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दिल्ली मर रही थी और केजरी...

Updated: Jun 20, 2020


चिता जलाने की जगह नहीं बची
दिल्ली के पंजाबी बाग का शमशान घाट कोरोनाकाल



यूरोप की प्रसिद्ध कहावत है कि जब रोम जल रहा था तो नीरो बांसुरी बजा रहा था। यह कहावत आज एक मुहावरा बन चुकी है और इसका उपयोग उन लोगों के लिए किया जाता है जो महत्वपूर्ण पद पर होते हुए भी किसी आपातकालीन स्थिति में अपने लोगों को बचाने के लिए कोई एक्शन ना ले। शायद इसीलिए यह कहावत आज दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर एकदम सटीक बैठ रही है।


देश की राजधानी दिल्ली का आज कोई कोना, कोई मोहल्ला, कोई बस्ती, कोई कॉलोनी, कोई जिला ऐसा नहीं बचा है जहां कोरोना वायरस ने अपनी मौजूदगी दर्ज ना करा दी हो। देश की राजधानी में कोरोना के कहर का आलम यह है कि शमशान घाट में भी शवों को अपनी बारी के लिए घंटों नहीं बल्कि कई-कई दिनों का इंतजार करना पड़ रहा है। ऐसे में अस्पतालों के हाल का तो जिक्र ही क्या करें।


मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल खुद एक बार आइसोलेट हो चुके हैं जबकि उनके स्वास्थ्य मंत्री सतेंद्र जैन तो खुद अब ही अस्पताल के बिस्तर पर कोरोना से जंग लड़ रहे है। व्यक्तिगत तौर पर मैं स्वास्थ्य मंत्री सतेंद्र जैन जी के जल्द स्वस्थ होने की ईश्वर से कामना करता हूं लेकिन यहां दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के लिए एक सवाल भी खड़ा होता है कि जब दिल्ली सरकार के अस्पतालों में विश्वस्तरीय है तो फिर दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री को निजी अस्पताल में भर्ती क्यों कराना पडा? क्या अरविंद केजरीवाल इस सच को कबूल करेंगे कि उनकी सत्ता की हवस ने आज दो करोड़ से ज्यादा दिल्लीवासियों को मौत के मुहाने पर खड़ा कर दिया है।

अरविंद केजरीवाल, मुख्यमंत्री दिल्ली

बड़ा सवाल अरविंद केजरीवाल की उन योजनाओं पर भी है जिनका ढिंढोरा वो पिछले पांच साल से पीट रहे थे। कोरोना महामारी के आगमन से पहले केजरीवाल और उनके पार्टी का हर छोटा-बड़ा नेता मोहल्ला क्लीनिक को अपनी सरकार की सबसे बड़ी और सबसे कामयाब योजना बताते नहीं थकते थे। एक ऐसा शहर जिसकी आबादी दो करोड़ से ज्यादा है, एक ऐसा शहर जहां देश के हर कौन से आया नागरिकता बसता है, एक ऐसा शहर जहां से पूरे देश की कमान संभाली जाती है, उस शहर की स्वास्थ्य व्यवस्था सड़क किनारे 12x24 की अस्थाई सैड में बने मोहल्ला क्लीनिक के भरोसा छोड़ दी गई। पांच साल में दिल्ली सरकार स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा मजबूत करने की बजाय सत्ता के लिए मुफ्त की रेवड़ियां बांटती रही और लोग भी लालच में जैसे अंधे ही हो गए।


दिल्ली में लॉकडाउन

लेकिन कहते है कि सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते। देश में कोरोना महामारी की दस्तक के साथ ही केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने लॉकडाउन लगाने का फैसला इस उद्देश्य से किया था कि इस दौरान सभी राज्य सरकारों को अपनी तैयारियां करने का मौका मिल जाएगा। उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों ने इस मौके का सदुपयोग भी किया। लेकिन हद तो यह हो गई कि लॉकडाउन के दौरान जब कोरोना से निपटने की तैयारियां करनी थी तब अरविंद केजरीवाल टेलीविजन के सामने अपना चेहरा चमकाने में व्यस्त थे।


शायद ही कोई भूला होगा कि कैसे हर रोज अरविंद केजरीवाल किस तरह कैमरों के सामने छाती ठोककर दावा करते थे कि उनकी सरकार तैयारियों के मामले में कोरोना से पांच कदम आगे चल रही है। लेकिन आज दिल्ली के हालात किसे से छिपे नहीं है। सरकारी अस्पतालों में जहां कोरोना संक्रमित मरीज एक अदद बिस्तर के लिए दर-दर की ठोकरे खाने को मजबूर है तो निजी अस्पतालों में तो जैसे इलाज के नाम पर खुली लूट मची है।

केजरीवाल तो पहले ही हाथ खड़े कर चुके है। लेकिन जले पर नकम छिड़कना यह है कि लाखों के विज्ञापन के जरिये टेलीविजन पर बार-बार आकर दिल्लीवालों को सलाह भी दे रहे हैं कि आप अपना इलाज खुद अपने ही घर पर रहकर करे।



रविन्द्र चौधरी, वरिष्ठ पत्रकार

खैर, गनीमत यह है कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है और केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार है। दिल्ली के हालात और ज्यादा ना बिगड़े इसलिए अब कोरोना के खिलाफ जंग की पूरी कमान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अपने हाथों में ले ली है। चंद दिनों पहले जहां दिल्ली सरकार ने टेस्ट की संख्या घटाने का फैसला लिया था तो अब दिल्ली में कोरोना के हॉटस्पॉट पर ही टेस्ट किए जा रहे है। खुद देश के दोनो गृह राज्य मंत्री जी किशन रेडी और नित्यानंद राय एक-एक टेस्टिंग सेंटर का दौरा कर रहे है। लेकिन ताज्जूब में डालने वाली बात यह है कि अभी तक मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ना तो एक कोरोना अस्पताल का निरीक्षण करने गए है और ना ही उनकी सरकार का कोई बड़ा मंत्री किसी कोरोना टेस्टिंग सेंटर पर गया। ऐसे में यहीं कहा जा सकता है कि शायद अरविंद केजरीवाल और उनके मंत्री अभी भी नीरो की तरह बांसुरी बजाने में ही व्यस्त है।

रविन्द्र चौधरी, वरिष्ठ पत्रकार

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