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एक शब्द से बदल गए उत्तराखंड के मुख्यमंत्री और सियासी मायने




त्रिवेंद्र सिंह रावत से तीरथ सिंह रावत। उत्तराखंड में मुख्यमंत्री के नाम का एक शब्द ही बदला है लेकिन चुनाव के दरवाजे पर खड़े उत्तराखंड में बीजेपी के लिए पूरी सियासत मानो 360 डिग्री घूम गई। चार साल पहले जहां से चले थे चुनाव से एक साल पहले फिर वहीं से चल कर पांच का फलसफा बताने की जिम्मेदारी है सीधे, सहज, सरल और संघी कहे जा रहे नए मुख्यमंत्री पर।


उत्तराखंड में गढ़वाल सांसद तीरथ सिंह रावत उत्तराखंड के नौवें मुख्यमंत्री बन गए हैं। भाजपा विधायक मंडल दल की बैठक में उनका नाम अचानक से सामने आया। कार्यवाहक मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने तीरथ सिंह के नाम का प्रस्ताव दिया। राज्यपाल बेबी रानी मौर्य ने राजभवन में उन्हें पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई।


राष्ट्रीय स्वयं सेवक की पृष्ठभूमि से जुड़े तीरथ सिंह रावत गढ़वाल के सांसद हैं और उत्तराखंड भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे हैं। वे पार्टी के प्रदेश संगठन महामंत्री पद पर रह चुके हैं।



त्रिवेंद्र सिंह रावत के इस्तीफे के बाद उत्तराखंड की बागडोर जब तीरथ सिंह रावत को देने का एलान हुआ तो तमाम दिग्गज नेता और सियासी जानकार हैरत में पड़ गए। अप्रत्याशित तरीके से तीरथ सिंह रावत ने उन सभी दावेदारों को पीछे छोड़ दिया, जिनके नाम पिछले कुछ दिनों से चर्चा में थे। माना जा रहा है कि बेहद शांत और शालीन व्यक्तित्व वाले तीरथ सिंह रावत को ये अहम जिम्मेदारी इसलिए दी गई, क्योंकि उनपर कभी किसी गुटबाजी का आरोप नहीं लगा और तमाम कार्यकर्ताओं तक उनकी बहुत गहरी पहुंच रही है।


त्रिवेंद्र सिंह रावत के ऊपर सबसे गंभीर आरोप उनका कार्यकर्ताओं की पहुंच से बाहर होना बताया जा रहा था, जबकि दो बार उत्तराखंड के प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रहते हुए तीरथ सिंह रावत किसी भी विवाद से दूर रहे और इस बीच सभी कार्यकर्ताओं की पहुंच में बने रहे। संघ की पृष्ठभूमि भी उन्हें सहज-सरल होकर लोगों के करीब रहने में मदद करती है, जो विधानसभा चुनाव की दृष्टि से पार्टी के पक्ष में जाती है। उनके नाम पर पार्टी के किसी गुट का विरोध भी नहीं था। लिहाजा वे इस पद के लिए पहली पसंद बन गए।


उत्तराखंड की राजनीति में गढ़वाल रीजन और कुमाऊं रीजन का बड़ा प्रभाव रहता है। किसी भी सत्ताधारी दल के लिए इन दोनों ही क्षेत्रों को सत्ता में बराबर की भागीदारी सुनिश्चित करने की चुनौती रहती है। त्रिवेंद्र सिंह रावत भी इसी क्षेत्र से आते हैं और सत्ता में दोनों क्षेत्रों का बराबर का संतुलन बना रहता था, लेकिन किसी दूसरे क्षेत्र से मुख्यमंत्री बनाने से यह संतुलन गड़बड़ा सकता था। लिहाजा तीरथ सिंह रावत इस पद के लिए ज्यादा उपयुक्त समझे गए।



राज्य की राजनीति में राजपूत बहुल आबादी और ब्राह्मणों के प्रभाव को भी संतुलन में साधना पड़ता है। त्रिवेंद्र सिंह रावत को राजपूत समाज की भागीदारी के रूप में मुख्यमंत्री पद दिया गया था, तो वहीं ब्राह्मण समुदाय की भागीदारी के लिए प्रदेश अध्यक्ष के रूप में बंशीधर भगत को जिम्मेदारी दी गई है। त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटाने के बाद अगर यही जिम्मेदारी रमेश पोखरियाल निशंक को दी जाती तो यह समीकरण गड़बड़ा सकता था। चुनावी वर्ष में भाजपा यह जोखिम नहीं उठा सकती थी।


पार्टी सूत्रों के मुताबिक धन सिंह रावत के नाम पर त्रिवेंद्र सिंह के विरोधी सहमत नहीं थे, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि वे बाद में भी त्रिवेंद्र सिंह रावत के प्रभाव में काम करते रह सकते थे। जाहिर है चुनावी साल के मद्देनजर ये पार्टी के लिए घातक होता।


दरअसल उत्तराखंड भाजपा में हमेशा से कई गुट रहे हैं। ऐसे में भाजपा आला कमान को ऐसे नेता की तलाश थी, जो बेदाग हो और उसकी सभी कार्यकर्ताओं से बनती भी हो, सभी को लेकर चलने की क्षमता हो। ऐसे में इकलौता नाम सांसद तीरथ सिंह रावत का सामने आया। उनकी भाजपा के सभी अंदरूनी गुटों में स्वीकार्यता है। इसके अलावा संगठन में भी अच्छी पैठ है। प्रदेश और केन्द्रीय नेतृत्व के साथ बेहतर सामंजस्य के मामले में तीरथ सिंह रावत सबसे अव्वल माने गए।



उत्तराखंड भाजपा में इस वक्त प्रदेश अध्यक्ष कुमाऊं मंडल से है, तो मुख्यमंत्री गढ़वाल मंडल से ही चुना जाना था। ऐसे में भाजपा के नेता अजय भट्ट का पत्ता इसी मंडल के सिलसिले में कट गया। अब जो दूसरे नाम भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के सामने थे उसमें धन सिंह रावत, अनिल बलूनी, रमेश पोखरियाल निशंक समेत वरिष्ठ भाजपा नेता और महाराष्ट्र के गवर्नर भगत सिंह कोश्यारी प्रमुख थ। सूत्र बताते हैं कि धन सिंह रावत के नाम को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सिफारिश की थी। त्रिवेंद्र सिंह रावत की सिफारिश के चलते ही धन सिंह रावत का भी पत्ता कट गया।


चूंकि प्रदेश भाजपा में रमेश पोखरियाल निशंक और धन सिंह रावत समेत अनिल बलूनी गुट के लोग हैं। ऐसे में आलाकमान ने तय किया कि किसी ऐसे तटस्थ अनुभवी नेता को जिम्मेदारी दी जाए, जो प्रदेश को अगले साल होने वाले चुनाव में स्वच्छ और बेहतर छवि के साथ मैदान में उतार सके। इन सब के बाद ही सांसद तीरथ सिंह रावत का नाम तय किया गया। तीरथ सिंह रावत को संगठन में काम करने के साथ प्रशासनिक मामलों में भी अच्छा खासा अनुभव है। हिमाचल प्रदेश में बतौर प्रभारी का उनका कार्यकाल रहा हो या पूर्व में कैबिनेट मंत्री का कार्यकाल, केंद्रीय नेतृत्व ने तीरथ सिंह रावत की क्षमताओं को हमेशा सराहा।


तीरथ रावत को मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी के सबसे वफादार नेताओं में गिना जाता रहा। तीरथ के सामने पिछले लोकसभा चुनाव में तब धर्मसंकट पैदा हुआ जब उन्हें अपने गुरु के पुत्र के खिलाफ गढ़वाल सीट से चुनाव लड़ना पड़ा था। इस सीट पर उन्होंने जनरल खंडूड़ी के पुत्र मनीष खंडूड़ी को पराजित कर दिया था।



तीरथ सिंह रावत की पृष्ठभूमि


नाम- तीरथ सिंह रावत
पिता- स्व. कलम सिंह रावत
माता- स्व. गौरा देवी
जन्मतिथि- 9 अप्रैल 1964
गांव- सीरों, पट्टी असवालस्यूं, ब्लाक कल्जीखाल जनपद पौड़ी गढ़वाल।
प्राथमिक शिक्षा- राजकीय प्राथमिक विद्यालय, सीरों
उच्च प्राथमिक- जनता इंटर कालेज कंडारपानी।
हाईस्कूल- जनता इंटर कालेज मवाधार।
इंटरमीडिएट-राजकीय इंटर कालेज, जयहरीखाल। 
उच्च शिक्षा- हेनब गढ़वाल विवि बिडल परिसर श्रीनगर। 
परिवार में- पत्नी(डा. रश्मि त्यागी रावत), बेटी, तीन भाई, तीन बहनें। 



उत्तराखंड का बदलाव सिर्फ चुनावी नहीं


उत्तराखंड का बदलाव सिर्फ चुनावी नहीं हो सकता है। उत्तराखंड का इतिहास है कि कांग्रेस हो या भाजपा उत्तराखंड ही नहीं किसी भी प्रदेश में स्थापित नया चेहरा कभी ताकत नहीं दिखा पाया है। ऐसे मामलों में भी केवल नरेंद्र मोदी ही अपवाद साबित हुए थे। ऐन चुनाव के मुहाने पर कमान संभालकर भी अपने बूते केवल वही भाजपा को लगातार जिताते चले गए थे।


त्रिवेंद्र को उत्तराखंड की कमान जब सौंपी गई थी तब भी सवाल उठे थे कि वही क्यों। वह न तो जनता में लोकप्रिय थे और न ही नेताओं में। माना गया था कि जिस तरह की खींचतान है उसमें सबसे ज्यादा मुफीद शायद वही साबित हों लेकिन ऐसा हुआ नहीं।


पहले भी हुआ है ऐसा


उत्तराखंड में 2011 में रमेश पोखरियाल निशंक को हटाकर बीसी खंडूरी को मुख्यमंत्री बनाया गया था लेकिन वह खुद ही अपनी सीट हारे और साथ में भाजपा को भी हराया। उत्तराखंड त्रासदी के प्रबंधन में फेल होने के बाद कांग्रेस ने विजय बहुगुणा को हटाकर केंद्र से हरीश रावत को भेज दिया लेकिन 2017 में वह कांग्रेस तो क्या खुद को भी नहीं बचा पाए।


उत्तराखंड के खंड खंड में बने मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री                                    कार्यकाल 
नित्यानंद स्वामी                    09 नवंबर 2000 से 29 अक्तूबर 2001
भगत सिंह कोश्यारी              30 अक्तूबर 2001 से 01 मार्च 2002
एनडी तिवारी                       02 मार्च 2002 से 07 मार्च 2007
भुवन चंद्र खंडूरी                   08 मार्च 2007 से 23 जून 2009 (11 सितंबर 2011 से 13 मार्च 2012 में भी रहे)
रमेश पोखरियाल निंशक        24 जून 2009 से 10 सितंबर 2011        
विजय बहुगुणा                     13 मार्च 2012 से 31 जनवरी 2014
हरीश रावत                         1 फरवरी 2014 से 27 मार्च 2016 / 21 अप्रैल 2016 से 22 अप्रैल 2016 / 11 मई 2016 से 18 मार्च 2017
त्रिवेंद्र सिंह रावत                 18 मार्च 2017 से 09 मार्च 2021
तीरथ सिंह रावत                10 मार्च 2021(मुख्यमंत्री पद की शपथ ली)


टीम स्टेट टुडे


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