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नवाबों की जमीन पर बनाया गया लखनऊ का पहला चर्च, लालबाग में स्थापित है एपीफेनी चर्च



एपीफेनी का अर्थ है कि प्रभु के नूर का जलवा। इसी मंशा को लेकर इसका नाम करण हुआ होगा। हालांकि लखनऊ के इतिहास में इसे जहूरबख्श चर्च के नाम से भी जाना जाता रहा है।


1857 की क्रांति का बिगुल बजने के साथ ही अंग्रेजों की चूले हिल चुकी थीं। अवध में क्रांति को लेकर सभाओं का दौर शुरू हो गया था। इसी बीच इसाई समाज के धार्मिेक लोग अपने गिरजाघर को संवारने और स्थापित करने में लग गए। लालबाग स्थित नवाब जहूर बख्श कोठी के एक हिस्से को अंग्रेजों ने जब बेचने का मन बनाया तो पादरी लियोपोलट ने इसे खरीद लिया।



यह पहला चर्च है जो नवाबों की विरासत वाली जमीन पर बना है। आठ नवंबर 1875 में चर्च का शिलान्यास किया गया और 25 दिसंबर 1877 को यहां प्रभु यीशु की पहली बार प्रार्थना की गई। 15 हजार रुपये में तैयार हुए चर्च के नामकरण को लेकर काफी मंथन किया गया और फिर इसका नाम एपीेफेनी रखा गया। कैथेडरल के फादर डॉ. डोनाल्ड डिसूजा ने बताया कि एपीफेनी का अर्थ है कि प्रभु के नूर का जलवा। इसी मंशा को लेकर इसका नाम करण हुआ होगा। हालांकि लखनऊ के इतिहास में इसे जहूरबख्श चर्च के नाम से भी जाना जाता रहा है। हर सान छह जनवरी को प्रभु यीशु के नूर का दिवस मनाया जाता है। यहां आने से आने से विश्वासियों को शांति की अनुभूति होती है।

 

 



चर्च को गॉथिक शैली में बनाया गया था जिसके शीर्ष पर बीस मीनारें थीं, चर्च के उत्तर में प्रवेश द्वार पर एक क्रॉस लगा हुआ था। इसकी क्षमता एक सौ तीस लोगों की थी। चर्च की आंतरिक दीवारों में अभी भी बड़ी संख्या में संगमरमर की पट्टियाँ और पॉलिश पीतल की पट्टियाँ रखी हुई हैं जो संघर्ष के दौरान मारे गए ब्रिटिश सेना अधिकारियों, नागरिकों और पादरियों की याद में बनाई गई थीं। ट्रांससेप्ट में एक संगमरमर की गोली मुहम्मदी के डिप्टी कमिश्नर जेम्स ग्रांट थॉमसन को समर्पित है, जिनकी शिलालेख के अनुसार '5 जून, 1857 को अवध के औरंगाबाद में विद्रोहियों द्वारा हत्या कर दी गई थी।' दूसरा श्रद्धेय हेनरी पोलेहैम्प्टन को समर्पित है। 1904 में चर्च का विस्तार और सुधार किया गया। एक घंटाघर दक्षिण में ट्रांससेप्ट से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। घंटाघर में एक शिखर है जो आकाश की ओर इशारा करता है और शिखर पर एक क्रॉस है। बताया जाता है कि 1933 में आए भूकंप के कारण क्रॉस मुड़ गया था। चर्च में ईसाई धर्म की प्रतिष्ठित आकृतियों का प्रतिनिधित्व करने वाले सना हुआ ग्लास ट्रिप-टाइक भित्ति चित्र हैं।

 



बड़ा शिखर पूर्व में वेदी के लिए पृष्ठभूमि प्रदान करता है जबकि तुलनात्मक रूप से छोटा शिखर मुख्य प्रवेश द्वार के ऊपर पश्चिम में दिखाई देता है। दोनों तीन पैनल वाले भित्तिचित्रों में मुख्य पेंटिंग के शीर्ष पर एक दूसरे को काटते हुए मेहराबों के भीतर चित्रित हैं।



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