google.com, pub-3470501544538190, DIRECT, f08c47fec0942fa0
top of page

गुरु की शिक्षाओं को याद कर #DevendraMohan #Bhaiyaji के सानिध्य में भव्यता से मनाया गया दिव्यानंद नगर आश्रम का स्थापाना दिवस




गुरू शब्द स्वरूपी है। गुरु को शरीर  या किसी बाहरी परिवेश से नहीं जाना जा सकते। हमारे अन्तर्मन में बह रही गुरुधारा ही हमें गुरु से जोड़ सकती है और जोड़ने का यह काम भी गुरुकृपा से ही संभव है।


अपने गुरु स्वामी ब्रह्मलीन स्वामी दिव्यानंद जी महाराज को याद कर उनके आध्यात्मिक उत्तराधिकारी देवेंद्र मोहन भैयाजी ने विशाल संगत को सत्संग दिया। मौका था बरेली के भोजीपुरा स्थित स्वामी दिव्यानंद नगर आश्रम के स्थापना दिवस का।


भैया जी ने कहा कि आज हम सभी इस आश्रम का स्थापना दिवस मना रहें हैं। स्वामी जी की ये प्रबल भावना थी कि एक ऐसा आश्रम बने जहां से उनकी सेवाएं एवं शिक्षाओं से सभी लाभ उठा सकें।


भोजीपुरा स्थित स्वामी दिव्यानंद नगर आश्रम की स्थापना 16 फरवरी, 2012 को की गई थी।


संत देवेंद्र मोहन भैयाजी ने संगत से कहा कि, जब हमने नामदान लिया तो गुरू की शिक्षाओं को अपने जीवन में धारण करने के लिए तीन संकल्प लिए थे,  इन्हीं तीन संकल्पों के द्वारा हम गुरू के बताए हुए मार्ग को अपने आचरण में ला सकते हैं।

 

प्रथम संकल्प है जीवन में आहार और विचार की शुद्धता। हमारा आहार ही हमारे विचारों की नींव है। जब हम सात्विक भोजन करते हैं तो यह हमारे अंदर सत्य पैदा करता है। सात्विक भोजन हमारी मन-इंद्री को संयमित कर भोगों की तरफ नहीं जाने देता। हमें ऐसा भोजन लेना है जिससे शरीर का गुजारा चल सके। हमें भोजन को भोग के रूप में नहीं लेना है कि हम स्वाद और लालच में फंस जाएं। गुरू से जोड़ने का कार्य भोजन 80 प्रतिशत करता है। हमें जो भोजन के लिए शरीर में ग्रंथि दी गई है उसे पूरा भरना नहीं है, क्योंकि पूरा भरने से हमारे अंदर आलस्य पैदा होता है। शुद्ध शाकाहारी भोजन हमारे जीवन को आध्यात्म मार्ग से जोड़ने में पूरी तरह से सहायक है।


विचारों की शुद्धता के लिए हमें ध्यान रखना होगा कि दुनिया की प्रत्येक चीज़ हमारे लिए नहीं है। यदि किसी ने किसी के बारे में बुरी बात कही तो हो सकता है उस व्यक्ति से हमारा लेना-देना नहीं हो। फिर भी वो कही गई बात हमारे अंदर घर कर सकती है। हमें अपने भीतर 24 घण्टों में उठने वाले विचारों पर नज़र रखनी होगी।


दूसरा संकल्प है पात्रता। गुरू ने हमें जो नाम दिया, उसे सिर्फ लेना ही काफी नहीं है। उस नामदान को हम कैसे चलते-फिरते, खाते-पीते, सोते-जागते अपने मन में धारण करते हैं या उसका जप करते हैं, वो जरूरी है। इसके लिए हमें अपनी दिनचर्या में खासा ध्यान रखना होगा। हमें हर क्षण अपने मन, वचन एवं कर्म पर नज़र रखनी होगी। एक सत्संगी को अपनी दिनचर्या को बड़ा सम्भाल के रखना होता है। हमें यह देखना होगा कि क्या हमारा मन किसी भी काम करने में या हमारे वचन गुरू की कही गई बातों के अनुरूप कार्य कर रहे हैं या नहीं।

पात्रता बनाने के लिए हमें प्रतिदिन अभ्यास करना होगा। अभ्यास भी ऐसा जो हमारे विविध कार्यों में हमें अपने गुरु की याद कराए। हम दुनियावी चिंताओं में अपना समय खराब ना करके इस मन को गुरू के नाम से जोड़ें ताकि हम गुरू कृपा के पात्र बन सकें।


तीसरा संकल्प है निरंतरता ।  जब हम गुरू द्वारा दिए गए नाम में धीरे-धीरे रोज़ जुड़ते हैं,  प्रतिदिन समय देते हैं तो हमारा मन गुरू-धारा से जुड़ने लगता है। किसी भी कार्य के लिए निरंतरता बहुत जरूरी है। हमें रोज़ कम-से-कम आधा घण्टा गुरू की याद में, उसके बताए गए नाम से जुड़ना जरूरी है।

जब हम अपने आप में इन तीनों बातों का संकल्प लेते हैं तो धीरे-धीरे हमारे जीवन में चमत्कार होने लगते हैं। भैयाजी ने कहा कि प्रत्येक सत्संगी को संकल्प लेना होगा कि हम अपने अंतर बैठे गुरू से जुड़ने की कोशिश करेंगें। हम अपना समय गुरू की याद और उसकी शरण में देने का अभ्यास करेंगे।


आज इस कलियुग में जहां सिर्फ दिखावा है,  वहां हम उस गुरू को आधार बिंदु मानकर,  उसकी शिक्षाओं के अनुसार अपना जीवन जीएंगे। यदि हम गुरू की कही हुई एक बात भी अपने जीवन में पालन करना शुरू करते हैं तो हम देखेंगे कि हमारे सारे कार्य के लिए गुरू हमारे अंग-संग रहता है। हमारे सारे कार्य वो क्षण में बनाता है।


हमें अपने गुरू पर विश्वास करना जरूरी है। गुरू पर भरोसा तब आता है जब हम उसकी बात मानना शुरू करते हैं। गुरू हमें अपने विश्वास के जरिए निर्भय होना सिखाते हैं। वो कहते हैं जब हमारा गुरू समर्थ है तो हमें कोई काल या महाकाल भी हिला नहीं सकता। भैयाजी ने सत्संग में कहा कि जो गुरु की शरण में हैं उन्हें किसी

टोना-टोटका में पड़ने की जरूरत नहीं है। ये सब बातें एक सत्संगी का कुछ नहीं बिगाड़ सकती। अगर शिष्य का अपने समर्थ गुरू पर विश्वास हो तो ऐसी बातों पर ध्यान देने की भी जरुरत नहीं है। हम दुनियावी भुलावों में न पड़कर अपने गुरू पर विश्वास करें और प्रतिदिन ध्यान-भजन पर समय देना शुरू करें।


आश्रम के स्थापना दिवस पर क्षेत्र की कई गणमान्य हस्तियां मौजूद थी। भोजीपुरा के पूर्व विधायक बहोरन लाल मौर्य जी भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए।  समस्त संगत के साथ साथ गेंदन लाल बाबूजी, शंकर लाल जी, मोहन स्वरूप, वेद प्रकाश गुप्ता, रोशन लाल जी, महेश भाई और उनकी लंगर टीम के विशेष सहयोग से दिव्यानंद नगर आश्रम के स्थापना दिवस का कार्यक्रम सफल रहा।

348 views0 comments

Comments


bottom of page