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महत्वपूर्ण शोध ! 'मार्श मेलो थ्योरी' का आधार धैर्य और कोरोनाकाल



शिक्षक ने क्लास के सभी बच्चों को एक एक खूबसूरत टॉफ़ी दी और फिर कहा - "बच्चो ! आप सब को दस मिनट तक अपनी टॉफ़ी नहीं खानी है।"

ये कहकर वो क्लासरूम से बाहर चले गए। कुछ पल के लिए क्लास में सन्नाटा छाया था। हर बच्चा उसके सामने पड़ी टॉफ़ी को देख रहा था और हर गुज़रते पल के साथ खुद को रोकना मुश्किल हो रहा था। दस मिनट पूरे होते ही शिक्षक क्लासरूम में आ गए। समीक्षा की। पूरे वर्ग में सात बच्चे थे जिनकी टाफियाँ जस की तस थी जबकि बाकी के सभी बच्चे टॉफ़ी खाकर उसके रंग और स्वाद पर टिप्पणी कर रहे थे। शिक्षक ने चुपके से इन सात बच्चों के नाम अपनी डायरी में दर्ज कर लिए और पढ़ाना शुरू कर दिया।

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इस शिक्षक का नाम था प्रोफेसर वाल्टर मशाल। कुछ वर्षों के बाद प्रो• वाल्टर ने अपनी वही डायरी खोली और सात बच्चों के नाम निकालकर उनके बारे में खोजबीन शुरू किया। काफ़ी मेहनत के बाद उन्हें पता चला कि सातों बच्चों ने अपने जीवन में कई सफलताओं को हासिल किया है और अपने अपने क्षेत्र में सबसे सफल है। प्रो• वाल्टर ने अपने बाकी के छात्रों की भी समीक्षा की तो पता चला कि उनमें से ज्यादातर एक आम जीवन जी रहे थे जब की उन में से कुछ ऐसे भी थे जिन्हें सख्त आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा था।

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इस सभी प्रयास और शोध का परिणाम प्रो• वाल्टर ने एक वाक्य में निकाला और वह यह था। "जो आदमी दस मिनट तक धैर्य नहीं रख सकता, वह जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ सकता।”

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इस शोध को दुनिया भर में शोहरत मिली और इसका नाम "मार्श मेलो थ्योरी" रखा गया था क्योंकि प्रोफेसर वाल्टर ने बच्चों को जो टॉफ़ी दी थी उसका नाम "मार्श मेलो" था। यह फोम की तरह नरम थी।

कोरोनाकाल में ये प्रेरक प्रसंग भेजा है राजेंद्र सक्सेना जी ने।

इस थ्योरी के अनुसार दुनिया के सबसे सफल लोगों में कई गुणों के साथ एक गुण 'धैर्य' पाया जाता है क्योंकि यह ख़ूबी इंसान के बर्दाश्त की ताक़त को बढ़ाती है जिसकी बदौलत आदमी कठिन परिस्थितियों में भी निराश नही होता और वह एक असाधारण व्यक्तित्व बन जाता है।

अतः 'धैर्य' कठिन परिस्थितियों में व्यक्ति की सहनशीलता की अवस्था है जो उसके व्यवहार को क्रोध या खीझ जैसी नकारात्मक अभिवृत्तियों से बचाती है। दीर्घकालीन समस्याओं से घिरे होने के कारण व्यक्ति जो दबाव या तनाव अनुभव करने लगता है उसको सहन कर सकने की क्षमता भी धैर्य का एक उदाहरण है। वस्तुतः धैर्य नकारात्मकता से पूर्व सहनशीलता का एक स्तर है। यह व्यक्ति की चारित्रिक दृढ़ता का परिचायक भी है।

इसलिए हमारे मनीषियों ने कहा :

न धैर्येण बिना लक्ष्मी !न शौर्येण बिना जयः !!

न ज्ञानेन बिना मोक्षो !न दानेन बिना यशः !!


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धैर्य के बिना धन, वीरता बिना विजय, ज्ञान बिना मोक्ष और दान के बिना यश प्राप्त नहीं होता है।

भर्तहरी जी 'नीति शतक' में लिखते है


निन्दन्तु नीति निपुणा यदि वा स्तुवन्तु, लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्,

अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा़, न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः।


नीति निपुण व्यक्ति निन्दा करे या प्रशंसा, धन सम्पत्ति समीप आवे या चली जावे, मृत्यु आज ही हो या एक युग के बाद किन्तु धैर्यशाली पुरुष न्याययुक्त मार्ग से एक पग भी विचलित नही होते हैं।

आज कोरोना के इस खिंचते लंबे समय में धैर्य की ही जरूरत है। घर रहें। सुरक्षित रहें।

साभार- राजेंद्र सक्सेना जी




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