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जमियते इस्लामी चैनल का खारिज होना वैध: केरल हाईकोर्ट


के. विक्रम राव (वरिष्ठ पत्रकार)

मीडिया (टीवी) चैनल्स की अभिव्यक्ति की सरहद वहीं समाप्त हो जाती है, जहां पर राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा आशंकित हो। अपने लाइसेंस के स्वत: नवीनीकरण का भी अधिकार इन चैनल्स को प्राप्त नहीं दिया जा सकता। ऐसे अति महत्वपूर्ण निर्णय केरल हाईकोर्ट (कोची) की खण्ड पीठ ने कल (2 मार्च 2022) दिया है। इसके तहत जमियते इस्लामी का चैनल (मीडिया—1) की उस अपील को खारिज कर दिया जिसके तहत जमात के स्वामित्ववाले ''माध्यम मलयालम टीवी'' के लाइसेंस के नवीनीकरण की मांग को निस्तारित कर दिया गया। खण्डपीठ में मुख्य न्यायमूर्ति एस. मणिकुमार तथा न्यायमूर्ति शाजी पी. चाली ने भारत सरकार (सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय) के उस निर्णय को वैध ठहराया है जिसके तहत केन्द्र सरकार ने जमियते इस्लामी के इस चैनल के लाइसेंस के नवीनीकरण की मांग भी अस्वीकार कर दी थी। अदालत की राय में नवीनीकरण का निर्बाध अधिकार नहीं हो सकता।

जहां राष्ट्रीय सुरक्षा की सीमा प्रारंभ होती है तथा उसे खतरा होता दिखता हो वहां सरकार ऐसा आवश्यक कदम उठा सकती है। सुनवाई के दौरान चैनल के अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने कोर्ट के कुछ पूर्व के फैसले दिखाये थे और चैनल पर लगी पाबंदियों को चुनौती दी गयी थी। भारत सरकार के अधिवक्ता अमन लेखी ने इन तर्कों का खण्डन किया था। जमियते इस्लामी के इस चैनल पर दूसरी बार ऐसा आरोप सिद्ध बताया गया। पहली बार जमियत के इस चैनल के साथ ख्यात मलयालम चैनल ''एशियानेट'' का लाइसेंस भी दो वर्ष पूर्व निलंबित कर दिया गया था। दोनों पर आरोप था कि पूर्वोत्तर नयी दिल्ली के सांप्रदायिक दंगों पर आस्था स्थलों पर हुये हमलों का उकसानेवाला प्रसारण किया गया था।

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की ''मीडिया स्वतंत्रता'' की रक्षा की मांग पर टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रसारण के लाइसेंस कोई स्वमान्य अधिकार नहीं है। सुरक्षा के खतरे की बात को नजर में रखना होगा। अवांछित तत्वों से बचाव आवश्यक है। गत 8 फरवरी को केरल हाईकोर्ट के एकल पीठ के न्यायमूर्ति एन. नगरेश ने जमियते इस्लामी की याचिका खारिज कर दी थी। इस पर उन्होंने उसके विरुद्ध अपील की थी, जिसे खण्ड पीठ ने सुना और खारिज कर दिया।

टीवी चैनल्स से संबंधित एक प्रश्न राज्यसभा में (12 अगस्त 2016) पूछा गया था कि नियमों का उल्लंघन करने पर कितने चैनल्स का लाइसेंस निरस्त किया गया था ? तत्कालीन राज्यमंत्री राजवर्धन राठौड ने 73 की संख्या बतायी थी। इनमें कुछ को तो सुरक्षा अनुमति के इनकार करने पर दंडित किया गया था। टीवी चैनलों द्वारा अर्धसत्य, फर्जी समाचार तथा विकृत सूचनाओं के प्रसारण पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने (9 अक्टूबर 2020) निर्देश दिया गया था कि केवल नेटवर्क (रेगुलेशन) एक्ट के प्रावधानों के तहत अपमानजनक, मानहानिवाले तथा अनैतिक कटाक्ष के प्रसारण पर प्रतिबंध लगाया जाये। इस संबंध में एक आदेश फिल्मी अभिनेत्री राकुल प्रीति सिंह ​की याचिका पर जारी किया गया था (10 अक्टूबर 2020)। सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश श्री नूतलपाटि वेंकट रमण ने आदेश जारी किया था। अदालत ने कहा था : ''टेलीविजन समाचार चैनलों पर होने वाली परिचर्चाएं दूसरी चीजों से कहीं अधिक प्रदूषण फैला रही हैं और न्यायालय में सुनवाई के दौरान दिये जाने वाले वक्तव्यों का संदर्भ से बाहर इस्तेमाल किया जा रहा है।''

प्रधान न्यायाधीश रमण, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति सूर्यकांत की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि सबका अपना एजेंडा होता है और इन बहस के दौरान दिये गये बयानों का संदर्भ से बाहर इस्तेमाल किया जा रहा है। पीठ ने कहा, आप (वादकारियों) किसी मुद्दे का इस्तेमाल करना चाहते हैं, हमसे टिप्पणी कराना चाहते है और फिर उसे विवादास्पद बनाते हैं, इसके बाद सिर्फ आरोप प्रत्यारोप ही होता है। पीठ ने कहा : ''टेलीविजन परिचर्चाओं से किसी भी दूसरी चीज से कहीं अधिक प्रदूषण उत्पन्न हो रहा है।''

यह टिप्पणी दिल्ली और आसपास के इलाकों में वायु प्रदूषण से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई करते हुये की गयी थी। शीर्ष अदालत ने यह मौखिक टिप्पणी दिल्ली सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंधवी की दलील पर की जिसमें कहा गया था कि पराली जलाना वायु प्रदूषण के कारकों में से एक है, जिसका समाधान करने की जरुरत हे।
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