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सीएम योगी की तर्ज पर असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वसर्मा भी कुचल रहे हैं आस्तीन के सांप



पहले भारत में अवैध घुसपैठ और फिर अवैध दस्तावेज बनवा कर सरकारी जमीनों पर कब्जा। देखते ही देखते अवैध कब्जे को कालोनी की शक्ल देना और फिर आबादी बढ़ाने का कार्यक्रम। भारत में आकर आस्तीन में घुसने वाले सांपो का यही सच है।


भारत का लगभग हर राज्य बांग्लादेश, म्यांमार और कई अन्य देशों से भारत में अवैध घुसपैठियों का शिकार है। भारत में मूल रुप से रहने वाली मुस्लिम आबादी उतनी तेजी से नहीं बढ़ी जितना घुसपैठ करने वाले मुस्लिमों के चलते स्थितियां विकट बनी हैं। मूल रुप से भारत में रहने वाले मुस्लिम तो कौम के नाम पर अवैध दस्तावेज बनवाने में उनकी मदद करते है।


बढ़ती जनसंख्या और देश के भीतर उत्पाती स्थिति को भांप कर कई राज्य सरकारें सतर्क हुई हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इशारे पर स्थानीय प्रशासन ने प्रदेश भर में ना सिर्फ घुसपैठियों और बाहुबल के दम पर सरकारी जमीनों पर कब्जा कर बैठे लोगों से जमीन खाली करवाई है बल्कि कई जगहों पर सख्त कार्रवाई भी हुई है।


भारत में सबसे ज्यादा घुसपैठ बीते वर्षों और खासकर डेढ़ दशक में बिहार, बंगाल, असम और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में हुई है।


असम में घुसपैठियों द्वारा सरकारी जमीनों पर कब्जे के चलते हालात कुछ ज्यादा ही बिगड़े हैं। ऐसे में असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वसर्मा ने घुसपैठ कर भारत में सरकारी जमीनों पर कब्जा कर बैठे लोगों के खिलाफ बड़ा अभियान चलाया है।


इस क्रम में असम के दारंग जिले के सिपाझार गांव में जमीन खाली कराने के अभियान के दौरान पुलिसकर्मियों और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़प हुई।


असम में यह कोई पहली बार नहीं था, जब जमीन विवाद को लेकर विवाद पैदा हुआ है। राज्य में पहले भी कब्जाई गईं सरकारी जमीन खाली कराने के दौरान जबरदस्त झड़प हो चुकी हैं।


क्यों हुआ विवाद?


सिपाझार में बड़ी संख्या में बंगाली बोलने वाले मुस्लिम रहते हैं। वे जिन इलाकों में रहते हैं, आरोप है कि वहां अवैध तरीके से सरकारी जमीन पर कब्जा किया गया है। इसी साल जून में जब असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने क्षेत्र का दौरा किया था, तो उन्होंने स्थानीय समुदायों से वादा किया था कि वह उनकी कब्जाई गई जमीनों को वापस दिलाएंगे और यहां धौलपुर गांव में मौजूद शिव मंदिर में बाउंड्री वॉल का निर्माण होगा।


उधर, सरकार का कहना है कि इन कब्जों से जमीन खाली कराने का अभियान इसलिए है ताकि असम के बिना जमीन वाले स्थानीय समुदायों को कृषि योग्य जमीन मुहैया हो सके। इसके लिए राज्य सरकार ने बजट में 9.6 करोड़ रुपये कृषि परियोजना के लिए अलग से तय किए हैं। इस प्रोजेक्ट के तहत खाली कराई गई सरकारी जमीन पर पौधे लगाए जाएंगे और यहां कृषि गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाएगा, जिसमें स्थानीय युवा शामिल होंगे। कृषि विभाग के अनुरोध के तहत ही जिला प्रशासन ने कब्जाई जमीन को सामुदायिक कृषि भूमि घोषित कर दिया।



सिपाझार में कितना बड़ा अभियान?


जून में अवैध कब्जाइयों को हटाने के लिए प्रशासन ने शिव मंदिर के पास अभियान चलाया। सात परिवारों को हटाया भी गया। इसके बाद बीते सोमवार से गुरुवार तक भी बड़े स्तर पर अभियान चलाया गया। बता दें कि सिपाझार में 1200 से 1300 परिवारों पर आरोप है कि उन्होंने अवैध तरीके से 10 हजार बीघा से ज्यादा की सरकारी जमीन पर बस्ती बसा ली थी। इन्हें हटाने के दौरान ही पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हो गई।


किन लोगों से खाली कराई जा रही जमीन?


असम में इस वक्त जिन लोगों को अवैध कब्जे वाली जमीन से हटाया जा रहा है, उनमें बड़ी संख्या बंगाली बोलने वाले मुस्लिमों की है। ये दिहाड़ी मजदूरी करते हैं और पड़ोसी मुल्कों से भारत में घुसपैठ के जरिए आए हैं। सरकार का कहना है कि इन लोगों ने जमीन पर अवैध तरीके से कब्जा कर लिया था, लेकिन यहां रहने वाले लोगों का दावा है कि वो बाड़पेटा और गोलपारा जैसे जिलों में नदी के कटान की वजह से अपना घर खोने के बाद यहां आ गए थे। इन लोगों का कहना है कि वे पिछले 40 सालों से यहां रह रहे हैं। कुछ लोगों का तो यहां तक दावा है कि उन्होंने स्थानीयों से जमीन खरीदी थी, लेकिन ज्यादातर लेन-देन बिना किसी दस्तावेजी कार्रवाई के हुए, इसलिए उनकी वैधता पर सवाल उठ गए।


स्थानीय लोगों का क्या कहना है?


धौलपुर की जमीन के कुछ हिस्सों और बड़े गरुखुटी इलाके भी पिछले कई दशकों में जमीन विवाद का केंद्र रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रवासियों ने उनकी जमीन कब्जा ली। इन्हीं विवादों के बीच कई बार अवैध कब्जाइयों को पहचानकर उन्हें जमीन से हटाने की भी बात चली। कुछ संगठन भी स्थानीय समुदाय के समर्थन में आवाज उठाते हुए घेरी हुई जमीन को छुड़ाने की मांग रख चुके हैं।


इस कड़ी में एक अहम मोड़ 2015 में आया, जब दूध उत्पादकों के संगठन दक्षिण मंगलदई ग्वाला संथ के अध्यक्ष कोबद अली के नेतृत्व में कुछ लोगों ने असम भूमि अतिक्रमण (रोकथाम) कानून, 2010 तहत केस दायर कर दिया। इसमें मंगलदोई की अदालत से मांग की गई थी कि वह सिपाझार में गांवों से अवैध कब्जाइयों को निकालने के लिए दखल दे। इससे पहले 2013 की एक आरटीआई में सामने आया था कि इस इलाके में 77 हजार बीघा सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे बरकरार हैं। भाजपा ने तब अपने चुनावी अभियान में इस जमीन को खाली कराने का भी वादा किया था।


सरकार के अभियान के खिलाफ कोर्ट गए लोग


बताया गया है कि अब तक धौलपुर में जिन लोगों से जमीन खाली कराई गई है, उनमें से कुछ ने पिछले महीने ही हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। जवाब में असम सरकार ने भी हलफनामा दाखिल कर कहा था कि कब्जे सरकारी जमीन पर स्थित हैं, इसलिए उन्हें हटाया जाना जरूरी है। इससे पहले कि याचिकाकर्ता कुछ जवाब दे पाते, सरकार ने जमीन को खाली कराने के लिए अभियान शुरू करा दिया।



हिंसक कैसे हो गया निकासी कार्यक्रम?


पिछले सोमवार को जब धौलपुर गांव से 800 परिवारों को हटाया गया, तब यह अभियान ज्यादातर शांत ही रहा। लेकिन गुरुवार को ऑल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट्स यूनियन जैसे कुछ संगठनों ने यहां रहने वाले लोगों के साथ जबरदस्त प्रदर्शन किए और दूसरी जगह बसाए जाने की मांग की। बताया गया है कि अधिकारियों ने इसके बाद निकाले जाने वालों के साथ बैठक की और समझौते का आश्वासन दिया।


इस बीच, निकाले गए लोगों का आरोप है कि अधिकारियों ने कथित तौर पर निष्कासन कार्यक्रम सिर्फ तब तक रोकने की बात कही, जब तक उनके रहने का दूसरा इंतजाम नहीं हो जाता। जैसे ही प्रशासनिक अधिकारियों ने इंसानियत के नाते कार्रवाई रोकी स्थानीय लोगों ने पुलिस को अचानक ही लाठी, डंडों और पत्थरों से पीटना शुरू कर दिया। दर्रांग के एसपी सुशांत बिस्व सरमा ने कहा कि इस हिंसा के बीच पुलिस ने खुद को बचाने की कोशिश में कार्रवाई की।


इस घटना से ये तो स्पष्ट है कि आस्तीन के सांपों को कुचलना ही बेहतर है।


टीम स्टेट टुडे




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