइन फोन से जोड़ता है। (किसी का हाथ पकड़ना, किसी से गले लगना, किसी के पैर छूना आदि)

- समाज या परिवार से हमारा मानसिक जुड़ाव उस मोबाइल की तरह होता है जो तरंगों पर काम करता है। (बिना कहे दूसरे की बात को समझ लेना, किसी की याद आना, किसी बात को भूल जाना आदि)

यदि ऊपर पूछे गए सवालों के जवाब हां में हैं तो अब आप इस रिसर्च को बहुत ध्यान से समझिए।



मनुष्य जो एक सामाजिक प्राणी है वो एक दूसरे से शारिरिक और मानसिक दोनों प्रकार के संबंध रखता है।

आमतौर पर हमारे परिवार में माता-पिता, पत्नी-बच्चे स्वाभाविक रुप से हमें स्पर्श करते हैं और हम उन्हें। ये प्रक्रिया सामान्य भाव से आगे तब तक बढ़ती रहती है जब तक हम खुद शारिरिक दूरी ना बना लें।


उदाहरण के तौर पर इस कोरोनाकाल में आप आफिस से जब घर लौटते हैं तो पहले की तरह बच्चों को गोद में नहीं लेते। पहले नहाते हैं। कपड़े बदलते हैं और फिर पूरी तरह से खुद को सुरक्षित करके बच्चों के साथ खेलते हैं। ये प्रक्रिया लैंडलाइन टेलीफोन की तरह है। जिसमें बच्चों के पास जाना या उनका हमारे पास आना, उन्हें गोद में उठाना, उन्हें पुचकारना आदि एक स्थान पर सीमित है। लेकिन भावनात्मक आदान प्रदान ऐसे हो रहा है जैसे एक तार से दूसरा तार जोड़ा जाता है, यानी हमारा शारिरिक स्पर्श।


मानसिक संबंधों में जरुरी नहीं कि हम ठीक वहीं हों जहां दूसरा व्यक्ति सशरीर मौजूद है। अगर हम आफिस में हैं और अचानक घड़ी पर निगाह गई। घड़ी में दो बजे हैं जो कि बच्चों के स्कूल से लौटने का समय है तो स्वाभाविक रुप से हम ये मान लेते हैं कि बच्चे स्कूल से घर आ गए होंगे। अगर मन को तसल्ली ना हो तो हम फोन के जरिए उनकी लोकेशन पता भी करते हैं। ये जुड़ाव तरंगों का है। निर्धारित समय पर योजना अंजाम तक पहुंची या नहीं ये प्रोफेशनल लाइफ और पर्सनल लाइफ दोनों ही जगह सहज सामान्य रुप से कार्य करता है।


अवसाद या जीवन से जुड़ी नीरसता का बड़ा कारण हमारे मानसिक चिंतन से जुड़ा है। हमारा मन हमारे उद्देश्यों, संसाधनों, जिम्मेदारियों आदि की पूर्ति में लगने वाले भौतिक कारकों से जुड़ा है।


अगर हमारे भीतर अवसाद, नीरसता, नकारात्मकता बढ़ती है तो निश्चित रुप से हम भौतिक कारकों से प्रभावित हो रहे होते हैं। ऐसे में हमारा शरीर और हमारा मन दोनों का तारतम्य टूटने लगता है और हम किसी अंधेरी गुफा में खुद को घिरा हुआ महसूस करने लगते हैं जहां जीवन जीने से ज्यादा उसे खत्म करने या उसे नुकसान पहुंचाने की भावना बढ़ने लगती है।


इस स्थिति से निपटा जा सकता है। मनोवैज्ञानिकों ने रिसर्च के जरिए इस बीमारी के लक्षणों की पहचान कर इससे निजाद पाने के कारगर तरीके पाने में सफलता हासिल की है।


दुनिया के कई बड़े मनोवैज्ञानिकों ने अपने शोध के आरंभिक चरण में पाया है कि नकारात्मकता और नीरसता से परेशान किसी व्यक्ति को रिअटैच थेरैपी के जरिए ट्रीटमेंट देने पर उसके शरीर के भीतर की तंत्रिकाएं सकारात्मक रुप से प्रभावित होती हैं और व्यक्ति अपने मेंटल ट्रॉमा से बाहर आकर सामान्य जीवन जी सकता है। वैज्ञानिकों ने इसे Wiring Affect with ReAttach (W.A.R.A.) का नाम दिया है।

वोरेंडाल, नीदरलैंड में हुए एक पायलट अध्ययन में सामने आया कि (W.A.R.A.) नकारात्मक प्रभाव को कम करने वाला एक प्रभावी और अल्ट्राफास्ट ट्रांसडैगनॉस्टिक हस्तक्षेप है। यह शोध वैज्ञानिक ओपन-एक्सेस जर्नल हेलियोन के अंक में प्रकाशित भी हुआ। मानसिक रुप से अस्वस्थ किसी व्यक्ति को W.A.R.A. के दौरान डॉक्टर रीअटैच की बुनियादी तकनीकों का उपयोग करते हैं। मसलन बाहरी उत्तेजना का नियंत्रण, संवेदनाओं का सही संचार और सहयोगी शिक्षा आदि।

रीअटैच और W.A.R.A. का संबंध



रीअटैच बच्चों, किशोरों और वयस्कों के लिए एक नया, अल्पकालिक और व्यवस्थित चिकित्सकीय उपाय है जो मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं जैसे मानसिक आघात, लगाव के मुद्दों, मनोदैहिक शिकायतों या विकासात्मक विकारों से पीड़ित मरीजों के लिए है। अभ्यास आधारित शोध से पता चला है कि रिअटैच मनोवैज्ञानिक तनाव और आवश्यकता से अधिक अति जिम्मेदारियों की संवेदनाओं में कमी करता है जिससे मरीज़ तनाव से बाहर आकर स्वस्थ मन से नई ऊर्जा के साथ योजनाओं को अंजाम देने के लिए प्रेरित होता है।


उदाहरण के तौर पर तेज आंधी में जो पेड़ झुक जाते हैं वो बच जाते हैं ठीक उसी तरह जीवन की विषम परिस्थितियों में यदि व्यक्ति के अति तनाव की स्थिति को नियंत्रित करके कम कर दिया जाए तो वो समस्या से निकलने का रास्ता बना लेता है।


W.A.R.A. निश्चित जवाबदेही की स्थिति, क्रोनिक दर्द या पुरानी बीमारी के साथ संवेदी रोगियों में रीअटैच थेरेपी के जरिए किया जाने वाला सबसे कारगर अभ्यास या इलाज है।

101 रोगियों का इलाज और सकारात्मक परिणाम


मनोवैज्ञानिकों ने दुनिया के अलग अलग 101 रोगियों पर W.A.R.A. और रीअटैच थेरेपी का प्रयोग किया। छोटे बच्चों के अलावा अलग अलग उम्र के रोगियों में अप्रिय भावनाओं को कम करने, नकारात्मकता का स्तर नियंत्रित कर घटाने में बेहद कारगर साबित हुआ। पायलट अध्ययन के पहले परिणाम उत्साहजनक रहे हैं।


डॉ.आशुतोष श्रीवास्तव का विश्लेषण



भारत के लब्ध प्रतिष्ठित मनोवैज्ञानिक डॉक्टर आशुतोष श्रीवास्तव जो लंबे समय से रीअटैच थेरेपी पर शोध करते आएं हैं उन्होंने स्टेट टुडे से इस शोध और इसके परिणामों पर चर्चा के दौरान बताया कि अगर किसी व्यक्ति मनोवैज्ञानिक संकट से जूझ रहा है या उसकी मनोदशा में लगातार बदलाव हो रहे हैं, चिंता, अवसाद हावी हो रहे हैं तो रीअटैच थेरेपी एक प्रभावशाली इलाज है। जिससे मस्तिष्क को प्रभावित कर रहे तत्व, बाहरी प्रभाव और उत्तेजना आदि नियंत्रित करके सकारात्मक मानसिक स्थिति बनाई जा सकती है। विभिन्न मानसिक स्थितियों में लक्षण की गंभीरता को कम करने के लिए रीअटैच थैरेपी की परिकल्पना की गई। वर्तमान में उपलब्ध सीमित जानकारियों को देखते हुए ये अध्ययन रीअटैच तत्वों के प्रभाव की जांच करने के उद्देश्य से किया गया जिससे “नकारात्मक” प्रभाव पर “रीअटैच के साथ वायरिंग का प्रभाव” आंका जा सके।


अध्ययन के परिणाम से साफ है कि W.A.R.A. के साथ रीअटैच थेरेपी किसी भी तरह के नकारात्मक प्रभाव से उबरने का सबसे कारगर उपाय हो सकता है।


डॉक्टर आशुतोष और उनकी टीम लगातार इस विषय पर अपने शोध जारी रखे हैं। आवश्यकता है कि दुनिया के बाकी हिस्सों में भी इस ट्रीटमेंट का विस्तार हो और इस शोध को आगे बढ़ाया जाए।


कोरोनाकाल में क्यों प्रभावी है ये शोध


कोविड 19 से पूरी दुनिया त्रस्त है। कारोबार तहस नहस है। नौकरियां जा रही हैं। सरकारें परेशान हैं। नौकरशाही समझ नहीं पा रही कि क्या किया जाए। डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ अत्यधिक कार्य से तनाव में है। ये तब है जब कोरोना का कोई पुख्ता इलाज या वैक्सीन दुनिया के सामने नहीं है। जाहिर है किसी ना किसी कारण से दुनिया का हर व्यक्ति तनाव और नकारात्मकता के उस बिंदु तक जा रहा है जहां उसे हर हाल में मनोवैज्ञानिक की जरुरत होगी। जो उसे ऐसी मानसिक स्थिति में ला सके जिससे वो आगे जिंदगी का सफर तय कर सके। ऐसे में रीअटैच थैरेपी के साथ W.A.R.A. का संबंध दुनिया के सामने सबसे प्रभावी विकल्प है।


टीम स्टेट टुडे



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