सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण -Om Prakash Mishra
- statetodaytv

- Nov 18, 2025
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समाज शब्द बहुत व्यापक अर्थ में प्रयोग होता है। है। किसी के एक देश के अन्दर कई समाज हो सकते हैं और किसी समाज के लोग कई देशों में हो सकते हैं। अधिकतर समाज का तात्पर्य एक प्रकार के लोगों की समष्टि से होता है।
जीवन के मूल्य, सामाजिक मूल्य से जुड़े होते हैं। यह बहुत हद तक शाश्वत है, परन्तु समय, काल और परिस्थिति के अनुरूप परिवर्तन अवश्यंभावी है।
सामाजिक मूल्यों का निर्माण व विकास समाज-वैज्ञानिक कानूनविद्, सत्ता और बहुलतावादी सभी प्रकार की शक्तियों से होता है। मानवीय मूल्यों की रक्षा के प्रति सजगता आज भी समाज के हर घटक में देखी जा सकती है। खासकर हमारे युवाओं में अतीत के वैभव के बारे में अपने अतीत के वैभव के बारे में जानने की जिज्ञासा, अपनी परम्परा के अनुसरण की ललक और अपनी क्षमता से आगे बढ़ने की धमक है, जो नवीन आशा का संचार करती है। जो पीढ़ी अपनी परम्परा को जानकर, समझकर आगे बढ़ती है; उससे सामाजिक मूल्य संरक्षित होते हैं।
भारतीय समाज की आधारभूत इकाई व्यक्ति नहीं, परिवार है। संस्कारों से हम कभी व्यक्ति केन्द्रित या आत्म केन्द्रित नहीं रहे। सुखी होने का विचार किया तो “सर्वे भवन्तु सुखिनः” ॥ एवं शान्ति की कामना रही तो विश्वशांति की कामना की अन्तरिक्ष तक शान्ति तक की कामना की। कुटुम्ब यानी परिवार भी तो इस समूची वसुधा को परिवार कहा - “वसुधैव कुटुम्वकम्”॥ हमारा मन्त्र रहा है। अपने घर की बात की, तो पूरे विश्व को एक नीड़, एक घोसला कहा। साथ में भोजन अधिकांश भारतीय परिवारों में होता है। आज भी सामाजिक संस्कारों में में आत्मीय जनों की उपस्थिति अनिवार्य होती है। परिवार में बड़ों का आदर और छोटों को दुलार हमारी संस्कृति के अंग है। यह हमारा परिवार ही है, जो मजबूत सेतु युवाओं व वरिष्ठ सदस्यों के बीच पुल का कार्य करता है। इसलिए सामाजिक मूल्यों को सुरक्षित रखने के लिए, परिवार संस्था को बचाये रखना बहुत जरूरी है। परिवारों में परस्पर संवाद की निरन्तरता, सामाजिक मूल्यों सतत संरक्षण हेतु आवश्यक है। बच्चा अपने माता-पिता से जो सीखता है, वह जब पिता या माता, बनता या बनती है, वह उन मूल्यों को आगे की पीढ़ी को सिखाती है।
भारतीय संस्कृति की जड़ें हमारे मानव-मानव के प्रति प्रेम-स्नेह के आधार पर विकसित हुई है। हमारे आध्यात्मिक मूल्यों से इसका विकास सतत हुआ है। जहाँ विश्व की अन्य संस्कृतियों में इसरी संस्कृतियों को समाप्त करने का भाव रहता है, वहीं भारत के मानव मूल्यों की उदारता का आधार है। अनेकों क्रूर संस्कृतियों ने यहाँ आकर भारतीय संस्कृति की विशालता में समाहित हो गयीं। हमारे यहाँ प्रेम, समरसता, उदारता के आधार पर “सर्वे भवन्तु सुखिनः” के विचार की प्रधानता है।
परम्परा का उद्गम समाज से ही होता है।. सभी विचारों व व्यवहारों का आधार परम्पराओं को जन्म देता है। परम्परा ऐसी व्यापक अवधारणा है, जो हमारे साहित्य, दर्शन, संगीत, नृत्य से लेकर जनसामान्य की बातचीत से विकसित हुई है। हमारे चिन्तन, मनन, अध्ययन व उत्तम संस्कारों के आधार पर हमारी सांस्कृतिक मूल्यों की आधारशिला बनती है। हमारे सांस्कृतिक मूल्य एक साथ निरन्तर अधुनातन व पुरातन दोनों ही है।
आज से लगभग पचास वर्ष पहले जब तक कोई व्यक्ति अपनी कन्या का विवाह ढूढ़ने जाता था, तो लोग यह देखते थे कि विवाह का रिश्ता लेकर जाने वाला कन्या का पिता क्या करते हैं? क्या वह विश्वविद्यालय या डिग्री कालेज में प्रोफेसर है, सरकारी अधिकारी है, न्यायाधीश हैं, अधिवक्ता है, पत्रकार है? समाज में उनकी प्रतिष्ठा कैसी है? बाद में समाज तेजी से बदलने लगा। अब लोग देखते हैं, वह किस वाहन से आया ? यानी वाहन महत्वपूर्ण है, व्यक्ति नहीं। सामाजिक मूल्य का ये अरण पूरे समाज के में दृष्टिगोचर होता है।
मूझे स्मरण है कि जब में इलाहाबाद विश्वविआलय में विद्यार्थी था तो हमारे कई प्रोफेसर साइकिल से विश्वविद्यालय आते थे। अब तो सामान्य ग्रुप “डी” के कर्मचारी भी साइकिल से सामान्यतः नहीं आते।।
अब स्मार्ट मोबाइल, का कीमती कार, ए०सी०, बंगला, विलासितापूर्ण जीवन ही ज्यादातर लोगों का का सपना होता है। दिखाने की प्रवृति की हालत यह है कि शादियों में बेवजह, अनापशनाप खर्च किया जा रहा है।
अब तो शादियों में डेस्टिनेशन वेडिंग, प्रि वेडिंग शूट धनाढ्य तो कर रहे हैं, वीडियो रिकार्डिंग, ड्रोन और खाने की जगह सौ से ऊपर प्रकार के व्यंजन, हाॅट ड्रिंक, कोल्ड ड्रिंक और अनेकों व्यवस्था दिखावे की प्रवृत्ति का ही रूप है।
घरों में खाना बनाने के बजाय, महंगे होटलों में खाना, बाहर से पैक्ट फूड मंगाना, नई पीढ़ी में इतना फैल रहा है कि वह उनके स्वास्थ्य को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है।
यानी “यस्यास्ति वितं सः नरः कुलीनं” का ही अब बोलबाला है। अब यह कोई नहीं देखता कि यह पैसा मेहनत की कमाई का है या बेईमानी/धोखेबाजी/जालसाजी के द्वारा धनागम हुआ है। यह सामाजिक मूल्यों का क्षरण बौद्धिक वर्ग तथा जनसामान्य में चिन्ता का विषय हो रहा है। इन चिन्ताओं के समाधान के, लिए आवश्यक है कि हमारी मूल मान्यताओं को पुनः स्थापित किया जाय। इस हेतु हमारे प्राचीन जीवन मूल्यों को संरक्षित करना जरूरी है।
प्रत्येक राष्ट्र की अपनी विशिष्ट पहचान होती है। भारत, हजारों वर्षों से विश्व प्रकृति एवं अपने जीवनानुभवों के साथ तादात्म्य स्थापित करके, अपनी जीवनशौली बनाने में सफल रहा। विश्व के प्राचीन राष्ट्रों में से एक, भारत की अपनी विशेषतायें हैं, कुछ पद्धतियाँ हैं जो इसे अन्य राष्ट्रों से अलग है। वे सारी विशेषतायें एवं मौलिकता ही, भारतीयता की पहचान है।
वस्तुतः अपनी संस्कृति केवल आस्था ही नहीं होती, बल्कि विश्व संस्कृति को समझने का अवसर तथा खुला मन देती है। भारत की चिन्तन-पट्टति भारतीय समाज की सभ्यता, संस्कृति, जलवायु, परिवेश से प्रभावित रही है। भारत बोध एक विशिष्ट आध्यात्मिक गुण है। यह विशिष्ट आध्यात्मिक गुण भारतीय को एक विशिष्ट देता है।
हमारा राष्ट्र, राजनैतिक नहीं, वरन सांस्कृतिक अवधारणा से बना है। अहिंसा, परोपकार, क्षमा, सत्य आदि गुणों के साथ, यह राष्ट्र ज्ञान में रत रहा है। भारतीयता से एक विशिष्ट भावबोध होता है। यह हर भारतीय की अपनी मातृभूमि और पुण्यभूमि है। प्रत्येक भारतीय इसके
इतिहास को खुद से जोड़ता है। जो इसके दुख-सुख और आशा-निराशा के साथ, जय में खुश और पराजय में दुःख होता है।
भारत कोई सत्ता नहीं है, भारतबोध को आप सत्ता की केन्द्रीयता में नहीं पढ़ सकते हैं। भारत एक यात्रा बोध है। भारत देश-देश घूमना है। भारत बोध में जीवन यात्रा है। आदिशंकर से लेकर ग्वाल तक, यात्रा बोध इसे समझने में सहायक है।
भारत भूमि का एक टुकड़ा मात्र नहीं है। भारत, एक जीता-जागता राष्ट्र पुरुष है। जीता जागता यानी सजीव, संवेदनशील और बोधवान। भारत यानी एक जीवन्त सम्यता है, जो स्वामी विवेकानन्द, लोकमान्य तिलक, रवीन्द्र नाथ ठाकुर, महात्मा गाँधी-सभी अपने चिन्तन में भारत को समझने में अपना योगदान देते हैं। भारतीय संस्कृति, सत्तापरक न होकर, समाज केन्द्रित भावबोध को प्रकट करती है।
भारतीय समाज व भारतीय संस्कृति का समुच्चय, जो विकसित हुआ है, वह हमारी मान्यताओं व जीवन शैली के रूप में प्रकट होता है। हमको अपनी सांस्कृतिक पुण्य परम्परा की आधारशिला को मजबूत रखने वाली जीवन शैली ही आगे भी अपनानी है।
हमारे यहाँ अनीति व अन्याय का साथ नहीं देना ही श्रेयस्कर माना जाता है। अनीतिपूर्ण प्रतिबन्धों को धर्म-मर्यादा का नाम जब भी दिया गया, तब तुरंत उसके विरुद्ध विद्रोह खड़ा किया गया। बड़े भाई की आज्ञा छोटे भाई को मानना चाहिए। परन्तु जब इस मोटे अनुशासन के नियम के साथ जब अनीति को जोड़ा गया तो विभीषण ने अपने बड़े भाई रावण का परामर्श मानने से इन्कार कर दिया। हिरण्यकशिपु पिता तो था, पर वह जो कहता था, वह अनीतिपूर्ण था। प्रहलाद ने अपने पिता की आज्ञा नहीं मानी। हमारी मान्यतायें, न्याय व नीति को पुष्ट करती है। यही भारतीय समाज व भारतीय संस्कृति का आधा आधार है।
भारत में, अर्थ और काम के पीछे लगने उससे प्रभावित होने को ही सच्चा सुख व संतुष्टि नहीं समझा जाता। भारत में गंगा माता के किनारे, कल्पवास में गरीब व धनाढ्य दोनों रेत पर निवास करते हैं। ऐसी कौन सी शक्ति है जो बृद्धजनों तक को भयंकर ठंड में भी एक महीना निवास कराती है, वही हमारी आस्था, हमारी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण बिन्दु है।
भारत में यह विचार है कि मनुष्य तभी सुखी हो सकता है, जो उसे अखण्ड, चिरन्तन और निरन्तर घनीभूत संतुष्टि भाव मिले। यही हमारी संतोषी वृत्ति है। उपभोग का अन्त नहीं है। सुख-सुविधा व विलास भोग बस क्षणिक व अस्थायी है। हमारी समाज रचना ऐसी होनी चाहिए, जिसमें अर्थ व काम का अभाव न हो, लेकिन उसकी मनोकामना ऐसी होनी चाहिए, जिस पर अर्थ और काम का प्रभाव भी न हो। यही हमारी आदर्श जीवन शैली हो हमारी अस्मिता को बनाये रखती है।
हमारे यहाँ लगोटी लगाकर जीवन जीने वालों ने स्मृतियाँ बनाई है। हमारे विचार में राजा भी मानव धर्म के अनुशासन में राज करता है। पश्चिमी संस्कृति में राजदंड सर्वाेच्च है। हमारे यहाँ नीति सर्वाेत्त्व है, जो महापुरुषों ने निर्मित की है।
हमारे यहाँ का भाव “अयं निजो परोवैत्ति गणना लघु चेतसाम्। उदार चरितानांत वसुधैव कुटुम्बकम्” यानी सारी मानवता हमारा परिवार है। हम भेद नहीं करते। जीवन के प्रति आस्था हमारी समरस जीवन शैली, विशुद्ध भारतीय जीवन प़द्धति का आधार है। जटिलता या कुटिलता हमें स्वीकार नहीं है। राजा या शासक / बादशाह आते-जाते रहे भारतीय समाज के जीवन मूल्य शाश्वत ही रहे। उसी से हमारी संस्कृति संरक्षित है।
भारतीय जीवन दर्शन अखिल विश्व के लिए है। संकीर्णता नहीं है। हमारे यहाँ सभी के कल्याण की कामना की गयी है।
“सर्वे भवन्तु सुखिनः,
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु,
मा काश्चत् दुःखभाग भवेत् ॥”
अर्थात् सभी को सुखी जीवन मिले, सभी स्वस्थ रहें। सबका सर्वतोमुखी कल्याण हो और किसी को कीसी प्रकार का दुःख न हो।
यही भाव हमारा आगे भी रहा -
दैहिक दैविक भौतिक तापा। रामराज्य काहुहि नहीं व्यापा।
सब नर कराहें परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रति नीती।
आज भी आदर्श राज्य की कामना रामराज्य में शारिरिक, दैवीय व सांसारिक कष्ट किसी को नहीं होते। सभी लोग मर्यादा में रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं।
भारतीय परम्परा में व्यापकता है, बहुलताबाद है। प्रगाढ़ता है। समावेशी जीवन पट्टति है।

भारतीय परम्परा, अपने राष्ट्र समाज, परिवार, और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं तक की अभिवृद्धि की संकल्पना को संजोती है। व्यक्ति समाज, राष्ट्र, अखिल विश्व एवं समस्त मानवता के मध्य कोई भ्रम नहीं है। व्यप्ति एवं समष्टि दोनों का हित इसमें है।
सत्य तथा असत्य, न्याय तथा अन्याय, शुभ एवं अशुभ, पुण्य तथा पाप, नैतिकता तथा अनैतिका से जुड़े सामाजिक दन्द; मानव समाज के लिए बड़े, प्रश्न रहे हैं। इनका उत्तर भारतीय संस्कृति की संवाहिका के किए दया और उदारता, त्याग, प्रेम, सौहार्द के गुण है। यही भारतीय संस्कृति के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
हम मनुष्यों के साथ-साथ, पशुपक्षी, वनस्पति, जंगल, नदी, सरोवरों, सभी चराचर में देवत्व देखते हैं। भारतीय संस्कृति पर्यावरण के प्रति बहुत सचेत थी।
सृष्टि की रचना, अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश आदि पंचतत्वों से हुई है। भिति, जल पावक, गगन समीरा पंचतत्वों का सम्मिलित स्वरूप ही पर्यावरण है।
आज नई पीढ़ी के समक्ष जो चुनौतियाँ है, उनका हल हमारे चिरातन सामाजिक एवं मूल्यों के संरक्षण में निहित है। पुरानी पीढ़ी का यह दायित्व है कि वे युवा वर्ग कोे इसके लिए मार्ग दिखावें। यह शाश्वत जीवन मूल्य हमारी निधि हंै।
ओमप्रकाश मिश्र
पूर्व मुख्य कार्मिक अधिकारी, उत्तर मध्य रेलवे एवं
पूर्व प्राध्यापक, अर्थशास्त्र विभाग इलाहाबाद विश्वविद्यालय




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