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मुफ्त वैक्सीन की मांग के बीच राज्य सरकारें निजी अस्पतालों को बेच रहीं है केंद्र की सरकारी वैक्सीन



हद पार हो गई कमीशनखोरी की


दुनिया के कई देश ऐसे हैं जहां कोरोनाकाल में टीकाकरण पूरी तरह से मुफ्त किया गया। बिहार चुनाव के दौरान कोरोना की वैक्सीन मुफ्त में लगाने का वादा किया गया। इसके बाद तो जैसे सियासी भूचाल आ गया। वर्तमान हकीकत ये है कि भारत सरकार की तरफ से सभी राज्यों में जो वैक्सीनेशन की प्रक्रिया चल रही है उसके लिए आम आदमी को कोई कीमत नहीं चुकानी है।


कोरोना वैक्सीन की दोनों खुराक आम जनता को मुफ्त ही दी जा रही है। फिर वैक्सीन की कीमत को लेकर इस हाय-हाय क्यों हो रही है। ये सवाल सबके जहन में है।


दरअसल सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटेक की तरफ से कोविशील्ड और कोवैक्सीन की सप्लाई केंद्र सरकार के जरिए राज्यों तक हो रही है। वैक्सीन बनाने के लिए आवश्यक रिसर्च और तैयार करने का पूरा खर्च इन्हीं कंपनियों ने उठाया है। इसके बाद देश की जनता के लिए बड़ी तादात में वैक्सीन बनाने का जो खर्च है उस पर केंद्र सरकार कंपनियों को रकम दे रही है। राज्य इस बात पर परेशान हैं कि ऐसे में वैक्सीन खरीद को लेकर जो कमीशनखोरी बीच में हो जाती थी वो बंद हो गई।


पहले अदार पूनावाला को धमकी मिली तो वो भारत से लंदन चले गए। इसके बाद दुनिया भर से वैक्सीन मंगाने की जो मांग की गई उसमें राज्य सरकारों ने टेंडर निकाले तो उसके दाम और कमीशन को देख कर विदेशी कंपनियां भाग खड़ी हुईं और सिर्फ भारत सरकार के जरिए ही सप्लाई की बात कहने लगीं।

भारत में कोरोना समेत बच्चों को लगने वाले लगभग सभी सरकारी टीके मुफ्त में ही लग रहे हैं और लगते रहें हैं। लेकिन निजी अस्पतालों या डाक्टरों की क्लीनिक पर इन्हीं टीकों के लिए मोटी रकम चुकानी पड़ती है।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर भारत में वैक्सीन लगवाने के लिए पैसे क्यों खर्च करने पड़ रहे हैं। क्या सरकार वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को सब्सिडी नहीं दे रही है या कंपनियां अपने फायदे के लिए पैसे ले रही हैं।


फिलहाल कोरोना की वैक्सीन के लिए भारत के निजी अस्पतालों में वैक्सीन लेने के लिए 900 से लेकर 1500 रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं। भारत दुनिया में इकलौता देश है, जहां प्राइवेट में वैक्सीन के लिए इतनी मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है।


आपको बताते हैं कि विदेश में जब टीका मुफ्त में मिल रहा है तो अपने देश में इसके बदले पैसे क्यों खर्च करने पड़ते हैं।


विदेश में क्यों दी जा रही है मुफ्त वैक्सीन?


  • अमेरिका, यूरोपिय संघ, ब्रिटेन और कनाडा समेत कई देशों में वैक्सीन निर्माता कंपनियों को आर्थिक मदद देने के लिए सरकार ने एक कोष का गठन कर रखा है।

  • वैक्सीन बनाने में आने वाले कच्चे रॉ मटेरियल के लिए सरकार द्वारा फंड जारी किया जाता है। साथ ही वैक्सीन की साइड इफेक्ट होने पर राहत कोष से इलाज किया जाता है।

  • अमेरिकी कंपनियां फाइजर, मॉर्डना को वैक्सीन बनाने की जिम्मेदारी है, लेकिन उस पर आने वाली लागत का खर्च सरकार उठाती है।

  • अगर किसी व्यक्ति ने वैक्सीन ली और उससे अगर उसे साइड इफेक्ट हुआ तो उसका इलाज राहत कोष के द्वारा किया जाता है।

  • विदेश में क्लिनिक्ल ट्रायल पर होने वाले खर्चों का वहन भी सरकार द्वारा किया जाता है।


भारत में वैक्सीन के लिए क्यों खर्च करने पड़ रहे हैं रुपये?


  • भारत में सरकार की ओर से किसी तरह का कोष नहीं बनाया गया है, सरकार ने वैक्सीन प्रोडक्शन के नाम पर कंपनियों को पैसे जारी किए हैं।

  • भारत में दो कंपनियां कोरोना वैक्सीन बना रही है। सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया कोविशील्ड का उत्पादन करती है, जबकि भारत बायोटेक कोवैक्सीन तैयार करती है।

  • भारत सरकार ने भारत के सीरम इस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और भारत बायोटेक को 4500 करोड़ रुपये दिए हैं।

  • सीरम इस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को 3,000 करोड़ रुपये दिए गए हैं। वहीं भारत बायोटेक को 15,00 करोड़ की राशि दी गई है।

  • भारत में कोई शोध क्लीनिकल ट्रायल की जिम्मेदारी कंपनियों के ऊपर होती है।

  • कोविशील्ड वैक्सीन के लिए 700 से 900 रुपये वसूले जा रहे हैं।

  • कोवैक्सिन के लिए निजी अस्पताल 1250 से 1500 रुपये ले रहे हैं

  • भारत उन देशों में शामिल है जहां निजी अस्पतालों में वैक्सीन की कीमत सबसे ज्यादा है

  • हालांकि अमेरिका, यूरोप, कनाडा की तर्ज पर सीरम इंस्टीट्यूट ने सरकार से एक प्रकार के छूट की मांग की है।

राज्य सरकारें ब्लैक कर रही हैं केंद्र से मिली वैक्सीन


बात सिर्फ इतनी नहीं है। भारत में हर काम में कमीशनखोरी की बड़ी बेदर्द आदत है। कई राज्य सरकारें ये बात हजम ही नहीं कर पा रही हैं कि भारत में अब तक बीस करोड़ से ज्यादा लोगों को वैक्सीन लग गई और उनके हाथ कमीशन का एक रुपया तक नहीं आया।


ऐसे में केंद्र सरकार की तरफ से राज्यों को जो वैक्सीन आम जनता को सरकारी अस्पताल में मुफ्त में लगाने के लिए दी जा रही है उसे राज्य सरकारें निजी अस्पतालों को बेच रही हैं और निजी अस्पताल इन मुफ्त की वैक्सीन की कीमत आम लोगों से वसूल रही हैं।


आपको बता दें कि लगातार बढ़ते राजनीतिक दबाव के बाद केंद्र सरकार ने वैक्सीनेशन की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए प्राइवेट क्लीनिक या निजी अस्पतालों को भी वैक्सीनेशन करने की छूट दे दी है। ये निजी अस्पताल वैक्सीनेशन की कीमत भी वसूल कर रहे हैं क्योंकि इन्हें वैक्सीन कंपनियों से खरीदनी हैं।


निजी अस्पतालों को बेची जा रही है सरकारी वैक्सीन


पंजाब में निजी अस्पतालों को कोरोना वैक्सीन बेचने का मुद्दा गरमा गया है। गुरुवार को शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर बादल ने स्वास्थ्य मंत्री बलबीर सिद्धू पर संगीन आरोप लगाकर मामले की जांच हाईकोर्ट से करवाने की मांग की थी। केंद्रीय राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर ने भी इस मामले को लेकर पंजाब सरकार पर निशाना साधा था। अब केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडे़कर भी मैदान में उतर आए और मामले को लेकर राहुल गांधी पर निशाना साधा।


जावड़ेकर ने आरोप लगाया कि पंजाब सरकार को कोवाक्सिन की 1.40 लाख डोज 400 रुपये की दर पर उपलब्ध करवाई गई थी। पंजाब में इसे बीस निजी अस्पतालों को एक हजार रुपये की दर से दे दिया। पंजाब में टीकों की कालाबाजारी जोरों पर है। पंजाब सरकार भी केंद्र से मिलने वाले मुफ्त टीकों की खुराक को 1060 रुपये में निजी अस्पतालों को बेच रही है। उन्होंने कहा कि एक तरफ केंद्र सरकार के प्रयासों से देशभर में 22.10 करोड़ लोगों का टीकाकरण किया जा चुका है। वहीं कांग्रेस शासित राज्यों द्वारा कोरोना वैक्सीन की कालाबाजारी व वैक्सीन की बर्बादी कर टीकाकरण अभियान को धीमा करने का प्रयास किया जा रहा है।


टीम स्टेट टुडे


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