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लखनऊ समेत यूपी एवं अन्य राज्यों में कोरोना दोबारा कहां से घुसा और क्यों घुसा – बड़ा खुलासा



कोरोना की दूसरी लहर ने जानलेवा कहर ढाया है। देखते देखते लोगों की दुनिया उजड़ गई। बेबसी ऐसी और इतनी कि कोई कुछ कर ही नहीं पाया। महज कुछ घंटों में लखनऊ शहर के हालात ऐसे हो गए कि कुछ करने लायक कुछ रह ही नहीं गया। अस्पताल फुल हो गए। डॉक्टरों से उम्मीद थी इलाज की तो वो खुद सैकड़ों की संख्या में संक्रमित हो गए। क्या केजीएमयू, क्या बलरामपुर अस्पताल, सिविल, पीजीआई सब जगह मरीजों की भीड़ तो इलाज करने वाले डॉक्टर खुद आइसोलेट। इलाज हो तो कैसे।


सिर्फ इतना ही नहीं लखनऊ का कोविड कंट्रोल रुम, सीएमओ दफ्तर और कोविड कंट्रोल से जुड़े महत्वपूर्ण स्थान जनवरी 2021 में वैक्सीन आने के बाद पहले की तरह सक्रिय नहीं रहे। जबकि 2020 के नवंबर और दिसंबर तक यहां बराबर सक्रियता कायम थी। कोरोना संक्रमण की चिकित्सा से संबंधित महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं दुरुस्त थीं।


ऐसे लोग जो लखनऊ के रहने वाले हैं और बीते साल नवंबर या दिसंबर में कोरोना संक्रमित हुए उनका कहना है कि उस समय कोविड कमांड सेंटर, कोविड जांच केंद्र, अस्पताल और अस्पतालों में इलाज सब कुछ बहुत ही नियमित और सुचारु रुप से हो रहा था। कोविड पॉजिटिव रिपोर्ट आने पर सीएमओ आफिस से फोन, कमांड सेंटर से फोन, परिवार के अन्य सदस्यों की कोविड जांच, संक्रमित को लेने के लिए एंबुलेंस, अस्पताल में बेहतर भोजन, समय पर दवाइयां, कोविड गाइडलाइंस का पालन और सब कुछ बेहत सख्त और व्यवस्थित। ये जानकारी खुद नवंबर में संक्रमण का शिकार हुए लखनऊ निवासी विवेक तिवारी ने दी हैं। बीते साल नवंबर में उनकी पत्नी को कोविड के लक्षण नजर आए। पति-पत्नी सिविल अस्पताल गए। कोरोना जांच कराई। रिपोर्ट पॉजिटिव आई को कमांड सेंटर और सीएमओ दफ्तर से फोन आया। पूरा परिवार आइसोलेट हो गया । एंबुलेस आई और अस्पताल ले गई। अस्पताल की व्यवस्थाएं भी दुरुस्त थीं। करीब दस-बारह दिन में सभी ठीक होकर घर वापस आ गए।


फिर ऐसा क्या हुआ कि जो व्यवस्थाएं दिसंबर 2020 तक ठीक दिखाई दे रहीं थी वो जनवरी 2021 में ध्वस्त हो गईं। सिर्फ इतना ही नहीं कोरोना वायरस जैसे किसी शातिर की तरह इस फिराक में बैठा था कि कब व्यवस्थाएं चरमाराएं और वो निकल पड़े जान लीलने। हुआ भी ठीक ऐसा ही।


अब आपको बताते हैं कि लखनऊ समेत पूरे उत्तर प्रदेश और देश के अन्य राज्यों में कोरोना कहां से और कैसे घुसा –



साल 2020 और 2021 का फर्क


बीते साल इन्हीं दिनों में लॉकडाउन लगा था। लोग घर पर थे। कोरोना वायरस था लेकिन आज की तरह संक्रमण नहीं था। दरअसल 2020 में पहले जनता कर्फ्यू, फिर लॉकडाउन, फिर लॉकडाउन की मियाद में बढ़ोत्तरी और फिर अनलॉक की प्रक्रिया। बीते साल केंद्र सरकार के कदमों से एक झटके में भारत के गांव गांव तक कोरोना क्या है इसे लेकर संदेश चला गया। चूंकि ट्रेन-बस सब बंद थे लिहाजा जो जहां था वहीं ठहरना उसकी मजबूरी हो गई। जब महाराष्ट्र और दिल्ली में प्रवासी यूपी-बिहार के लोगों को राज्य से भागने पर मजबूर किया गया तो भी उन्हें उनके गांव तक पहुंचाने और फिर गांव के बाहर की 14 दिन क्वारेंटीन करने की प्रक्रिया बगैर किसी कोताही के पूरी की गई। जगह जगह लोगों की कोविड जांच की गई। रिपोर्ट पॉजिटिव आने पर तुरंत आइसोलेट कर इलाज किया गया।


लेकिन जनवरी 2021 आते आते लोगों ने मान लिया कोरोना बीते साल की बात थी। आम जनता के चेहरे से मॉस्क गायब हो गया। सेनेटाइज़र का इस्तेमाल पैसे की बर्बादी लगने लगा। बाजार और दुकानों पर कोविड गाइडलाइंस का कोई मतलब नहीं रह गया।


बस इसी जगह कोरोना वायरस को पहला मौका मिला।


जिस सरकार ने नवंबर 2020 की दीपावली में पटाखों भरी-पूरी बाजार से एक फुलझड़ी बाहर नहीं आने दी वो सरकार मार्च 2021 की होली आते आते चूक गई। ना सिर्फ बाजारों में भीड़ बढ़ी बल्कि बाहर का खान-पान, माहौल की मस्ती और सरकार की अदूरदर्शिता का फायदा कोरोना वायरस ने उठाया।


अगर आप सिर्फ लखनऊ के आंकड़ों पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि होली के तुरंत बाद यानी


- 1 अप्रैल से 5 अप्रैल के बीच लखनऊ में संक्रमण के मामले कुछ सौ से एक हजार तक प्रतिदिन हो गए ।
- 6 अप्रैल से 10 अप्रैल के बीच संक्रमण के मामले हजार-बारह सौ से बढ़ कर ढाई से तीन हजार प्रतिदिन की रेंज में चले गए।
- 11 अप्रैल से 14 अप्रैल के बीच प्रतिदिन चार हजार के आसपास संक्रमण के मामले पहुंचे गए
- बीते तीन से चार दिन में प्रतिदिन लखनऊ में पांच हजार से छ हजार केस निकल रहे हैं।


ये आंकड़े बताने के लिए काफी है कि सिर्फ राजधानी लखनऊ की ही बात कर लें तो यहां कम्युनिटी ट्रांसमिशन हुआ। आंकड़े बढ़ते रहे लोग बेपरवाह बने रहे। अब जब सरकार की कुछ सख्ती और माहौल में कोरोना की दशहत है तो लोग भले घर से ना निकल रहे हों या कम निकल रहे हों लेकिन लगभग हर घर में सर्दी-जुकाम, बुखार की शिकायत बनी हुई है।


कोरोना वायरस यही चाहता था।



एयरपोर्ट, रेलवे और बस सेवा


लखनऊ समेत उत्तर प्रदेश और देश के अन्य राज्यों में भी कोरोना के नए स्ट्रेन को लाने का काम उन्हीं ने किया है जो हवाई जहाज से चलते हैं। इसमें कहीं कोई दोराय है ही नहीं।


लखनऊ एयरपोर्ट समेत देश के विभिन्न एयरपोर्ट्स पर कोरोना जांच की प्रक्रिया पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। किसी की कोई जांच नहीं हो रही थी। भारत में पहले से मौजूद कोरोना वायरस ने इस मौके का भी फायदा उठाया।


दूसरी तरफ इंटरनेशनल फ्लाइट्स से आने वाले कोरोना के नए स्ट्रेन विदेशों से लेकर आए। आपको ध्यान होगा 26 जनवरी को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री भारत में गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि थे लेकिन उस समय ब्रिटेन कोरोना के नए स्ट्रेन से जूझ रहा था। उनका दौरा रद्द हो गया। लेकिन उस दौरान जो लोग विदेश यात्रा पर गए या विदेश से भारत आए उनकी जांच रिपोर्ट्स का रिकार्ड कहां है। क्या उन्हें आइसोलेट किया गया। दावे से कहा जा सकता है कुछ नहीं हुआ।


आपको याद होगा बीते साल 15-16 मार्च के आसपास लखनऊ में गायिका कनिका कपूर कोरोना पॉजिटिव निकलीं थीं। वो भी लखनऊ एयरपोर्ट पर कोविड जांच काउंटर को चकमा देकर निकलीं थीं बाद में हालत बिगड़ने पर केस खुला। मामला सामने आने के बाद बिना किसी दबाव या सरकारी प्रयास के एक झटके कुछ घंटों के अंदर महानगर, कपूरथला, अलीगंज के बड़े बड़े बाजार पूरी तरह बंद हो गए। लोगों ने खुद ही बैरिकेटिंग लगा दी। सेनेटाइज़ करने वाली गाड़ियों को किसी वीवीआईपी गाड़ी की तरह लोगों ने रास्ता दिया और एक झटके में पूरे पूरे इलाके सेनेटाइज हुए। तब कोरोना वायरस बुरी तरह घबराया था। बहुत कोशिश के बाद भी संक्रमण को रफ्तार नहीं दे पाया था। लेकिन इस बार 6 अप्रैल को सिर्फ अलीगंज इलाके से एक ही दिन 650 से ज्यादा कोरोना संक्रमित मिले लेकिन कहीं कोई बचाव या उपाय किसी ने नहीं किया।


सिर्फ इतना ही नहीं मार्च में लखनऊ के एक होटल में महिमा चौधरी आईं थीं जो दस से ज्यादा कर्मचारियों को संक्रमित कर गईं। फिर भी कोई सबक नहीं लिया गया। दुबई और सउदी अरब से लखनऊ आने और जाने वालों के लिए डायरेक्ट फ्लाइट हैं। आगे आप समझ ही सकते हैं।


इसी प्रकार जैसे जैसे रेलवे की सेवाएं बहाल हुईं लोगों की आवाजाही ना सिर्फ बढ़ी बल्कि लापरवाहियां भी बढ़ती गईं। सफर में किसी तरह के उपाय खुद को सुरक्षित करने के लिए ध्यान नहीं रखे गए। अन्तर्राज्यीय बसों और बस अड्डों पर भी कोविड गाइडलाइंस की धज्जियां उड़ गईं। सिटी बसें हों, सार्वजनिक परिवहन के साधन ऑटो, टैंपों, ई रिक्शा वगैरह सब ठूसमठूस पहले की तरह चलने लगे। ना चलाने वाले को फिक्र थी ना ही सवारियों ने उसे को रोका-टोका। पुलिस वालों ने जाहिर है अपना वसूली अभियान शुरु कर दिया।

आपको क्या लगता है कि इस मौके का फायदा कोरोना वायरस ने नहीं उठाया होगा।



कारोबार पटरी पर लाने की जल्दी


बीते साल के कारोबारी नुकसान को इस साल पूरा करना है। बुरा मत मानिए लेकिन कारोबार और व्यापार मुनाफे से आगे बढ़कर जब लालच की शक्ल लेता है तो उसका फायदा कारोबारी को मिला या नहीं ये तो ठीक ठीक कहना मुश्किल है लेकिन कोरोना ने इसका फायदा खूब उठाया।


जनवरी 2021 से बाजार में लगभग हर चीज़ मंहगी हो चुकी है या अगर दाम पहले जितना है तो पैकेट में वजन कम कर दिया गया है। सवाल ये है कि दाम बढ़ा लेकिन क्या उत्पादन भी बढ़ा। हकीकत ये है कि नियमित उत्पादन और सामान्य बाजार मांग के साथ ही अधिक मुनाफे के फेर में कई गड़बड़झाले तैयार हुए। गुजरात, पंजाब, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जब श्रमिक या कारीगर कम हुए तो बिना किसी सुरक्षा पैमाने के प्रवासी उत्तर भारतीयों को फिर से बुलाया गया। कारीगर एक राज्य से दूसरे राज्य पहुंचे तो उद्योगपति एक देश से दूसरे देश । नतीजा कोरोना विदेश की सैर कर के पहले से ज्यादा खतरनाक होकर लौटा।



केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की चूक


कभी कभी कुछ हादसे नया सबक भी देते हैं। जरुरत होती है उन्हें समझने की। 2020 में कोरोना काल का संक्रमण कई सबक दे कर गया था लेकिन सरकारों ने उस पर गौर नहीं किया। किसी एक सरकार की बात नहीं किसी पार्टी की सरकार ने किसी राज्य में ध्यान नहीं दिया।


2020 में पीएम मोदी के लॉकडाउन ऐलान से चालीस दिन ना सिर्फ कोरोना संक्रमण रुका था बल्कि हर राज्य सरकार और स्थानीय मशीनरी को कोविड से निपटने के लिए व्यवस्थाएं बनाने का मौका मिला था। स्वास्थ्य सेवाओं को कुछ बेहतर करके , लोगों को संक्रमण से जागरुक करके, धीरे धीरे हुई अनलॉक की प्रक्रिया ने स्थितियों को संभाला। लेकिन वैक्सीन आने के बाद जैसे सब लोग सब कुछ भूल गए।


केंद्र और राज्य सरकारें इस मामले में अदूरदर्शी और अपरिपक्व निकलीं। जो विपक्ष में हैं वो भी अदूरदर्शी और अपरिपक्व ही निकले। क्यों कि ना तो सरकार और ना ही विपक्ष किसी का सामान्य होते जनजीवन के बीच कहीं एक भी संदेश या बयान नहीं है कि कोरोना संक्रमण कम हुआ है लेकि खतरा बरकरार है। सत्तापक्ष हो या विपक्ष दोनों एक दूसरे की काटने-बजाने के चक्कर में कोरोना के कहर को भूल गए। नतीजा कोरोना बिना फर्क सबको डस रहा है।



किसान आंदोलन और चुनावी उत्सव


मैं दावा करता हूं कि अगर किसी भी राजनीतिक दल ने भारत में आज की कोरोना की स्थिति को लेकर सरकार को आगाह किया होता, स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के लिए आंदोलन किया होता तो आज वो पार्टी देश की जनता की आंख का तारा होती लेकिन ऐसा हुआ नहीं और अब कोई दावा भी ना करे कि हमने ये कहा था वो कहा था। किसी ने कुछ ना तो कुछ कहा और ना ही किया। राजनीति के हिस्से से जो हुआ वो किसान आंदोलन था, 26 जनवरी को नंगनाच था और बाकी पांच राज्यों में चुनावी उत्सव।


आप गौर कीजिए – दिल्ली, पंजाब, यूपी, हरियाणा और राजस्थान बार्डर इन जगहों पर ना सिर्फ किसान आंदोलनकारी जमा थे बल्कि पंजाब का एक बड़ा तबका जो विदेशों में बसा है उसने आंदोलन के दौरान ना सिर्फ विदेशी फंडिंग लीं बल्कि विदेशों से बहुत सारे लोग आंदोलन में पिकनिक मनाने चले आए। सिर्फ इतना ही नहीं कोरोना वायरस से ज्यादा खतरनाक भारत के आंदोलनजीवी परजीवियों ने जनसामान्य को बरगलाने और भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उधर महाराष्ट्र में स्थितियां बिगड़ती रही लेकिन सरकार महत्वपूर्ण कदम उठाने में नाकाम रही।


एक्सप्रेस वे और लखनऊ


एक बड़ी महत्वपूर्ण बात। हो सकता है आप एक बार में इससे सहमत ना हों लेकिन जरा सोच कर देखिए। दिल्ली में कोरोना संक्रमण फरवरी मार्च से ही कहर ढा रहा था। लखनऊ में ज्यादातर केस 25 मार्च के बाद बढ़े और 1 अप्रैल के बाद तो कम्युनिटी ट्रांसमिशन ही हो गया।


हकीकत ये है कि लखनऊ में दिल्ली, नोएडा और गाजियाबाद की गाड़ियों की आप को भरमार दिख जाएगी। यूपी-32 के साथ दिखने वाली ये गाड़ियां यमुना और आगरा एक्सप्रेस वे के रास्ते दिल्ली एनसीआर से सीधे शहर में घुसतीं है और इनके साथ ही कोरोना वायरस घर-घर में घुस जाता है।



टीका उत्सव के जोश में हकीकत से किनारा


कोरोना के पहले चरण में देश को इस खतरनाक वायरस की चपेट से बचाने वाले प्रधानमंत्री मोदी इस बार चूक गए। उन्होंने ज्यादा से ज्यादा वैक्सीनेशन के जरिए लोगों को सुरक्षित करने की शुभेच्छा तो रखी लेकिन वो भूल गए कि हिंदुस्तान की जनता भीड़तंत्र में विश्वास रखती है। अगर डंडा मारकर या लगाम कस कर ना रखो तो यहां लोगों को चुंबक लगा है...ट्रेन या बस की छत हो या सड़क पर चलना, दुकान पर सामान खरीदना, होटल में खाना हर जगह धक्कमपेल बगैर यहां काम नहीं चलता। ऐसे में टीका उत्सव वो भी सोती हुई राज्य सरकारों को हेल्थ सिस्टम बिना अपग्रेड किए और कहे बगैर। माननीय प्रधानमंत्री जी यहां आप भी चूक गए।


अभी भी मौका है माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी। ये कोरोना कहीं नहीं जाने वाला। ये रहेगा। हमारे आपके बीच ही रहेगा। जरुरी है आप कैसे करें वो आप जानें लेकिन कोविड गाइडलाइंस अब से भारत की जीवनचर्या और कार्यशैली में अनिवार्य करने के साथ ही कोरोना महामारी के लिहाज से स्वास्थ्य सेवाओं को केंद्र और राज्य स्तर पर स्थाई रुप से अभियान बनाकर लागू करवाइये वर्ना जो बचेगा वो किसी काम का नहीं होगा।


टीम स्टेट टुडे


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