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GST सफल तभी होगी जब वह सरल होगी - आशीष कुमार त्रिपाठी



लेखक- आशीष कुमार त्रिपाठी

एडवोकेट (कर एवं वित्तीय सलाहकार)


सर्वप्रथम जी एस टी काउंसिल की अध्यक्षा व केन्द्रीय वित्त मंत्री माननीया श्रीमती निर्मला सीतारमण जी का उ.प्र. के समस्त कर सलाहकारों व व्यापारियों की तरफ से हार्दिक स्वागत व अभिनन्दन करता हूँ कि उन्होंने जनसँख्या के द्रष्टिकोण से सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में जी.एस.टी काउन्सिल की 45वीं बैठक की I उ.प्र. जैसे राज्य को 45वीं मीटिंग तक इन्तजार किए जाने के पीछे सरकार की कई मजबूरियां है व इसके कई अन्य निहितार्थ भी है किन्तु उसमे न पड़कर आज सिर्फ जी.एस.टी की बात करते है I


जी.एस.टी को सफल बनाने के लिए जी.एस.टी को सरल बनाना आवश्यक है तभी सकरात्मक परिणाम प्राप्त कर पाना संभव होगा, किन्तु सरकार निरन्तर जी.एस.टी के सरलीकरण की अनिवार्य शर्त को अनदेखा कर रही है यह कहना अतिश्योक्ति नही होगा कि जी.एस.टी काउन्सिल भी अब दिशा हीन होती जा रही है I जी.एस.टी काउंसिल की बैठके मात्र जी.एस.टी रेट कट्स एवं केंद्र व राज्यों के मध्य राजस्व के बंटवारे/क्षतिपूर्ति तक ही सीमित रह गई है, क्योंकि जब देश की अर्थव्यस्था कोविड-19 जैसी महामारी से निपटने के बाद पटरी पर वापस लौट रही है तब पेट्रोलियम पर्दार्थों की सस्ती दरें उसे नई गति प्रदान करने के साथ मंहगाई से कराह रही देश की अवाम को राहत प्रदान कर सकती है I वर्तमान समय में सरकारें पेट्रोल व डीजल पर लगभग 150% तक कर वसूल कर रही है, जबकि जीएसटी में सबसे ऊंची कर की दर 28% प्रतिशत है I यदि इसे सिन गुड्स के श्रेणी में भी डाल दिया जाय तो भी अधिकतम कर की दर 40% प्रतिशत तक ही रहेगी I अतः क्रेंद्र व राज्य सरकारें पेट्रोल व डीजल को कभी भी जीएसटी के दायरे में नही लाना चाहेंगी। इस मामले में क्रेंद्र व देश की समस्त राज्य सरकारें दोनो एक मत है। जिस महत्वपूर्ण मुद्दे पर पूरे देश कि निगाहें थी उस मुद्दे पर मात्र 2 मिनट की चर्चा व उसका सरकारों द्वारा त्वरित विरोध निराश करता है। केरल हाई कोर्ट के सख्त निर्देशों के कारण इस मुद्दे को 45वीं जीएसटी काउंसिल की बैठक में समिल्लित करना मजबूरी थी अन्यथा शायद इस मुद्दे पर बात भी नही होती।


निश्चित रूप से जी.एस.टी स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे बड़ा कर सुधार का कदम था, किन्तु यह एक ऐसा

कर सुधार बन कर रह गया जिसमे सबसे ज्यादा बार (करीब 4000 से ज्यादा संशोधन हो चुके है) सुधार किया जा चुका है व प्रयास अभी भी अनवरत जारी है I जीएसटी लागू किए जाने के पीछे तर्क दिया गया था कि जीएसटी देश की टेढ़ी कर व्यवस्था को पटरी पर लाएगा, भारत एक बड़े और एकीकृत बाजार के रूप में तब्दील होगा और जटिल करारोपण खत्म होने से उद्द्योग, व्यापार व विदेशी निवेशकों को आसानी होगी, जिसकी प्रबल सम्भावना भी नजर आ रही थी क्योकि इसके लागू होने से सर्विस टैक्स, वैट जैसे 18 तरह के टैक्सेज को समाप्त कर दिया गया था I इसे लागू करते समय प्रधानमंत्री जी व तत्कालीन वित्तमंत्री जी के द्वारा जी.एस.टी की गुड एंड सिंपल टैक्स के रूप में परिकल्पना की गयी किन्तु आज यह आजाद भारत की सबसे जटिल कर प्रणाली बनकर रह गया है, जिसकी जटिलताओं की समझ न तो सरकार को है और न ही इसे संभल रहे अधिकारियों को तथा विशेषज्ञों की राय लेना सरकार अपनी शान के खिलाफ समझती हैI

सरलीकरण के एक बड़े दावे के साथ लाया गया जी.एस.टी. आखिर जटिल क्यों हो गया इसके निम्नलिखित कारण है : अब जीएसटी भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक अनिवार्यता है व भारतीय अर्थव्यवस्था व्यावहारिक रूप से जीएसटी की सफलता पर निर्भर करती है किंतु वर्तमान में जीएसटी की जो स्थिति है उससे भारत का संपूर्ण व्यापारी वर्ग बुरी तरह से पीड़ित है व दिन-प्रतिदिन उसकी परेशानियां बढ़ती जा रही है I इसलिए सरकार को चाहिए कि वह तत्काल इन समस्याओं पर ध्यान देकर इसके लिए सुधारात्मक कदम उठाएं अन्यथा जीएसटी भारतीय उद्योग एवं व्यापार के लिए दीर्घकालीन समस्या बनकर इससे शान पहुंचाएगा I


जीएसटी की मुख्य समस्याएं है :


1- स्तरविहीन जीएसटी नेटवर्क

जी.एस.टी. पूर्ण रूप से सूचना प्रौद्योगिकी पर आधारित कर प्रणाली है व इसकी मुख्य समस्या इसका नेटवर्क है जो सूचना प्रौद्योगिकी के सिद्धांतो के विपरीत है, व अपना काम समुचित तरीके से नहीं कर पा रहा है । सरकार द्वारा जी.एस.टी. नेटवर्क की असफलता के लिए व्यापारी व कर सलाहकार को दोषी माना जा रहा है उन्हे यह कहा जा रहा है कि वह अपने रिटर्न अंतिम समय पर क्यों भरते है साथ ही उन्हें दोषी मानते हुए उनसे लेट फीस व पेनाल्टी वसूल की जा रही है जोकि अनुचित है। जबकि आवश्यकता है जीएसटीएन की क्षमता में सुधार करने की।


2- गलतियाँ सुधारने का अवसर नही

जीएसटी कानून एक नया कर कानून है और इसके पालन में भारतीय उद्योग व व्यापार ने भी पूरी मेहनत और ईमानदारी के साथ सहयोग किया है I किंतु कर प्रणाली नई होने के कारण इसके अनुपालन में प्रारंभिक समय में कुछ तकनीकी गलतियां हुई है, जिसमें किसी भी प्रकार की कर चोरी की भावना नहीं है I क्योंकि वर्तमान समय में जीएसटी के प्रमुख रिटर्न जीएसटीआर 3B में गलती के संशोधन का कोई प्रावधान नहीं था जिसके कारण गलतियों में सुधार नहीं हो सका I अतः सरकार को अब उनके सुधार का तरीका निकालना होगा व डीलर्स को रिटर्न्स के रिवीजन की सुविधा उपलब्ध करानी होगी यदि सरकार द्वारा ऐसा किया जाता है तो लगभग ४०% समस्या का स्वतः निराकरण हो जायेगा।

भारत में वर्तमान में लागू प्रत्यक्ष कर कानून इनकम टैक्स हो अथवा जीएसटी से पूर्व लागू सर्विस टैक्स हो, वैट हो, अथवा सेंट्रल एक्साइज सभी अप्रत्यक्ष कर कानूनो में रिटर्न को संशोधित करने की सुविधा है/थी । किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि जी.एस.टी. लागू करते समय नीति नियंताओं द्वारा यह मान लिया गया था कि व्यापारी व कर सलाहकार कोई इंसान नहीं बल्कि “मशीन” है जिससे कि वह गलती कर ही नहीं सकते, इसी कारण से इतनी सख्त प्रक्रिया बनाने के बाद भी गलती होने पर सुधार की कोई गुंजाइश ही नहीं रखी गई है I जबकि कानून निर्माता समय-समय पर अपनी सुविधानुसार संशोधन जारी करते रहते है, आज तक जिनकी संख्या लगभग 4000 से भी ऊपर हो चुकी है I अतः यह स्पष्ट है की सरकार गलती भी कर सकती है व अपनी सुविधानुसार उसका सुधार भी कर सकती है किंतु व्यापारी व कर सलाहकार न तो गलती कर सकते हैं और न ही उसका सुधार कर सकते हैं I यह सिद्धांत नैसर्गिक न्याय के विपरीत है जिसे तत्काल हटाए जाने की आवश्यकता है I


3- लेट फ़ीस की वसूली

जीएसटी कर प्रणाली भारत में अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को सरल करने के उद्देश्य से लागू की गई थी जिसकी प्रक्रिया के संबंध में सरकार द्वारा भी लगातार परिवर्तन किए गए जिस कारण व्यापारी वर्ग द्वारा रिटर्न्स फ़ाइल करने में देरी होना स्वाभाविक था I इसके अतिरिक्त जीएसटी नेटवर्क की क्षमता और गति भी प्रमुख रूप से इस देरी के लिए जिम्मेदार थी I किंतु कानून निर्माताओं ने इस बात का ध्यान नहीं रखा कि व्यापारी वर्ग ने भी जीएसटी की सफलता के लिए अथक परिश्रम किया है, अतः यदि व्यापारी द्वारा कभी कोई रिटर्न फाइल करने में देरी हो जाती है तो उसे लेट फीस से मुक्ति दी जानी चाहिए I यहां तक कि कोविड-19 जैसी महामारी के समय में भी जब काफी व्यापारिक प्रतिष्ठान थे व व्यापारियों की आर्थिक स्थिति भी पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी थी ऐसे समय में भी सरकार ने करोड़ों रुपयों की लेट फीस वसूली की I अतः सरकार को चाहिए की उसने जो भी लेट फीस व्यापारियों से वसूली की है उसे उन्हें वापस लौटाए व साथ ही जीएसटी नेटवर्क की क्षमता व गति के लिए जिम्मेदार सेवा प्रदाता को दंडित करें यदि आवश्यकता हो तो प्रावधान के अनुसार सेवा प्रदाता में बदलाव करें जिससे कि समय अंतर्गत रिटर्न्स फ़ाइल किए जा सके I जीएसटी की प्रारम्भिक अवस्था एवं अभी तक जब कि जीएसटी में एक स्थायित्व नहीं आता है तब तक लेट फीस जैसे प्रावधानों को न्याय हित में स्थगित करना चाहिए I


4- इनपुट टैक्स क्रेडिट की समस्या

जीएसटी कानून के अंतर्गत इनपुट टैक्स क्रेडिट के मिसमैच की समस्या काफी जटिल है I जीएसटी कानून में जिस प्रकार से इसका प्रावधान किया गया है वह इस समस्या को और भी गंभीर बना देता है I जिन डीलर ने माल बेचा है यदि उन्होंने अपना कर अथवा रिटर्न समय से नहीं जमा किया है तो क्रेता द्वारा इमानदारी से विक्रेता को चुकाए गए कर के लाभ से से उसे वंचित कर देना न्यायसंगत नही है, जबकि क्रेता के पास न तो ऐसा कोई साधन है और न कोई अधिकार जिससे वह विक्रेता को समय पर रिटर्न व कर को जमा करने के लिए बाध्य करता हो I जब सरकार को विक्रेता से देरी से पेश किये गए रिटर्न पर पूरा कर और ब्याज प्राप्त हो गया है तो फिर क्रेता की इनपुट क्रेडिट को हमेशा के लिए रोकना न तो उचित है और न ही न्यायसंगत I इस प्रकार अव्यवहारिक प्रक्रियाओं से व्यापार व उद्योग जगत के सामने भविष्य में कार्यशील पूंजी की बहुत बड़ी समस्या खड़ी होने वाली है, जिससे व्यापार करना और भी मुश्किल हो जाएगा I यह समय जीएसटी को लेकर समस्याएं हल करने का है, न कि उसकी समस्याएं बढ़ाने का इस समय जारी की गई नई प्रक्रियाए मुश्किल हल करने के बजाय समस्याएं बढ़ा रही हैं I


5- कर की दर

यह एक विडम्बना ही है कि एक देश – एक कर की बात करने वाले अधिनियम को नीति नियन्ताओं द्वारा इस प्रकार से बनाया गया कि उसमे एक माल पर ही एक से अधिक दरें लागू कर दी गई है तथा एक माल पर एक वर्ष में ही एक अथवा एक से अधिक बार कर की दरों में परिवर्तन करना इसकी मूल भावना के विरुद्ध है I


6- अव्यावहारिक प्रावधान

भारत में जीएसटी आज से लगभग चार वर्ष से भी अधिक समय पूर्व अर्थात 1 जुलाई 2017 में इस उम्मीद से लाया गया था कि यह एक सरलीकृत कर प्रणाली होगी और उद्योग व व्यापार जगत को व्यापार करने एवं अप्रत्यक्ष करों के भुगतान में आसानी होगी और सरकार का राजस्व भी बढेगा I लेकिन चार वर्ष से भी अधिक बीत जाने के बाद भी व्यापार एवं उद्योग जगत से जीएसटी के पालन करने में समस्याएं आने के समाचार बराबर आ रहें है I अभी भी यह कर और इसकी प्रक्रियाएं सरल और सहज नहीं है पर अब इन्हें सरल और सहज बनाना नितांत आवश्यक है I यदि इस समय इस कर प्रणाली को लेकर जो समस्याएं आ रही है उनका समाधान हो जाए तो यह कर प्रणाली अर्थव्यवस्था और उद्योग और व्यापार जगत के लिए और भी अधिक उपयोगी होगी I




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