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कोरोना महामारी- एक दृष्टि *क्या हम शाकाहार और सादगीपूर्ण जीवन शैली की ओर बढ़ रहे?*

ओमप्रकाश मिश्र-- आजकल का जीवन व जीवन-शैली, एक ऐसी दुनिया की तस्वीर प्रस्तुत करती है, जिसकी कल्पना भी, हमारी पीढ़ी कभी नहीं कर सकती थी। मनुष्य समय के सापेक्ष भी सोचता है तथा समय से परे भी। परन्तु महामारियों के इतिहास में गए बिना, मोटे तौर पर यह तो माना ही जा सकता है कि वर्तमान संकट अभूतपूर्व है एवं अकल्पनीय है। मानव इतिहास में इतना डरा हुआ आदमी शायद ही कभी रहा हो। युद्धों तथा यहाँ तक की विश्वयुद्धों (प्रथम व द्वितीय) में भी सम्भवतः सारा संसार डरा हुआ नहीं रहा होगा। आज तो क्या यूरोप, क्या एशिया, क्या अन्य महाद्वीप सारे के सारे भयभीत, चिन्तित हैं। क्या गाँव, क्या कस्बा, क्या शहर, क्या महानगर, सभी के निवासी एक भय के महौल में जी रहे हैं। मानवता का ऐसा अदृश्य शत्रु, शायद कभी भी, मानव-इतिहास में न रहा हो, जिसको मारने के लिए अस्त्र/शस्त्र की खोज नहीं हो पा रही है। जीवन बचाने के लिए रक्षा-कवच ही उपलब्ध नहीं हैं।


विज्ञान व प्रौद्योगिकी के प्रति अगाध आस्था, आज हिल चुकी है। इन्सान को उसके अपने वजूद व अस्तित्व के लिए विज्ञान व प्रौद्योगिकी की उपादेयता भी प्रश्नों के घेरे में आ सी गई है। कहाँ एक तरफ, खासकर पश्चिमी देशों में आविष्कारों के कारण, विज्ञान ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में तथा जीवन शैली में आमूलचूल बदलाव किए, और दूसरी तरफ तथाकथित पिछडे़/अल्पविकसित देशों की जीवनशैली भी वैसी ही बदलती चली जा रही थी। मनुष्यों ने बडे़-बड़े बाँध बनायें, सुरंगो के अन्दर भयंकर विस्फोट किए, जंगलों को बड़े पैमाने पर काट डाला, क्या आकाश क्या धरती और क्या महासागर, सभी जगह प्रकृति व ईश्वरीय संसाधनों का शोषण व विनाश का चक्र चलाया। जंगली जानवरों का बड़े पैमाने पर नाश किया। आदमी का पेट अन्न, फल, फूल, वनोपजों, दुग्ध व दुग्धहारों से नहीं भरा जा रहा तो सारे पशु, पक्षी, जंतुओ से पेट भरने की जीवन शैली बनायी जाने लगी। भूगर्भ जल को असीमित रूप से निकालकर, भूमिगत जल का स्तर नीचा करते गये।


परिणाम सामने आयें। अन्धाधुन्ध/ वनों के विनाश व बाँधों के निर्माण व अन्यान्य कारणों से भयावह बाढ़ लगभग प्रतिवर्ष आने लगी। भारी मात्रा में जनधन की हानि लगभग हर वर्ष दिखलायी पड़ती है। हथियारों की अंधी दौड़ जो विशेषतः द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दिखायी पड़ी, उसका परिणाम यह हुआ कि विकासशील देश भी, महाशक्तियों पर हथियारों के लिए अनुयायी जैसे हो गये। अपने-अपने देशों की गरीब जनसंख्या की चिन्ता न करके तोप, टैन्क-युद्धक विमान-मिशाइलें-परमाणु युद्ध की सामग्री-बम आदि के निर्माण व आयात में प्रतिस्पर्धा करने लगे।


परिणाम यह हुआ कि विकासशील राष्ट्र, विदेशी कर्ज के चंगुल में आते गये। उनकी विदेश नीति व कभी-कभी देश की आर्थिक नीति भी बड़ी शक्तियों के प्रभाव में आती गयीं। आधुनिक व वैज्ञानिक सोच के नाम पर बड़े-बडे पूँजीप्रधान उद्योग खड़े किए गये। मनुष्य के उपभोग की आवश्यक-आवश्यकताओं को दृष्टि में रखकर नहीं, वरन् बाजार को दृष्टि में रखकर ऐसा किया गया। मनुष्य, उनके प्राचीन चिन्तन व आर्थिक नीतियों से हटता गया। जिन स्थानों पर बड़े कारखाने लगाये जाने लगे, जहाँ न तो उन चीजों के उत्पादन के साधन थे, न ही श्रम उपलब्ध था, साथ ही साथ, न ही उन वस्तुओं की माँग वहाँ पर थी। “ग्लोबल विलेज” की एक भ्रामक अवधारण ने ऐसा किया। यह पूरी मानव जाति के लिए एक प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है। यह सत्य है कि विज्ञान ने चिकित्सा के क्षेत्र में चमत्कार किए हैं, किन्तु पिछले कई दशकों से ऐसी-ऐसी बीमारियाँ सामने आई हैं, जिनका सटीक इलाज नहीं ढूढ़ा जा सका है। कई बार ऐसे संक्रामक रोग, कुछ क्षेत्र-विशेष में आते रहें हैं, जिनसे मानव जाति का भारी नुकसान भी होता रहा हैं।


आज के समय में जो भयानक संक्रामक महामारी “कोरोना” के कारण आयी है, उसने कहीं न कहीं सभी के मन में ऐसा डर वैश्विक स्तर पर, खड़ा कर दिया हैं कि सभी असहाय से हो गये हैं। बड़े-बडे़ विकसित राष्ट्रों में हजारों की संख्या में लोग इस महामारी के कारण, काल के गाल में समाते जा रहें हैं। जिन विकसित देशों की स्वास्थ्य, स्वच्छता आदि की व्यवस्था को विश्व के सामने मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया जाता था, वे इतने लाचार दिख रहें हैं, कहीं न कहीं, माल्थस का जनसंख्या का सिद्धान्त लागू होता सा दिखाई पड़ता हैं। यदि ऐसा न भी हो तो भी मनुष्य का दर्प, गर्व, अभिमान चकनाचूर तो हुआ ही है। प्रकृति व ईश्वर के समक्ष, हम कुछ नहीं हैं, ऐसा भाव लगभग सभी के मन में आ रहा है। आज के इस बाजारवादी समाज में, अनेक भौतिक सुख-साधनों को येन-केन प्रकारेण, अपने सुख के लिए एकत्र करने के बावजूद आनन्द का अनुभव नहीं कर पा रहा हैं। वह भौतिक सुखों की खोज में, नैतिक रूप से पतित होकर भी कुछ थोडा सा आत्मिक आनन्द नहीं पा सक रहा है। वह, विवेक रहित होकर अल्पकालिक भौतिक सुखों व तात्कालिक लाभ के दृष्टिगत, अन्धी दौड़ में शामिल हो गया है।


उपभोक्तावादी संस्कृति के मकड़जाल से त्रस्त हमारी पीढ़ी के लिए चिन्ता की बात यह है  कि इसने धर्मानुशासित राष्ट्र को भी कुछ हद तक अपने प्रवाह में ले लिया है। वैज्ञानिक उन्नति, औद्योगिक विकास और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के कारण हमारी नैतिक शक्ति, परम्परागत मूल्यों में हमारी आस्था पर भी कुठाराघात करने के चेष्टा की जा रही है। भारतीय जीवन दृष्टि तो त्याग पूर्वक भोग में है।

ईशोपनिषद में कहा गया है:- ईशावास्यमिदं सर्वं यत्कंचित जगत्यां जगत्।

तेन त्येक्तेन मुन्जीथा, मा गृध कस्यस्विद् धनम्।।

‘ईशोपनिषद - प्रथम मन्त्र’ अर्थात इस अखिल ब्रम्हाण्ड में जो कुछ जड़ चेतन रूप वस्तु हैं, वह सब ईश्वर के द्वारा व्याप्त हैं। उस ईश्वर को ध्यान में रखते हुए त्याग पूर्वक सांसारिक वस्तुओं को भोगते रहो उनमें आसक्त मत हो। भोग्य पदार्थ (धन) किसी के नहीं हैं।

संत कबीर ने भी कहा है:- “गोधन गजधन बाणीधन और रतनधन खान। जब आवे संतोष धन, सब धन धूरी समान।।”

हमारी दृष्टि में तो पूरा ब्रम्हाण्ड, सारी धरती की चिन्ता करनी है। हमारी संस्कृति में, हमारी जीवन शैली में स्वार्थपरता और केवल अपनी ही चिन्ता का विषय नहीं था।


हम तो सारी सृष्टि के बारे में सोचते थे - “अयं निजः परोवेति, गणना लघु चेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।“ -महोपनिषद (अध्याय 4, श्लोक 71)

अर्थात यह मेरा, यह अन्य का ऐसा समझने वाले की गणना क्षुद्र प्राणियों में होती है। उदार चरित्र मानव वसुधातल पर पले प्राणियों में पारिवारिक दृष्टि रखकर समदर्शी हुआ करते थे। विश्वबन्धुत्व का भाव रखने वाले, उन महान पूर्वजों के चिन्तन एवं आदर्श हमें मानवता की उच्च भूमिका लक्षित होती है:-

“पुमान् पुमांस परिपातु विश्वतः।।” ऋग्वेद 6-75-14 हमारी मन्यता रही है कि पृथ्वी हमारी माता है और हम पृथ्वी के पुत्र हैं:-

“माता पृथ्वी पुत्रोऽहं पृथिव्याः”  मानवता के उच्च धरातल पर स्थित मनुष्य सभी के शुभ व शिव का आकांक्षी होता है।

“सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित दुःख भाग्भवेत्।।”

-वृहदारण्यक उपनिषद प्रभु से प्रार्थना है कि वे जन में मंगलमयी मानवता की ज्योतिजलाकर विश्व का कल्याण और सच्चरित्रता की रक्षा करें। हम तो सभी के सुखी, निरोगी होने की कामना करते हैं। किसी को दुःख न मिले। सभी का कल्याण हो। परन्तु पिछले कुछ शताब्दियों से मानव मात्र और हमारा आचरण भी दूषित हुआ है। यह सत्य है कि हम विश्व से अछूते नहीं रह सकते, परन्तु यदि हमारी जीवन शैली, जो समस्त मानवता, पशु, पक्षी, पर्वत, नदीं, समुद्र, पर्वतो, जंगलों, पूरी की पूरी पृथ्वी, समस्त ब्रम्हाण्ड की चिन्ता करती थी, सभी में जीवत्व का दर्शन करती थी, यदि वह हमारे मनमस्तिष्क के केन्द्र में रहा होता तो सम्भवतः हम कुछ बेहतर होते और सारी दुनिया के सामने हम एक अच्छी जीवन-शैली का विकल्प प्रस्तुत कर सकते थे।