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मथुरा-काशी के सहारे 2024 में करवट ले सकती है देश की राजनीति


लखनऊ, 13 सितंबर 2022 : 'करवट लेती मथुरा, काशी!'' उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इन चार शब्दों को उन शिलाओं के समान मान सकते हैं, जिस पर भाजपा हिंदुत्व के नए मुद्दे की इमारत खड़ी कर सकती है या करना चाहेगी। वाराणसी जिला न्यायालय ने ज्ञानवापी श्रंगार गौरी प्रकरण को सुनने योग्य बताया है। अभी और सुनवाई होनी है, लेकिन भाजपा के दिग्गज नेताओं ने कोर्ट से गूंजी इस मुद्दे की ''किलकारी'' सुन ली है।

मौर्य सहित भगवा ब्रिगेड के अन्य नेताओं के उत्साह भरे शब्द आगे की कहानी सुना रहे हैं कि लोकसभा चुनाव 2024 की चौखट पर काशी के सहारे उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश की राजनीति करवट ले सकती है। ज्ञानवापी श्रंगार गौरी मामले पर वाराणसी जिला न्यायालय का आदेश आते ही भाजपा खेमे से इस पर प्रतिक्रिया शुरू हो गई।

उपमुख्यमंत्री जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे केशव का बयान था- ''बाबा विश्वनाथ जी मां श्रंगार गौरी मंदिर मामले में माननीय न्यायालय के आदेश का स्वागत करता हूं। सभी लोग फैसले का सम्मान करें।'' लेकिन, ''सत्यम शिवम् सुंदरम और करवट लेती मथुरा, काशी!'' जैसे शब्दों में राम मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे मौर्य की भावनाएं हिलोरें मार रही थीं। यह उन्होंने बारी-बारी से ट्वीट किए।

इसी तरह दूसरे उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक भी बेहद उत्साहित दिखे। उन्होंने कहा कि न्यायालय के निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि लोगों की भावनाओं के अनुरूप फैसला आया है। इससे समूचे प्रदेश में खुशी की लहर है। जो लोग उच्च न्यायालय में आदेश को चुनौती देने की बात कह रहे हैं, यह उनका अधिकार है। हम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं।

जलशक्ति मंत्री व भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव ने भी काशी विश्वनाथ धाम मंदिर में मुख्यमंत्री के साथ पूजन करते हुए अपनी फोटो ट्वीट की। लिखा- हर हर महादेव। निस्संदेह यह न्यायालय का निर्णय है। सरकार या किसी दल की कोई भूमिका नहीं, लेकिन निर्णय पर भाजपा का उत्साह और विपक्षी दलों की खामोशी बताती है कि इस निर्णय का महत्व क्या है और देश-प्रदेश की राजनीति पर इसका क्या असर पड़ सकता है।

रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे...! का दशकों तक उद्घाेष करती रही भाजपा के लिए राम मंदिर बड़ा मुद्दा था। सुनवाई न्यायालय में चलती रही और भाजपा आंदोलन की झंडी थामे रही। राजनीतिक दलों ने इसका नफा-नुकसान झेला भी। मंदिर आंदोलन के सहारे भगवा दल को हिंदुत्व की ऐसी विरासत मिल गई, जिसकी साझेदार साफ्ट हिंदुत्व के सहारे न सपा हो पाई, बसपा और न ही कांग्रेस।

2020 में राम मंदिर के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और अयोध्या में मंदिर निर्माण की शुरुआत के साथ ही मथुरा-काशी को लेकर भी धीमे-धीमे स्वर फूटने लगे थे। विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ने का दावा करती भाजपा ने इन मुद्दों पर अयोध्या जैसे आंदोलन की हुंकार भले न भरी हो, लेकिन विधानसभा चुनाव के दौरान घनश्याम कृपा कर दो, मथुरा भी सजाएंगे....जैसे चुनावी गीत कुछ संदेश जरूर देते रहे। अब ज्ञानवापी श्रंगार गौरी प्रकरण पर न्यायालय में भी मंदिर-मस्जिद का पाला बड़ा होता है तो चुनावी मैदान में हिंदूवादी भाजपा और सेक्युलर विपक्ष के बीच मुकाबला शुरू हो सकता है।

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