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ओहो! तो ये है वो शख्स जिसने खा “पीके” कैप्टन को लगा दिया बारह के भाव !



अब तक कहा जाता था कि पुलिस की ना दोस्ती अच्छी ना दुश्मनी। एक दौर था जब पत्रकारों और वकीलों से भी लोग उचित दूरी बनाए रखते थे। लेकिन अब कुछ ऐसा हुआ है कि सियासत करने वालों के काम खड़े हो गए हैं।

कभी नरेंद्र मोदी के साथ रहे चुनावी रणनीतिकार बीते कई वर्षों से विपक्षी दलों के साथ व्यवसायिक रुप में जुड़कर बीजेपी की जड़े खोदने का काम कर रहे हैं। पहले बिहार और हाल-फिलहाल पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों ने पीके का भाव बढ़ाया है। महाराष्ट्र में शिवसेना हो, यूपी में अखिलेश यादव हो या फिर कांग्रेस पार्टी सबने प्रशांत किशोर को आजमाया है।


आपको ध्यान हो या ना हो लेकिन बीते पंजाब चुनाव में कांग्रेस और कैप्टन ने पीके की मदद ली थी। सियासी जमीन पर अगर कैप्टन अमरिंदर की तूती बोली तो रणनीतिकार के रुप में प्रशांत किशोर उर्फ पीके का भी वजन बढ़ा।


पिछले विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर ने ही कैप्टन की चुनावी रणनीति का संचालन किया था और कांग्रेस की जीत में उनकी बड़ी भूमिका रही थी। इसके बाद से ही कैप्टन पीके को अपना दोस्त जैसे मानने लगे थे और दोनों के बीच काफी मधुर रिश्ते भी थे। प्रशांत किशोर को कैबिनेट रैंक देकर कैप्टन ने अपना सलाहकार भी नियुक्त किया।


उसी पीके ने कैप्टन का ही खा-पीके उन्हें बारह के भाव लगा दिया।



पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू की घेरेबंदी के बीच मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से सूबे की सत्ता की कप्तानी छीनने में सबसे निर्णायक भूमिका कुछ समय पहले तक उनके ही सलाहकार रहे चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की है। पंजाब चुनाव के लिए पीके की सेवाओं को भले ही कैप्टन ने लिया था लेकिन रणनीतिकार ने केंद्रीय आलाकमान से भी तार जोड़ लिए। इसके बाद अपने धंधे-पानी को धार देने के लिए पंजाब के सियासी मिजाज का आकलन कर पीके की टीम ने पिछले कुछ समय के दौरान तीन अलग-अलग सर्वे रिपोर्ट कांग्रेस आलाकमान को दीं।


प्रशांत किशोर की रिपोर्ट में अगले विधानसभा चुनाव में कैप्टन के चेहरा रहते पार्टी को मिलने वाली चुनौतियों के मद्देनजर पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी ने सिद्धू के जरिये कैप्टन के खिलाफ विरोध को उस मुकाम तक पहुंचा दिया जहां अमरिंदर को इस्तीफा देने को बाध्य होना पड़ा।


कांग्रेस हाईकमान ने पिछले कुछ महीनों के दौरान अलग-अलग अंतराल के दौरान कैप्टन सरकार के प्रदर्शन से लेकर पार्टी की चुनावी संभावनाओं का आकलन कराया। पंजाब कांग्रेस की उठापटक के दूसरे चरण में सिद्धू के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद भी एक सर्वे हुआ और इसमें भी प्रशांत किशोर की टीम ने कमोबेश यही रिपोर्ट दी कि कैप्टन के खिलाफ एक बड़े वर्ग में जमीनी स्तर पर नाराजगी है।


सर्वे रिपोर्टों में कैप्टन के राजसी अंदाज के कारण लोगों से बनी दूरी को भी एक वजह बताया गया है। साथ ही सर्वे का यह आकलन भी था कि अमरिंदर को हटाकर किसी नए व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना कांग्रेस अगले चुनाव में इस नाराजगी को थाम सकती है।


इन रिपोर्ट के बाद राहुल गांधी ने प्रशांत किशोर के साथ बैठक कर इस पर विस्तृत चर्चा की और इस दौरान प्रियंका भी मौजूद थीं। इसी के बाद राहुल और प्रियंका ने कैप्टन की विदाई का इरादा तय कर लिया और इस लिहाज से पीके की जमीनी हालात की सर्वे रिपोर्ट ने कैप्टन की मुख्यमंत्री के रूप में पारी खत्म करने की पिच तैयार कर दी।


कैप्टन विरोधी सियासत को आगे बढ़ा रहे सिद्धू ने भी नेतृत्व से मिले इशारों के मद्देनजर विधायकों को कैप्टन के खिलाफ तैयार करने और हस्ताक्षर अभियान चलाने का मोर्चा संभाला। सिद्धू ने विधायकों को जुटाने के लिए सियासी घेरेबंदी की ऐसी फील्डिंग सजाई कि कैप्टन ने खुद ही इस्तीफा दे दिया।


बड़ी बात ये है कि कांग्रेस में शामिल होने की शुरू हुई चर्चाओं और कैप्टन के खिलाफ सिद्धू के सियासी अभियान के बीच कुछ समय पहले ही पीके ने सलाहकार पद से इस्तीफा दे दिया था। सिद्धू तो मोहरा थे। असल खेल तो पर्दे के पीछे बैठ कर पीके कर रहे थे।


जाहिर है पीके के प्रोफेशनल अंदाज को जानकर अब कई पार्टियों के सियासी धुरंधर कहने लगे हैं कि जहां पीके पहुंच जाएं वहां बवाल तो होगा ही। ऐसे में पीके की ना दोस्ती अच्छी ना दुश्मनी और भरोसा तो सियासत करने वाले खुद का भी नहीं करते। सिर्फ इतना ही नहीं कुछ समय पहले पंजाब में एक एफआईआर तक हुई थी जिसमें कहा गया था कि एक शख्स प्रशांत किशोर बन कर विधायकों को कैप्टन के खिलाफ भड़का रहा है।


टीम स्टेट टुडे


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