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कबीर की बांग

May 21, 2020
2 min read


के. विक्रम राव

अदालती निर्णयों में दर्शनशास्त्र और साहित्यिकता का पुट अब कमतर हो रहा है| शायद इसलिए कि अंग्रेजी का ज्ञान क्षीण हो गया है| कभी इलाहबाद हाईकोर्ट के ख्यात अंग्रेजी निर्णयों से उद्धरण पेश कर वक्ता लोग गोष्ठियों में चमक जाते थे| इस मन्तव्य का सन्दर्भ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 15 मई के दिन “लाउडस्पीकर पर अजान” वाले दिए निर्णय से है| न्यायमूर्ति-द्वय शक्तिकांत गुप्त तथा अजित कुमार की खण्डपीठ द्वारा प्रदत्त यह जजमेंट है| याची सांसद अफजाल अंसारी ने लाउडस्पीकर से मस्जिद से रमजान माह में शासन द्वारा अजान की अनुमति न देने को धार्मिक स्वतंत्रता के मूल अधिकारों का उल्लंघन बताया| मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिख कर हस्तक्षेप करने की माँग की थी| कोर्ट ने पत्र को जनहित याचिका मान ली|

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अजान पर फैसला तो 15वीं सदी के हिंदी कवि कबीर ने सदियों पूर्व दे दिया था| उन्होंने कहा था कि मस्जिद पर से “मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय?” इसके पूर्व कबीर मूर्तिपूजकों का मजाक बनाते लिख चुके थे कि “पाहन पूजे हरि मिलें, तो मैं पूजूं पहार|” हालाँकि कवि की राय में हिन्दुओं के लिए चक्की पूजन ज्यादा लाभकारी है, क्योंकि उससे खाने को आटा तो मिलता है|

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हाई कोर्ट का अजान पर निर्णय बहुत ही सटीक, सेक्युलर, सच्चा और लोकहितकारी है| तर्क सरल था| एक नागरिक को हक़ नहीं है कि वह अपनी आवाज दूसरे के कानों में जबरन उड़ेले, घुसेड़े| ध्वनि प्रदूषण-मुक्त नींद का अधिकार जीवन के मूल अधिकारों का हिस्सा है| किसी को भी अपने मूल अधकारों के लिए दूसरे के मूल अधिकारों का उल्लंघन करने का अधिकार नहीं है| कोरोना महामारी से निपटने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन के कारण सभी प्रकार के आयोजनों एवं एक स्थान पर इकट्ठा होने पर योगी सरकार ने रोक लगायी है| यह निषेध हरेक प्रकार के धार्मिक व सामूहिक कार्यक्रमों पर लगा हुआ है|लाउडस्पीकर बजाकर धार्मिक आयोजन करने व मंदिरों तथा मस्जिदों में भीड़ एकत्र करने पर भी पाबन्दी है|

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अजान का प्राचीन इतिहास है| इस्लामी नियमों के अनुसार नमाज हेतु जमात को समय की सूचना के खातिर अजान एक विधा, एक प्रक्रिया है| जब मदीना तैयबा में मस्जिद बनी तो आवश्यकता हुई कि निमंत्रण पहुँचाने का तरीका बने| तब अन्य धर्मों में झन्डा बुलंद कर फहराना, ज्वाला प्रज्ज्वलित करना, यहूदियों की भांति बिगुल बजाना अथवा ईसाईयों की तरह घंटा बजाना जैसी पद्धतियाँ थीं| मगर पैगम्बर ने अलग तरीका बनाया जो अजान कहलाया| यह बुलंद आवाज में बुलौवा हेतु होता है| इसमें सूत्र है : “अस्सलातु खैरुम्मिनन्नौम” अर्थात नींद से नमाज उम्दा है| प्रातः वन्दना जैसी| अर्चक सूर्य को भी पीछे छोड़ देता है| नए दौर में आवासीय विस्तार बढ़ गए तो संपर्क और सूचना प्रदान करना कठिन हो गया है| इसीलिए लाउडस्पीकर का सहारा लिया गया| मगर हाईकोर्ट ने याची की प्रार्थना, कि लाउडस्पीकर पर अजान मूलाधिकार है को नामंजूर कर दिया| उस युग में जब अजान शुरू हुई थी तो न बिजली थी, न लाउड स्पीकर| अतः ऊंची आवाज वाले हज़रत बिलाल रज़ियल्लाहु अन्हु इस्लाम के पहले अज़ान देने वाले के रूप में प्रसिद्ध हुए| मुअज्जिन परम्परा शुरू हुई|


अब भगवती जागरण के आयोजकों पर भी यही अदालती निर्णय लागू हो सकता है| लाभ परीक्षार्थियों को होगा, शोर के कारण बेचारे पढ़ नहीं पाते|



K. Vikram Rao

Mobile -9415000909

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