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ब्लैकमेलिंग, सियासत और जली रस्सी की अकड़ भर है किसानों के नाम पर अब चल रहा आंदोलन



कृषि कानून वापस लेने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऐलान के बाद आम जनता को उम्मीद थी कि किसान के नाम पर हो रहा आंदोलन खत्म हो जाएगा परंतु ऐसा हुआ नहीं। कानून वापस लेने के ऐलान के बाद बहुत सारे संगठन और दिल्ली बार्डर पर बैठे प्रदर्शनकारियों ने वापसी का रास्ता पकड़ा तो किसानों के नाम पर आंदोलन कर रहे नेताओं के हाथ-पांव फूल गए। आनन-फानन में रणनीति बनी और आंदोलन के नेताओं ने कहा कि पीएम की बात पर भरोसा नहीं है संसद में कानून वापस होने तक धरना प्रदर्शन आंदोलन जारी रहेगा।


कहते हैं घोड़ा दूर ना मैदान। अगले हफ्ते संसद का सत्र शुरु हो रहा है। पीएम आश्वस्त कर चुके हैं कि संसद में विधिवत नया कानून वापस ले लिया जाएगा।


स्टेट टुडे आपको बता रहा है ये आंदोलन खत्म नहीं होगा।


किसानों के नाम पर चल रहा आंदोलन अब विपक्ष के लिए हठधर्मिता और सियासत की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बन चुका है।



लखनऊ के ईको गार्डन में हुई संयुक्त किसान मोर्चा की महापंचायत में ये बात स्पष्ट हो गई। देश और प्रदेश के नेतृत्व के लिए जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगाना एक पुरानी रवायत रही है। लेकिन जब मंच से आ रही आवाजों में साजिशों की बू आने लगे तो संदेह नहीं रह जाता।


सरकार के साथ अहं का टकराव


यही हुआ संयुक्त किसान मोर्चा की महापचांयत के मंच पर। किसानों के नाम पर आंदोलन कर रहे नेताओं की सबसे बड़ी खीज ये है कि पीएम मोदी ने कृषि कानून वापस ले लिए, देश से माफी भी मांग ली लेकिन ऐसे आंदोलनजीवियों को कोई भाव नहीं दिया जो बाहर-चौदह महीने से आंदोलन को जिंदा रखे थे।


आंदोलन कोई भी हो हम साथ-साथ हैं


सिर्फ इतना ही नहीं अब तक किसानों के नाम पर आंदोलन कर रहे नेताओं ने मोदी सरकार से मुंह की खाने की बाद हर तरीके के आंदोलनकारियों को समर्थन देने की बात कही है। राकेश टिकैत खुद ईको गार्डन पहुंचे तो पहले शिक्षक भर्ती मामले पर चल रहे धरने में छात्रों के बीच बैठ गए, कहने लगे ये धरना भी हमारा है। वहां से उठे तो रेलवे के निजीकरण की मुहिम चला रहे एक अनजान से संगठन के बंट रहे पर्चे की बात मंच से करने लगे।



भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत यहीं नहीं रुके उन्होंने कहा कि संग्राम विश्राम की घोषणा भारत सरकार ने की है किसानों ने नहीं। मसले अभी बहुत हैं जिनका हल निकलने के बाद ही आंदोलन समाप्त होगा।


आंदोलनकारियों की अलग सरकार


फिर जब टिकैत ने मंच से बोलना शुरु किया तो कहा कि आगामी संसद सत्र में सरकार जो भी कानून बनाने वाली है ऐसे 17 कानूनों का भी विरोध करेंगे।


सरकार जो भी नीतियां बना रही है उस पर हमसे बात करके बनाए। फिर चाहें वो दूध की पालिसी हो, बिजली नीति हो, सीड बिल, एमएसपी गारंटी जैसे मसलों पर संघर्ष चलता रहेगा।


सीड बिल, एमएसपी गारंटी, दूध पॉलिसी, बिजली बिल जैसे तमाम मुद्दे हैं जिस पर आंदोलन आगे बढ़ेगा।

टिकैत और मंच पर मौजूद नेताओं की सबसे बड़ी टीस यही है कि कृषि कानून वापस लेने से पहले उनसे बातचीत क्यों नहीं की गई। टिकैत का कहना है कि जब तक बैठकर सरकार हर मसले पर बात नहीं करेगी तब तक किसान वापस अपने घरों को नहीं जाएंगे।



लखीमपुर मामला है गले की फांस


ये जरुर सच है कि लखीमपुर घटना फिलहाल सरकार के गले की फांस बनी हुई है। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी का इस्तीफा भी आंदोलनकारियों की मांग में शामिल है। हांलांकि अजय मिश्रा के गृहमंत्रालय का मंत्री बनने के बाद लखीमपुर, पीलीभीत समेत बड़े किसानों का दर्द भी मंच से साफ झलका।


दरअसल इस तराई के इलाके में ना सिर्फ फारेस्ट रिजर्व है बल्कि नदियों के किनारे की जो जमीन सरकार या प्रशासन की थी उस पर बड़े जमींदारों के कब्जे हैं। जिनके खिलाफ कार्रवाई की बात कहने के बाद ही टेनी के खिलाफ इलाके में माहौल बना। ये कब्जे कोई सौ-पांच सौ या हजार स्क्वायर फीट के नहीं बल्कि सौ एकड़ से लेकर हजार एकड़ से भी ज्यादा के हैं।


तराई बेल्ट का सच


आपको बताते चलें उत्तर प्रदेश की इस तराई की बेल्ट में बंटवारे के बाद पाकिस्तान से आए पंजाबियों की बड़ी आबादी है जिन्हें तत्कालीन सरकारों ने गुजर-बसर के लिए जमीनों के पट्टे दिए थे। बाद में जंगल और सरकार की भूमि पर इन्होंने ना सिर्फ कब्जा शुरु किया बल्कि उस पर खेती करते करते बड़ी माली हैसियत बना ली। अब योगी सरकार की भू माफियाओं और अवैध कब्जेदारों पर चल रही कार्रवाई से इनके होश फाख्ता हैं।


अजय मिश्रा टेनी को निशाने पर लेते हुए राकेश टिकैत ने कहा कि अगर लखीमपुर खीरी में बन रही एक चीनी मिल का उद्घाटन टेनी ने किया तो किसान सारा गन्ना वहां के डीएम के घर पर डालकर आएंगे।


मांग नहीं धमकी


26 जनवरी पर देश की राजधानी दिल्ली में हुए हिंसक और अपमानजनक प्रदर्शन करने वालों समेत बीते 14 महीने में सरकार की तरफ से लगाए गए तमाम मुकदमें आंदोलनकारियों पर से वापस लेना भी एक शर्त है।

राकेश टिकैत ने कहा कि लखनऊ में एयरपोर्ट के लिए 11 सौ एकड़ जमीन का अधिग्रहण तो किया गया लेकिन किसानों को उसके बदले एक फूटी कौड़ी नहीं दी गई । कह दिया गया कि सन 1942 में जमीन का अधिग्रहण कर लिया गया था, यह मजाक है। उन्होंने कहा कि इसका हिसाब होगा और इस बार बरसात के बाद लखनऊ एयरपोर्ट की जमीन पर किसान बुवाई करेंगे।



टिकैत ने केंद्र सरकार और दिल्ली एडमिनिस्ट्रेशन को ब्लैकमेल करते हुए मंच से कहा कि अब ट्रैक्टर संसद की ओर रवाना होंगे। साथ ही 29 तारीख से प्रतिदिन 1000 लोग 60 ट्रैक्टर लेकर उधर निकलेंगे।


उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के इको गार्डन में संयुक्त किसान मोर्चा की महापंचायत हुई। प्रदेश भर से किसानों के आने का दावों के बीच पंजाब और हरियाणा के ऐसे किसान जो दिल्ली बार्डर पर अर्से से बैठे हैं उन्हें बसों में भर कर लाया गया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों खासकर टिकैत के प्रभाव वाले कुछ इलाकों से लोग आए। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के अलग अलग जिलों में किसानों के नाम पर संगठन चलाने वाली नेतानगरी अपने साथ कुछ लोगों को लेकर पहुंचे।


संयुक्त किसान मोर्चा के मंच पर नेताओं की आंदोरफ्त जरुर रही। जिसमें राकेश टिकैत, योगेंद्र यादव, दर्शन पाल, अतुल अंजान, हन्नान मुल्ला और अन्य संगठनों के नेता मौजूद रहे।


दिल की बात जुंबा पर आई


देश के हर आंदोलन में हाथ आजमाने वाले योगेंद्र यादव ने किसानों के नाम पर चल रहे आंदोलन की असलियत तब उजागर कर दी जब बंगाल चुनाव का जिक्र करते हुए आगामी पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को हराने की स्पष्ट अपील मंच कर दी।


लेफ्ट-लेफ्ट-लेफ्ट


वामपंथी नेता अतुल अंजान ने दो हाथ आगे निकलते हुए प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में आंदोलन की चिंगारी को आग का गोला बनाने की बात कह डाली। राकेश टिकैत समेत मंच पर मौजूद तमाम नेताओं से अतुल अंजान ने अपील की ये आंदोलन और धरना प्रदर्शन सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित ना रख कर पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी फैलाया जाए।


किसानों के नाम पर चल रहे आंदोलन में नेताओं की बातों से इतना तो साफ हो गया है कि सात दशकों से एक ढर्रे पर चल रही भारतीय कृषि व्यवस्था में जिस परिवर्तन का प्रयास कानून बना कर करने की कोशिश केंद्र सरकार ने की उसे किसान विरोधी बता कर वापस करा दिया गया। इसके बाद किसानों की बदहाली का रोना रोकर तरह तरह की मांगों को सरकार के सामने रख दिया गया।


सिर्फ सियासत बाकी है


जाहिर है अब ये मसला किसानों का नहीं सिर्फ शुद्ध सियासत का रह गया है। भारतीय जनता पार्टी की केंद्र सरकार को हिलाने में अब तक नाकाम विपक्ष पर्दे के पीछे से एकजुट होकर किसानों के नाम पर ऐसा माहौल बना रहा है जिससे जनता के बीच सरकार की छवि नकारात्मक की जा सके और बीजेपी के अभेद हो चुके किले में सेंध लगाई जा सके।


क्या खोया - क्या पाया


सरकार की मंशा अच्छी थी या बुरी ये तो तभी पता चलता जब कानून लागू होते और उसके कुछ परिणाम आते लेकिन किसानों के नाम पर आंदोलन करने वालों ने कृषि कानूनों की वापसी के साथ परिणाम हासिल किया है।

बड़ी बात ये है कि जिन लोगों ने परिणाम हासिल किया उसकी परिणिति समस्या का समाधान नहीं बल्कि अनेकानेक मसले सामने लाकर समस्या का स्वरुप और विकराल करने का है।


टीम स्टेट टुडे




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