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मुसलमान और भारतीय मुसलमान होने का फिर फर्क बता गए मोहम्मद आरिफ खान



मोहम्मद आरिफ खान इस समय केरल के गवर्नर हैं लेकिन बीते कई दशक से भारतीय राजनीति में अपवाद हैं। अपवाद इसलिए क्योंकि वो धर्म से मुसलमान है लेकिन सही मायनों में धर्मनिर्पेक्षता का भारतीय संदर्भ क्या है इसके भी जीते-जागते प्रमाण हैं। तुष्टीकरण की राजनीति करने वालों के लिए करारा तमाचा हैं और सही मायनों में कठमुल्ले मौलवियों के बहकावे में फंसने वाले मुसलमानों को मुख्य धारा में शामिल होने का मतलब बताने वाली जिंदा मिसाल हैं।


ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार में अचानक मोहम्मद आरिफ खान सुर्खियों में आ गए या मुस्लिम चेहरे की ऐसी आवश्यकता आन पड़ी थी बीजेपी को, कि उनको पद देकर सम्मानित किया। आरिफ खान तो ऐसे राजनेता हैं जो बीते कई दशक से मुसलमान और भारतीय मुसलमान का फर्क दुनिया के सामने रखते आ रहे हैं।


अभी जिक्र क्यों


मोहम्मद आरिफ खान ना सिर्फ बहराइच से सांसद रहे हैं बल्कि बहराइच को ही उन्होंने अपनी राजनीति का केंद्र बनाया। क्षेत्र के लोगों के लिए हमेशा आरिफ खान तक पहुंचना घर वाली बात रही। अब वो केरल के राज्यपाल हैं लेकिन बहराइच उनके दिल में बसता है। यही वजह है कि इस बार जब वो बहराइच पहुंचे तो एक बार फिर ऐसी मिसाल कायम कर गए जो सांप्रदायिक रुप से संवेदनशील बन चुके बहराइच के लोगों की संवेदनाओं को टटोलने का मौका देती है।


बहराइच दौरे पर आए केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने बहराइच से पूरे देश के मुस्लिम समाज को एकता का पैगाम दिया।


आरिफ खान पाण्डव कालीन सिद्धनाथ मंदिर पहुंचे। मंदिर में आरती करके शिवलिंग पर दूध और बेलपत्र से भोलेनाथ का जलाभिषेक किया। मंदिर से दर्शन कर गुरुद्वारे जाकर उन्होंने माथा टेका।


इसके बाद बहराइच के विभिन्न लोगों से मुलाकात के साथ ही आरिफ मोहम्मद खान सद्भाव यात्रा करते नजर आए।



क्यों अलग हैं आरिफ मोहम्मद खान


बहुचर्चित शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी सरकार द्वारा अमान्य घोषित करने के विरोध में आरिफ मोहम्मद खान ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था।


सुप्रीम कोर्ट के जिस फैसले को कट्टरपंथी मुसलमानों के दबाव और मुस्लिम कौम को खुश कर अपना वोटबैंक मजबूत करने के लिए राजीव गांधी ने कानून बनाकर पलटा था वो आरिफ खान को नागवार गुजरा था।


हांलाकि शाहबानो मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले का शुरुआती दिनों में राजीव गांधी सरकार द्वारा समर्थन किए जाने पर 1985 में संसद में खान का भाषण बेहद महत्वपूर्ण है। बाद में मुसलमान मौलवियों के तथा-कथित दबाव में आकर राजीव गांधी सरकार ने संसद में एक विधेयक पारित कर शाह बानो मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले को अमान्य करार दिया।


आरिफ मोहम्मद खान के बयान का ही हवाला देकर पीएम मोदी ने संसद में कहा था, “कांग्रेस के नेता ने कहा था कि मुस्लिम अगर गढ्ढे में रहना चाहते हैं तो रहने दो क्या हम मुस्लिमों के समाज सुधारक हैं।”


बाद में इस बात की पुष्टि आरिफ मोहम्मद खान ने यह कहते हुए की थी कि जब उन्होंने शाहबानो मामले में राजीव गांधी सरकार से इस्तीफा दिया था तो पीवी नरसिम्हा राव ने उनसे कहा था - कि ये (मुसलमान) हमारे वोटर हैं, हम इन्हें क्यों नाराज करें। हम इनके सामाजिक सुधारक नहीं हैं। कांग्रेस पार्टी समाज सुधार का काम नहीं कर रही है। हमारा रोल समाज सुधारक का नहीं है। हम राजनीति के बिजनेस में हैं और अगर ये गड्ढे में पड़े रहना चाहते हैं तो पड़े रहने दो।'


शाहबानो मामले में उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में तलाकशुदा मुसलमान महिलाओं को गुजारा भत्ता देने की बात कही थी।


आरिफ मोहम्मद खान मुसलमानों में एक साथ तीन बार तलाक बोलकर पत्नी से संबंध खत्म करने की परंपरा के मुखर विरोधी रहे हैं। लंबे समय से मुस्लिम पर्सनल लॉ में बदलाव की वकालत कर रहे आ रहे हैं।



आरिफ खान का राजनीतिक सफर


महज 26 वर्ष की उम्र में खान ने बतौर विधायक संसदीय राजनीति की शुरुआत साल 1977 से की। उन्होंने भारतीय क्रांति दल पार्टी के बैनर पर बुलंदशहर के सियाणा निर्वाचन क्षेत्र से पहला विधान सभा चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। बाद में कांग्रेस में शामिल हुए और 1980 में कानपुर और 1984 में बहराइच से सांसद चुने गए। वर्ष 1989 में जनता दल से तो वर्ष 1998 में बसपा से सांसद बने। वर्ष 2004 में भाजपा में शामिल हुए मगर कैसरगंज से लोकसभा चुनाव हारने के बाद वर्ष 2007 में भाजपा छोड़ी। भाजपा के साथ-साथ उन्होंने संसदीय राजनीति से भी दूरी बनाने का फैसला ले लिया था।


अलीगढ़ से आरिफ का रिश्ता


आरिफ मोहम्मद खान के अलीगढ़ से बेहद पुराने और मजबूत संबंध रहे हैं। छात्र जीवन में वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय छात्र संघ के सचिव और अध्यक्ष रह चुके हैं। वे 1972 - 73 में विश्वविद्यालय के छात्र संघ के सचिव चुने गए थे और अगले साल 1974 में अध्यक्ष निर्वाचित हुए।


राजनीति में पहचान के साथ-साथ उनके निजी जीवन में भी अलीगढ़ का बहुत बड़ा योगदान रहा है। उनकी पत्नी रेशमा भी एएमयू की छात्रा रह चुकी हैं। आरिफ मोहम्मद खान एएमयू के विधि विभाग के छात्र रहे हैं और उनकी पत्नी रेशमा भी इसी विभाग की छात्रा थीं।


1972 में एक एक्ट के माध्यम से एएएमयू का अल्पसंख्यक स्वरूप खत्म कर दिया गया था। इसके विरोध में आरिफ मोहम्मद खान के नेतृत्व में जबरदस्त आंदोलन हुआ था। एएमयू के इतिहास के बड़े आंदोलनों में से एक का नेतृत्व आरिफ मोहम्मद खान ने किया था।