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देश की हर विवादित मस्जिद को बचाने के लिए 1991 में कांग्रेस ने बनाया था पूजास्थल कानून

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भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आम आदमी वोट डालकर सो जाता है। उसके चुने हुए प्रतिनिधि और सरकारें किस किस तरह के कानून बना डालती है शायद इसका अंदाजा भी नहीं है भारत के लोगों को।


आप हैरान रह जाएंगे ये जानकर की बीते सत्तर वर्षों में संसद के भीतर कुछ ऐसे कानून भी बना दिए गए जो हिंदुओं के खिलाफ हैं। सिर्फ हिंदू ही नहीं जैन, बौद्ध और सिखों के भी खिलाफ हैं।


तो क्या सन् 1991 में सरकार ने हिंदुओं के खिलाफ साजिश रची संसद में कानून बनाकर!


अब सवाल ये है कि इन कानूनों से किसे संतुष्ट करने की कोशिश की गई। जाहिर है तुष्टीकरण की राजनीति करने वालों ने मुसलमानों को ऐसे ऐसे कानून बना कर दिए जो भारत की गुलामी के दौरान मुगलकाल में भी नहीं बने।


अगर सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार से एक सवाल का जवाब ना मांगता तो आज भी देश को इस कानून के बारे में पता ना चलता।


सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा जिसमें 1991 के एक कानून के कुछ प्रावधानों की वैधता को चुनौती दी गई है। 1991 के कानून में किसी पूजा स्थल की 15 अगस्त 1947 की स्थिति में बदलाव या किसी पूजा स्थल को पुन: प्राप्त करने के लिए मुकदमा दर्ज कराने पर रोक है।



पूजा पाठ और धार्मिक विषय राज्य का मामला


याचिका में आरोप लगाया गया है कि 1991 के कानून में 'कट्टरपंथी-बर्बर हमलावरों और कानून तोड़ने वालों' द्वारा किए गए अतिक्रमण के खिलाफ पूजा स्थलों या तीर्थस्थलों के चरित्र को बनाए रखने के लिए 15 अगस्त, 1947 की समयसीमा 'मनमाना और तर्कहीन' है। पूजा पाठ और धार्मिक विषय राज्य का मामला है और केंद्र सरकार ने इस मामले में मनमाना कानून बनाया है। केंद्र ने हिंदुओं, सिख, जैन और बौद्ध के धार्मिक व पूजा स्थल के खिलाफ आक्रमणकारियों के अतिक्रमण के खिलाफ कानूनी उपचार को खत्म किया है। इन पूजा और धार्मिक स्थल पर आक्रमणकारियों ने अवैध व बर्बर तरीके से जो अतिक्रमण किया है उसे हटाने और अपने धार्मिक स्थल वापस पाने का कानूनी प्रक्रिया को बंद कर दिया गया है। इस बाबत जो कानून बनाया गया है, वह गैर-संवैधानिक है।


याचिका में दावा किया गया है कि ये प्रावधान न केवल समानता और जीवन के अधिकार का उल्लंघन करते हैं, बल्कि धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों का भी उल्लंघन करते हैं, जो संविधान की प्रस्तावना और मूल संरचना का एक अभिन्न अंग है।


श्री कृष्ण जन्मभूमि (मथुरा)

सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय की ओर से अर्जी दाखिल कर पूजास्थल कानून 1991 की धारा - 2, 3 और 4 को चुनौती दी गई है और उसे गैर संवैधानिक घोषित करने की गुहार लगाई गई है। पूजास्थल कानून 1991 के तहत प्रा‌वधान है कि 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस समुदाय का था भविष्य में उसी का रहेगा। सुप्रीम कोर्ट में दरअसल दाखिल याचिका में पूजास्थल कानून 1991 के प्रावधान को चुनौती दी गई है।


याचिकाककर्ता का कहना है कि कानून के तहत हिंदुओं को धार्मिक स्थल पर विवाद की स्थिति में कोर्ट जाने से रास्ता बंद करता है। अब मथुरा और काशी जैसे मंदिरों के लिए अदालती दरवाजे बंद करने वाले कानून का सुप्रीम कोर्ट परीक्षण करेगा। पूजास्थल कानून-1991 की वैधानिकता का परीक्षण करने को सुप्रीम कोर्ट तैयार हो गया है।


श्री भाग्य लक्ष्मी मंदिर (हैदराबाद, चारमीनार)

याचिका में दावा किया गया है कि कानून के प्रावधान न केवल अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 15 (धर्म, जाति, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भारतीयों के भेदभाव पर रोक), अनुच्छेद 21 (जीवन की सुरक्षा और निजी स्वतंत्रता), अनुच्छेद 29 (अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा) आदि का उल्लंघन करते हैं बल्कि धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों का भी उल्लंघन करते हैं जो संविधान की प्रस्तावना और मूल संरचना का अभिन्न अंग है।

प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे और न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना की पीठ ने भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया। इस याचिका में उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) कानून, 1991 की धारा 2, 3, 4 को रद्द करने का अनुरोध किया गया है। इसके लिए आधार भी दिया गया है कि ये प्रावधान किसी व्यक्ति या धार्मिक समूह के पूजा स्थल को पुनः प्राप्त करने के न्यायिक सुधार का अधिकार छीन लेते हैं।


श्री काशी विश्वनाथ (वाराणसी)

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यन अदालत में पेश हुए। कानून में केवल एक अपवाद बनाया गया है जो अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी ढांचा से संबंधित विवाद से संबंधित है। नई दलीलें महत्वपूर्ण हैं क्योंकि मथुरा और काशी में धार्मिक स्थलों को फिर से प्राप्त करने के लिए कुछ हिंदू समूहों द्वारा ऐसी मांग की जा रही है। लेकिन 1991 के कानून के तहत इस पर रोक है।


आपको बताते चलें कि मुस्लिम आंक्रांताओं ने भारत पर कब्जे के दौरान सिर्फ अयोध्या ही नहीं बल्कि मथुरा और काशी में कृष्ण और शिवस्थान के साथ साथ देश के अनेकों मंदिरों को खंडित कर गुम्बदी ढांचे खड़े कर मस्जिद की शक्ल देने की कोशिश की। 15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ उसके बाद भी हिंदु, सिख, जैन, बौद्ध अपने धार्मिक स्थलों पर हुए मुस्लिम आंक्रांताओं के अतिक्रमण को समाप्त नहीं कर पाए। जब हिंदू जनमानस ने 90 के दशक में अयोध्या के कलंक को मिटा दिया तो तत्कालीन केंद्र सरकार ने भारत में हिंदुओं समेत जैन,बौद्ध, और सिख समुदाय को हमेशा के लिए कानून का ऐसा फंदा पहना दिया जिससे मुस्लिम वोटबैंक को साधे रखा जा सके।


अब देखना होगा कि वर्तमान सरकार सुप्रीम कोर्ट में क्या जवाब देती है।


टीम स्टेट टुडे



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