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शर्म ना आई उद्धव ठाकरे - पालघर संत हत्याकांड


गिरगिट जैसे राजनीति का , रंग बदलते देख लिया. आस्तीन में सांपों को भी , सबने पलते देख लिया. कुछ दिन पहले भारत का जय , घोष लगाया करते थे. बात - बात पे वंदे मातरम , गान सुनाया करते थे. राष्ट्रवाद की शंखनाद का , तुमको गायक सोचा था. मोदी जी के बाद तुम्ही को ,सच्चा नायक सोचा था. लेकिन सत्ता के मद में खोकर ,दिखा रहे मजबूरी हो. तुम धर्म कर्म की बातों से अब, बना रहे क्यों दुरी हो. कुर्सी के लालच में आकर , लाचार दिखाई देते हो. दुष्ट जनों के संगी बन कर , बीमार दिखाई देते हो. वीर शिवा के वंशज हो तुम ,इसका भी कुछ भान करो. दुर्योधन का पंथ पकड़ मत, पुरखों का अपमान करो. आर्यवर्त में निशाचारों का , अंधियारा ठीक नहीं. पालघर की इस घटना पर , मौन तुम्हारा ठीक नहीं. अरे ठाकरे जागो अब तो , बाला जी धिक्कारें हैं. तुमको भटका देख राह से , बहा रहे जल खारे हैं. उनको मान दिलाओ जल्दी , राम नाम जो जपते हैं. परहित में ही जीवन अपना , अर्पित हरदम करते हैं. परमारथ की चाह लिएजो,जप तप करके जिए सदा. धरती की खुशहाली को ही , हवन अनूठे किये सदा. ऐसे संत महात्मा को ही , यारो जिसने मारा है. जिनके हरदम घृणित पाप से , जग में छाया कारा है. अमन चैन के हत्यारे जो , मन में रखते छूरी है. ऐसे अधम दुष्ट जनों को , मिलनी सजा जरूरी है. अपनी संस्कृति की रक्षा को,कुछ अच्छा व्यवहार करो. मानवता के अपराधी का , फांसी से उपचार करो.


आशुतोष 'आशु' (कवि)

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