google.com, pub-3470501544538190, DIRECT, f08c47fec0942fa0
 

तब क्या था जब कुछ नहीं था! - हृदयनारायण दीक्षित



हृदयनारायण दीक्षित


चैमासा के चार माह व्रत उपासना का सुंदर अवसर है। विद्वानों ने 12 महीनों मे से चार महीने का दायित्व, कर्त्तव्य और आनंद को एक अवधि में लाने का प्रयास किया है। हिन्दू संस्कृति में आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन मास पवित्र माने गये हैं। ये आषाढ़ शुक्ल एकादशी से प्रारम्भ होते हैं। कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चलते हैं चार माह में जीवन को एक नया आयाम मिलता है। तप और साधना को बल मिलता है। प्रकृति सदा से है। परिवर्तनशील है। अखंड सौभाग्यवती भी है। प्रकृति का एक-एक अंश गतिशील है। अनेक विद्वान इसे सांस्कृतिक दृष्टि से देखते हैं। प्रकृति के अणु और परमाणु न केवल गतिशील है, बल्कि नाच रहे हैं। ऋग्वेद में सृष्टि के उद्भव का सुंदर उल्लेख है। बहुत अध्ययन योग्य एक मंत्र है।


इसमें प्रश्न है कि पहले था क्या? न सत् था, न असत् था, न रात्रि थी, न दिन था। तब क्या था? यह एक आश्चर्यजनक जिज्ञासा है। ऋषि बताते हैं- “अनादी वातं स्वधया तदेकं”। उस वातावरण में वायु नहीं है, लेकिन वह एक अपनी क्षमता के आधार पर “स्वधया तदेकं”, सांस ले रहा है। वैदिक साहित्य में असत् और सत् का अर्थ सत्य और झूठ नहीं है। आगे बताते हैं कि असत् से सत् प्रकट हुआ। सृष्टि के पूर्व असत् है। असत् का अर्थ है अव्यक्त। उससे व्यक्त प्रकट हुआ। जब यह व्यक्त हुआ। तब ऋषि बताते हैं कि हे देव! आप बहुत नाचे। ग्रिफ्थ ने ऋग्वेद के इस अंश के अनुवाद में ‘डांसिंग’ शब्द का प्रयोग किया है। सत् प्रकट हुआ। देवता नाचने लगे। अस्तित्व सदा से है। इसका आदि और अंत नहीं है। यह सदा से है, सदा रहने वाला है। इसके भीतर चेतना का प्रवाह है। यह प्रकृति के प्रत्येक अंश में व्याप्त है। प्रकृति व्यक्त होती है। खिलती है, कभी-कभी अदृश्य होती है। कभी दृश्य होती है, कभी व्यक्त होती है, कभी अव्यक्त होती है। लेकिन यह एक ही चेतना है। यही सृष्टि के सभी रूपों में व्याप्त है।


ऋग्वेद में इसके लिए एक सुंदर मंत्र/काव्य में कहते हैं- “इन्द्रर्यथैको भुवनं प्रविष्टो, रूपं रूपं प्रतिरूपो वभूवः”। यह एक इंद्र है। यही सबके भीतर है। भारत में अपनी बात कहने की और काव्य के रूप में उपस्थित करने की एक विशिष्ट परंपरा है। ऋषि कहते हैं-“इन्द्रर्यथैको भुवनं प्रविष्टो, रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूवः”। यह एक ही इंद्र है, जो प्रत्येक रूप में, रूप-रूप प्रतिरूप हो रहा है। प्रकृति अखंड सौभाग्यवती है और रूपवती भी है। हमारे सामने रूप है। रूप के भीतर एक ही परम सत्ता है। उपनिषदों में भी यही बात कही गई है- “अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो, रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूवः”। यह एक ही अग्नि सभी रूपों में रूप-रूप प्रतिरूप दिखाई पड़ रही है। यही बात भिन्न-भिन्न रूपों के लिए अपनी परंपरा में हजारों वर्ष से चली आ रही है। सर्वत्र एक ही चेतना है। कठोपनिषद में वायु के लिए कहते हैं-“वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूवः”। एक ही परम चेतना विभिन्न रूपों में प्रकट हुआ करती है। यह हमको सत्-चित्-आनंद से भर देती है। जहां-जहां गतिशीलता है, वहां वहां समय होता है। भारत में 6 प्राचीन दर्शन हैं। उसमें से एक वैशेषिक है। वैशेषिक दर्शन के दृष्टा ऋषि ने काल को, द्रव्य बताया है। विज्ञान के लोग आश्चर्यचकित होंगे कि समय द्रव्य कैसे हो सकता है? यहां आत्मा भी द्रव्य है और काल भी।


चरक संहिता में भी आत्मा व काल को द्रव्य बताया गया है। अथर्ववेद में काल सूक्त है। भृगु का गाया हुआ। बताते हैं कि काल में मन है, काल में प्राण है, काल में मृत्यु है, काल में जीवन है, काल में फूल खिलते हैं, बीज बनते हैं। काल की महिमा बहुत व्यापक बताई गई है। पहले गति, फिर काल। काल में फिर नया रूप। रूप एक है। रूप दिक् काल में ऋतु है। ऋतुओं का आनंद है। प्रत्येक ऋतु के गीत हैं, अपने अनुष्ठान हैं। प्रत्येक ऋतु के अपने कर्मकांड भी हैं। ऋतु प्रकट चेहरा है। इसके पीछे अंतर्निहित है पूरे ब्रह्मांड का संविधान। उसका नाम है ऋत। ब्रह्मांड को अंग्रेजी भाषा में कहें तो कई शब्द हैं। कॉसमॉस, यूनिवर्स। ऋत् प्रकृति का कॉन्स्टिट्यूशन है। ऋत का चेहरा है ऋतु। हमारे लोकजीवन में ऋत यानी प्रकृति का संविधान लागू है।


ऋतुएं आती हैं। अपने-अपने ढंग से आती हैं। प्रकट अस्तित्व का कोई भी नाम रख सकते हैं। प्रकृति रख सकते हैं। ब्रह्मांड रख सकते हैं। भगवान रख सकते हैं। शिव रख सकते हैं। सारे शब्द भारत की प्रज्ञा, रीति, प्रीति, भारत की संस्कृति का भाग हंै। साल में चार महीने हमारे पूर्वजों ने अलग से निकाले। यह महीने पुराणों में, विभिन्न प्राचीन आख्यानो में सब जगह मिलते हैं। इसमें कुछ कर्म करणीय हैं। कुछ अकरणीय। अकरणीय की सूची ध्यान से देखने योग्य है। इन चार महीनों में मंगल कार्य नहीं हो सकते। विवाह नहीं हो सकते। इस सूची का निर्माण तत्कालीन परिस्थितियों के आधार पर हुआ है। इसी चैमासा में वर्षा का अपना आनंद है। आकाश से मेघ धरती तक आते हैं। धरती माता की प्रीति उन्हें नीचे खींच लेती है। वर्षा अपनी मस्ती में आती है। मस्ती में गीत भी उगते हैं। ज्यादा वर्षा में कष्ट भी होता है। ऐसे दिनों में यात्रा सुखदाई नहीं होती। ऐसे दिनों में हमारे शरीर का पाचन तंत्र कुछ विश्राम की स्थिति में चला जाता है।ऐसे में एक ही बार भोजन करना चाहिए। हमारे पूर्वज वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समृद्ध थे। वैज्ञानिक विचार दृष्टि के आधार पर बहुत पहले ही बता दिया गया था कि इन-इन महीनों में यह करना है, यह नहीं करना है। एक सूची करणीय और एक सूची अकरणीय। भारतीय जीवन दृष्टि आनंद गोत्री है।


हम अपने पूर्वजों के अनुभव सिद्ध ज्ञान के आधार पर अपना जीवन संवार सकते हैं। चातुर्मास की व्यवस्था हमारे लिए उपयोगी है।


भारत का लोकजीवन आनंदधर्मा है। लोक और शास्त्र में यहां कोई द्वंद्व नहीं है। शास्त्र लोक से ही सामग्री लेता है। उसे अपने अनुभवों से पकाता है। उसके अंतःकरण में प्रवेश करता है शास्त्र। फिर करणीय और अकरणीय तंत्र की सूची बनाता है। यही काम लोक अपने ढंग से करता है। लोक और शास्त्र दोनों एक ही मां पिता के पुत्र हैं। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र के शुरुआत में ही ‘लोकायत’ शब्द का इस्तेमाल किया है। चैमासा जैसे अन्य सारे अनुष्ठान लोक में प्रचलित हैं और शास्त्र द्वारा अनुमोदित भी हैं, इनसे हमारा जीवन आनंदमगन होता है।


ऋग्वेद के अंतिम सूक्त में ऋषि कहता है- “संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते”।। हम साथ-साथ चलें, साथ-साथ बोलें, साथ-साथ उठें, साथ-साथ सांस्कृतिक अनुष्ठान और हमारे-आपके कर्म सब एक तरह हों। ऋषि आगे कहते है- “देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते”। हमारे पूर्वज भी यही करते आए हैं। यह एक प्रवाह है। हम वही करते हैं। हमारे पिता भी यही करते थे। उनके पिता भी यही करते थे। यही सनातन परंपरा है।


लेखक श्री हृदयनारायण दीक्षित जी उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हैं।


विज्ञापन