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आध्यात्म से जुड़ाव का पहला नियम है शुद्ध आहार और विचार – Devendra Mohan Bhaiyaji   


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2 मई बरेली। संत-महापुरुष से हमारा जुड़ाव, हमारा प्रेम निस्वार्थ है तो उनसे बिना कुछ मांगे ही हमारे सारे काम बनेंगे। संत-महापुरूष हमारे सारे काम बना सकते हैं, परंतु अगर हम उनके पास सिर्फ अपने स्वार्थ सिद्धी के लिए जाएंगे तो प्रेम सिर्फ स्वार्थवश होगा। ये कहना है आध्यात्मिक गुरु श्री देवेंद्र मोहन भैयाजी का।

 

बरेली के नवाबगंज में विशाल संगत के साथ सत्संग में भैया जी ने कहा कि संत संसार में जीवों को जीते-जी मुक्ति का मार्ग बताने आते हैं। इस मुक्ति के मार्ग के लिए वो सत्संग एवं सेवा का चयन करते हैं। सेवा के माध्यम से मनुष्य के अंतर्मन की शुद्धि होती है और सत्संग उसे दिशा देता है।

 

हमारा मन हमारे वश में है या नहीं इसे जांचने के लिए भैया जी ने आसान उपाय बताया। उन्होंने कहा कि प्रतिदिन कुछ देर एकांत में आंखें बंद कर के बैठें और अपने मन पर नज़र रखें। इस दौरान हम पाएंगे कि हमारा मन तरह-तरह की चिंताओं जैसे, बच्चे, परिवार, पैसे आदि की तरफ भागता है। इन चिंताओं से अचिंत करने का मार्ग हमें संत सिखाते हैं।

 

संत हमें संसार में रहते हुए संसार से मुक्त करा देना चाहता है। भैयाजी ने कहा - जिस तरह जल मुर्गाबी पक्षी जब उड़ता है तो उस पर पानी की बूंद तक नहीं लगती,  ठीक उसी प्रकार संसार में सारे कार्य करते हुए,  बिना उसके प्रभाव लिए हुए हम इस दुनिया से मुक्त हो सकते हैं।

 


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इस दुनिया की हर चीज़ नश्वर है। दुकान, मकान, आश्रम इत्यादि सब एक दिन खत्म हो जाएंगें परंतु गुरू द्वारा दिया हुआ नाम कभी नहीं मिटता। सुख और दुःख दोनों ही हमारे जीवन में विकास का रास्ता खोलते हैं। दोनों ही हमें कोई न कोई सीख जरूर देते हैं।

 

इसी कारण हमें अपने आप को निमित्त मात्र मानना चाहिए। हम सिर्फ कर्म कर सकते हैं, परिणाम प्रभु के हाथों में होता है। यदि हम कर्ताभाव से सारे कार्य करते रहें तो कई काम हमारे अहंवश बिगड़ भी जाते हैं।

 

अपने गुरु स्वामी दिव्यानंद जी महाराज को याद करते हुए भैयाजी ने कहा कि स्वामी जी नामदान देते हुए तीन नियम हमेशा बताते थे – पहला शुद्धता का नियम, दूसरा पात्रता का नियम और तीसरा निरंतरता का नियम।

 

भैया जी ने कहा कि अगर हमें अध्यात्म के क्षेत्र में उन्नति करनी है तो हमारा आहार और विचार शुद्ध होने चाहिए। पात्रता का अर्थ है यदि हमें कुछ पाना है तो उसके लिए विनम्रता जरूरी है। इसके साथ साथ हम जो भी करें उसमें निरंतर होना आवश्यक है। हमारे संकल्पों में नियम, संयम, अनुशासन और निरंतरता ही सफलता तक पहुंचाते हैं।

 

संत कहते हैं कि सुबह उठो और प्रयास करो कि पूरा दिन उस गुरू को समर्पित किया जाए। उसकी याद में सारे कार्य किए जाएं। गुरू कहते हैं कि रोज़ हमें उनकी याद में समय देना जरूरी है।

 

विदेश से लौटने के बाद आध्यात्मिक गुरु देवेंद्र मोहन भैयाजी के पीलीभीत, मढ़ीनाथ आश्रम बरेली, बीसलपुर, भोपतपुर, पूरनपुर में हो चुके हैं। बरेली के नवाबगंज में आयोजित छठे सत्संग में मदनलाल मास्टर साहब, सोमपाल मास्टर साहब, श्याम बिहारी जी के साथ महेश भाई और लंगर टीम ने कार्यक्रम को सफल बनाया।   





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