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जानलेवा कोरोना भी जिनकी अकल ठिकाने ना आने दे ऐसे हैं भारत के राजनीतिक दल और सियासत करने वाले



भारत में कोरोना की दूसरी लहर ने बीते साल की सारी व्यवस्थाओं को बौना कर दिया। लोग की जान ऐसे निकली जैसे किसी टहनी से सूखा पत्ता गिरता है। आपदा प्रबंधन की स्थिति ये हुई कि अस्पताल, ऑक्सीजन, जांच, वैक्सीन, दवाएं एक तरफ और शवों को जलाने की व्यवस्था एक तरफ।


चूक गए मोदी


भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2020 में कोरोना प्रबंधन को लेकर जितनी तारीफ बटोरी , कोरोना की दूसरी लहर में बंगाल के चुनावी चक्कर में उतनी ही अपनी भद्द पिटवा ली। भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी आने वाले कल में जितना भी कहें लेकिन बंगाल की रैलियों को रद्द करने और कोरोना संक्रमण पर गभीर चिंतन में पीएम मोदी ने देर की है। आम जनता का सच यही है बाकी वो इसे माने या ना माने।


ये क्या कर डाला दिल्ली के सीएम ने


खैर प्रधानमंत्री को देर से ही सही लेकिन सही दिशा दिखी तो सही लेकिन उनका क्या कीजिएगा जो दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं, अरविंद केजरीवाल। अपने सियासी फायदे के लिए सामने वाले को नंगा करने के चक्कर में अरविंद केजरीवाल ने आज वो कर दिया जो अक्षम्य की श्रेणी में आता है। प्रधानमंत्री के साथ मुख्यमंत्रियों की बैठक गोपनीय होती है और ये उस गोपनीयता की शपथ के दायरे में आते है जिसे संवैधानिक पद पर बैठने वाला हर व्यक्ति पद और गोपनीयता की शपथ के रुप में आत्मसाथ करता है।


दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ध्वस्त हो चुके दिल्ली की मेडिकल व्यवस्थाओं पर पर्दा डालने और केंद्र पर दोषारोपण के चक्कर में प्रधानमंत्री की बैठक को सोशल मीडिया पर लाइव कर दिया। जैसे ही ये बात पीएमओ के संज्ञान में आई फौरन एक्शन लिया गया। अपनी आदत के अनुसार केजरीवाल ने एक बार फिर कह दिया गलती हो गई।


योगी जी आपसे ये उम्मीद न थी


उत्तर प्रदेश आइये। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद कोरोना संक्रमित हैं। वर्चुअल बैठकों के जरिए प्रदेश की अफसर जमात को सुबह शाम घुट्टी दे रहे हैं। अकेले राजधानी लखनऊ की ही बात कर लें तो कोई घर , मोहल्ला, कॉलोनी नहीं बची जहां कोरोना का कहर ना देखा गया हो। बिना किसी भेदभाव के कोरोना ने एक तरफ से लखनऊ के साथ साथ प्रयागराज, वाराणसी, गोरखपुर, कानपुर जैसे बड़े जिलों को अपनी चपेट में लिया तो दूसरी तरफ सूबे के ज्यादातर जिले संक्रमण के बढ़ते मामलों से जूझ रहे हैं। दवा, अस्पताल, एंबुलेंस, आक्सीजन , सीएमओ की चिट्ठी हर चीज पर त्राहि त्राहि हो चुकी है। अफसोस की जो बात योगी सरकार को कठघरे में खड़ा कर रही है वो है मौत के आंकड़ों में अफसरों की बाजीगरी। स्थिति ये है कि कई ऐसे मामले अब सामने आ रहे हैं जिनके एंटीजन टेस्ट में कोरोना पाजिटिव निकला, बीमारी ज्यादा बढ़ी तो आरटीपीसीआर टेस्ट हुआ जिसकी रिपोर्ट आने से पहले अगर मरीज की मौत हो गई तो आरटीपीसीआर रिपोर्ट निगेटिव पहुंच रही है। यानी ऐसी मौतों को कोरोना संक्रमण से हुई मौत नहीं माना जाएगा। ये अपराध कोई तो कर रहा है क्योंकि ऐसी जानकारी लगातार मिल रही है।


महाराज जी जिनके अपने चले गए वो वापस नहीं आएंगें। आंकड़ों से मत खेलिए। मौत एक ऐसा सच है जिसे कोई बदल नहीं सकता।


ना उद्धव का लेना - ना देना


महाराष्ट्र चलिए। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे। एक तरफ कोरोना जान लील रहा है तो दूसरी तरफ 100 करोड़ की वसूली से लेकर लॉकडाउन लगाने या ना लगाने और पूरी सरकार अनिर्णय की स्थिति में डाले रखने का खामियाजा पूरा प्रदेश भुगत रहा है और पूरा देश देख रहा है। कहीं आक्सीजन कि किल्लत से लोग मर रहे हैं तो महाराष्ट्र में अस्पताल में आक्सीजन लीक से लोगों की जान जा रही है।


हमाम में तो सभी ...


उत्तराखंड में तीरथ सिंह रावत जो बोल चुके उसे बदल नहीं सकते और अब बोलने लायक बचे नहीं है। यही हाल छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल का है। बात बात में विरोधियों को घेरने वाले बघेल अपने राज्य की स्थिति को संभालने में नाकाम रहे हैं। गुजरात, राजस्थान, बिहार, झारखंड और दक्षिण भारत के राज्यों की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही है। जो जहां सत्ता में बैठा है उसकी व्यवस्थाएं ध्वस्त हैं और वो दूसरे राज्य या केंद्र की तरफ उंगली दिखा कर अपनी गर्दन बचाने में जुटा है।


जो बातें बची खुची थी वो कांग्रेस, सपा, बसपा और बहुत सारे अन्य विपक्षी दलों ने इस संक्रमण काल में आरोप-प्रत्यारोप के सहारे पूरी कर दीं। हकीकत ये है कि जो आज सत्ता में है उसकी जिम्मेदारी सबसे पहली और सबसे ज्यादा है लेकिन जो विपक्ष में हैं अगर वो सत्ता में होते तो भी स्थितियां इससे अलग होतीं ऐसा नहीं है क्योंकि व्यवस्थाओं को चलाने भ्रष्टाचार की रेल पर इतनी दूर निकल चुके हैं कि आपदा के समय सबसे पहले व्यवस्था ही पटरी से उतरी मिलती है।


हकीकत ये भी है कि स्वास्थ्य राज्यों का ही विषय होता है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की भूमिका से भी इंकार नहिं किया जा सकता लेकिन स्वास्थ्य हर हाल में राज्य का विषय है और अफसोस भारत के ज्यादातर राज्य स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में फिसड्डी ही साबित हुए हैं।


टीम स्टेट टुडे


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