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कोरोना ठीक हुआ तो दिखे साइड इफेक्ट - याददाश्त का जाना, खून के थक्के जमना तो किसी को हाई डायबिटीज़

May 10, 2021
3 min read


कोरोना वायरस से संक्रमण के बाद जो लोग ठीक हो रहे हैं उनमें नई-नई समस्याएं पैदा हो रही है। अब तक इस महामारी को लेकर यही लग रहा था कि इसका सिर्फ फेफड़ों पर असर पड़ता है लेकिन जैसे-जैसे कोविड के नए वेरिएंट आ रहे हैं वैसे-वैसे ये अपने तमाम तरह के सिम्टम्स भी ला रहे हैं।


कोरोना संक्रमण का असर अब दिमाग तक पहुंचने लगा है। आइसीयू और एचडीयू में भर्ती मरीजों में नई तरह की समस्या डॉक्टरों को देखने को मिल रही है। किसी को अपना नाम नहीं पता है तो परिवार को नहीं पहचान रहा है। डॉक्टरों और स्टॉफ से भी बच्चों जैसी हरकते कर रहे हैं। यह समस्या हैलट अस्पताल कानपुर में सामने आई है।


दिमाग पर असर


कोरोना संक्रमण की वजह से इंटेसिव केयर यूनिट और हाई डिपेंडेंसी यूनिट में भर्ती मरीजों में नकारात्मक प्रभाव आने लगे हैं। उनमें मनोरोग जैसे लक्षण मिले हैं। कोई अपना नाम भूल गया है तो किसी को पत्नी, मां और पिता के बारे में कुछ पता नहीं है। डाक्टर और स्टाफ के पूछने पर उलटा जवाब दे रहे हैं। खाना खाने और दवाओं के सेवन के लिए कहने पर नाराज हो जाते हैं। कुछ के स्वभाव में तो बहुत ज्यादा गुस्सा है। उन्हें नींद की गोलियां देनी पड़ रही हैं।


इस स्थिति को आइसीयू साइकोसिस कहते हैं। यह समस्या ज्यादातर युवाओं और फील्ड वर्क करने वालों में सामने आ रही है।


क्या होता है आइसीयू साइकोसिस


गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल (जीएसवीएम) मेडिकल कालेज के मनोरोग विभाग के प्रो. गणेश शंकर का कहना है कि जान जाने की नौबत वाली बीमारी होने पर दिमाग बेहोशी की हालत में चला जाता है। रोगी को कुछ भी समझ में नहीं आता है। इसे आइसीयू साइकोसिस या डेलिरियम कहते हैं।


रोगी को समय, जगह और व्यक्ति की जानकारी नहीं हो पाती। बीमारी के कारण पहले से ही डरे होने से आइसीयू का माहौल और प्रभावित करता है। आइसीयू में हमेशा लाइट जलने के साथ मॉनीटर, वेंटिलेटर आदि की आवाजों से भी परेशानी होने लगती है।


ऐसे मरीजों की काउंसलिंग और इलाज के लिए मनोरोग विशेषज्ञ को दिखाया जा रहा है।


मधुमेह की समस्या


पिछले दिनों एक शोध में कुछ ऐसे कोरोना संक्रमित मरीज भी पाए गए, जो रिकवरी के बाद डायबिटीज का शिकार हो गए। ये वो लोग थे जिनमें शुगर की जरा भी हिस्ट्री नहीं थी। कोविड के बाद ये डायबिटीज के मरीज भी बन गए।



खून के थक्के या चकत्ते जमने की समस्या


कोरोना से संक्रमित कुछ मरीजों में खून के थक्के भी बनने शुरू हो गए हैं। हाल ही में कुछ मरीजों की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि उनके अंदर खतरनाक तरीके से खून के थक्के जम गए। ऐसी स्थिति में इन थक्कों को तुरंत हटाना जरुरी होता है ताकि शरीर के अंगों को बचाया जा सके।


क्या कहती है रिसर्च और डॉक्टर


विश्व स्तरीय शोध में पाया गया है कि अस्पताल में भर्ती कोविड-19 के 14 से 28 फीसदी रोगियों में रक्त थक्का जमने की बात सामने आई है। जिसे डीप वेन थ्रोम्बोसिस के नाम से जाना जाता है। वहीं दो से पांच फीसदी रोगियों में आर्टेरियल थ्रोम्बोसिस का मामला सामने आया। एक्सपर्ट्स का कहना है कि संक्रमण फेफड़े के साथ रक्त कोशिकाओं से भी जुड़ा हुआ है।


दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल सर्जन डॉ. अंबरीश सात्विक का कहना है कि औसतन हर हफ्ते इस तरह के पांच-छह मामले सामने आ रहे हैं।


​अप्रैल में प्रकाशित यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड के एक अध्ययन के अनुसार, COVID-19 के बाद दुर्लभ रक्त के थक्के जमने का जोखिम सामान्य से लगभग 100 गुना अधिक है।


सिर्फ इतना ही नहीं जो लोग कोरोना संक्रमित हुए, घर पर ही आइसोलेट रहे और अब ठीक हो गए हैं उनमें भी चिड़चिड़ाहट और झुंझलाहट के लक्षण देखे जा रहे हैं।


टीम स्टेट टुडे


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