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क्या दिनेश सिंह ही रोक देंगे Congress के हाथ से फिसलती रायबरेली को !



भारत की 543 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में उत्तर प्रदेश के रायबरेली की कहानी हमेशा से अलग है। रायबरेली ही वो निर्वाचन क्षेत्र है जहां की जनता ने उस खतरे को सबसे पहले भांपा था जिसकी परिणिति आपातकाल के रुप में देश पर थोपी गई।


सदी की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक त्रासदी को भांपने वाले इस निर्वाचन क्षेत्र की जनता ने आपातकाल के बाद अपने फैसले को पलटने में भी देर नहीं लगाई थी।


जिस रायबरेली को सोनिया गांधी अपना बेटा राहुल गांधी सौंप कर आईं हैं हकीकत यह है कि उस निर्वाचन क्षेत्र से अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत करने की हिम्मत खुद सोनिया भी नहीं कर पाईं थीं। वो रायबरेली का खौफ ही था जिसके चलते सोनिया 1999 में पहली बार अमेठी से लड़ीं। 2004 में जब राहुल गांधी राजनीति में आए तब सोनिया ने अपनी अमेठी की सीट राहुल को देकर रायबरेली से चुनाव लड़ा।


सोनिया गांधी फिलहाल राज्यसभा सांसद हैं। लोकतांत्रिक प्रणाली में जनस्वीकार्यता का थर्मामीटर यानी लोकसभा चुनाव से उन्होंने खुद को अलग कर लिया। अमेठी से 2019 में हार का मुंह देख चुके राहुल गांधी 2024 में अपनी मां सोनिया की सीट रायबरेली से प्रत्याशी हैं।


20 मई को रायबरेली में वोट पड़ गए। कौतुहल का विषय है कि राहुल इस सीट पर जींतेंगे या हारेंगें। परंपरागत सीट के हवाला देने वाले कह सकते हैं कि राहुल की जीत निश्चित है। रायबरेली के मूड को भांप कर अपना आंकलन देने वालों के दावों में भी राहुल जीत सकते हैं। परंतु क्या वास्तव में राहुल जीत रहे हैं या रायबरेली की सीट कांग्रेस के हाथ से फिसल रही है, इसका फैसला कैसे होगा ? क्या रायबरेली की जनता गांधी परिवार से इतना अधिक प्यार करती है कि वो हर हाल में राहुल को ही जिताएगी। क्या रायबरेली में गांधी परिवार से इतर भी उम्मीदवारी का कोई मुद्दा है या जनता गांधी परिवार से वफादारी निभाने का सार्टिफिकेट ही सबसे बड़ा एजेंडा है।

 



आपको आश्चर्य होगा लेकिन सच यह है कि कांग्रेस और गांधी परिवार के हाथ से फिसलती रायबरेली की सीट अगर बचेगी तो उसका सबसे बड़ा कारण रायबरेली से बीजेपी प्रत्याशी दिनेश सिंह ही होंगें।

 

वर्तमान में रायबरेली की जनता के लिए गांधी परिवार कोई विशेष महत्व नहीं रखता। केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार का कामकाज, उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के तेवर, पीढ़ियों से गांधी परिवार को जिताने के बावजूद उपेक्षा का शिकार रही रायबरेली में इस बार अमित शाह का गणित भी काम कर रहा है। कुल मिलाकर रायबरेली का मौसल राहुल गांधी के लिए अनुकूल नहीं है लेकिन लोगों के बीच बीजेपी प्रत्याशी को लेकर अलग प्रकार की चर्चा है।


दिनेश सिंह रायबरेली के स्थानीय हैं और पुराने कांग्रेसी भी। भाई – भतीजावाद, जातिवाद और खासतौर से ठकुराई की ठसक से उनका पीछा छूट नहीं रहा। खुद के सरेनी ब्लॉक में ऐन वोटिंग वाले दिन आम वोटर की चिंता यही थी कि मोदी के हाथ मजबूत करने की इच्छा है लेकिन दिनेश सिंह आदमी ठीक नहीं हैं, अपने रिश्तेदारों को हर जगह बैठाकर जन कल्याण के बजाय अपनी जेब और ताकत बढ़ाने में लग जाएंगें..आखिर हैं तो पुराने कांग्रेसी ही। वर्तमान में दिनेश सिंह योगी सरकार में ना सिर्फ खुद मंत्री हैं बल्कि उनके कई सगे-संबंधी महत्वपूर्ण राजनीतिक पदों पर काबिज हैं।


अमेठी की तरफ ताकती रायबरेली की जनता को बीजेपी से एक हैवीवेट कैंडिडेट की दरकार थी जो रायबरेली का स्थानीय ना हो। स्मृति ईरानी अमेठी की कतई नहीं हैं। 2014 में अमेठी आईं, चुनाव हारीं लेकिन जनता का भरोसा जीतने के लिए जीतोड़ मेहनत की। नतीजा 2019 में आ गया जब कांटे की लड़ाई में स्मृति ने राहुल की जमी जमाई सत्ता उखाड़ दी। स्मृति की जीत में एक बड़ा फैक्टर उनका बाहरी कैंडिडेट होना भी था। बीजेपी के भीतर-बाहर के सियासी समीकरणों से इतर जनता को उन्हें आजमाने के अलावा अन्य किसी प्रकार का भय नहीं रह गया और राहुल चुनाव हार गए।

 

रायबरेली भी एक बाहर का कैंडिडेट चाहती थी जो मोदी का भेजा हुआ हो और दिनेश सिंह जैसे तमाम छोटे-बड़े नेताओं से अलग उसका जनता से सीधा कनेक्ट बने। स्थानीय सियासत, स्थानीय गुटबाजी विधानसभा तक सीमित रहती लेकिन केंद्रीय चुनाव में जनता एकतरफा बीजेपी के साथ हो लेती।


वैसे तो दिनेश सिंह 2019 में सोनिया के खिलाफ रायबरेली से बीजेपी के लोकसभा प्रत्याशी थे। चुनाव भी अपने दमभर ठीकठाक लड़ा था। हारने के बाद योगी सरकार में मंत्री भी बनाए गए लेकिन दिनेश सिंह छवि नहीं बदल पाए। स्थानीय होना कोई डिमेरिट नहीं होती लेकिन टीम मोदी के लिए स्थानीय स्तर के नेता को भी रायबरेली जिस कलेवर को देखना चाहती है वो इफेक्ट दिनेश सिंह के पास नहीं है।

 

क्या पता रायबरेली की जनता ने ईवीएम में क्या फैसला कैद किया है। लेकिन, वोटिंग के दिन जनता से बातकर इतना तो समझ आ गया कि रायबरेली की सोच देश के बाकी सभी लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों से आज भी अलग है और इतना अलग है कि वो साधारण को असाधारण करे दे और असाधारण को समाप्त।

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