उपचुनाव नहीं वो असली बात जिसके चलते उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत को देना पड़ा आधी रात में


तीरथ सिंह रावत (बाएं), त्रिवेंद्र सिंह रावत (दाएं)

उत्तराखंड को अलग प्रदेश का जितना फायदा नहीं हुआ उससे ज्यादा पन्ने तो उसके सियासी इतिहास का हिस्सा हो गए।


10 मार्च को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री का पद संभालने वाले तीरथ सिंह रावत ने शुक्रवार देर रात मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।


तीन दिन से दिल्ली में डेरा जमाए तीरथ सिंह रावत शुक्रवार दोपहर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से मिले और वहीं उन्हें विधानसभा उप चुनाव में आ रही संवैधानिक अड़चन की जानकारी देते हुए इस्तीफे का फरमान सुना दिया गया। शुक्रवार देर रात देहरादून पहुंच कर तीरथ सिंह रावत राजभवन गए और मुख्यमंत्री पद से इस्‍तीफा राज्यपाल बेबी रानी मौर्य को सौंपा दिया।


अब शनिवार को तीन बजे देहरादून में विधायक दल की बैठक बुलाई गई है जिसमें नए नेता का चुनाव होगा।


पहले त्रिवेंद्र अब तीरथ


इससे पहले मार्च महीने में बेहद सनसनीखेज तरीके से त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दिया था। कुछ वैसी ही कहानी तीरथ के साथ भी हुई। 17 जून को तीरथ सिंह ने अपने कार्यकाल के सौ दिन पूरे किए थे। आपको बताते चलें कि तीरथ सिंह के कार्यकाल में ही अल्मोड़ा की सल्ट विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ था। लेकिन तीरथ ये मौका चूक गए और उन्हें चुनाव ना लड़ पाने के चलते इस्तीफा सौंपना पड़ा।


बीजेपी के मुताबिक संवैधानिक अड़चन


इससे पहले रामनगर में तीन दिन बीजेपी का चिंतन शिविर चला। फिर अचानक तीरथ को दिल्ली तलब किया गया। बुधवार दोपहर दिल्ली पहुंचे तीरथ की आधी रात में गृह मंत्री अमित शाह और फिर जेपी नड्डा से मुलाकात हुई। इसके बाद तीरथ अपने दिल्ली स्थित आवास चले गए। इस बीच पार्टी की तरफ गुरुवार को उन्हें दिल्ली में रुकने का आदेश हुआ फिर शुक्रवार को दोपहर करीब एक बजे तीरथ सिंह रावत जेपी नड्डा से मिलने पहुंचे। यहां लगभग आधा घंटे चली मुलाकात के दौरान उन्हें जानकारी दी गई कि उप चुनाव पर निर्वाचन आयोग की रोक के कारण उन्हें पद छोड़ना होगा। इस पर तीरथ ने पार्टी अध्यक्ष को अपने इस्तीफे की पेशकश संबंधी पत्र सौंप दिया।


तीरथ को पता था अपना भविष्य


तीरथ सिंह ने बीते दिनों एक सवाल के जवाब में कहा था कि वह संसद के आगामी सत्र में पूरे समय हिस्सा लेने के लिए दिल्ली में रहेंगे। तीरथ सिंह रावत पौड़ी गढ़वाल सीट से सांसद हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने लोकसभा की सदस्यता नहीं छोड़ी थी और ऐसा माना जा रहा था कि उपचुनाव होने की स्थिति में वो लोकसभा से इस्तीफ दे देंगे।


विधायक दल की बैठक आहूत


तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री पद संभालने के छह महीने के अंदर विधानसभा सदस्य बनना था। यह अवधि नौ सितंबर को पूरी हो रही है। पद पर बने रहने के लिए 10 सितंबर तक उनका विधानसभा सदस्य निर्वाचित होना जरूरी था। गंगोत्री सीट भाजपा विधायक गोपाल रावत के निधन से रिक्त हुई, लिहाजा उनके यहीं से उप चुनाव लडऩे की संभावना थी। प्रदेश में फिलहाल विधानसभा की दो सीटें, गंगोत्री और हल्द्वानी रिक्त हैं जहां उपचुनाव कराया जाना है। चूंकि राज्य में अगले ही साल फरवरी-मार्च में विधानसभा चुनाव होना प्रस्तावित है और इसमें साल भर से कम समय बचा है। ऐसे में लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 151 ए के तहत अब इस स्थिति में उप-चुनाव नहीं हो सकता है।


विधायक दल का नया नेता चुनने के लिए भाजपा विधायक दल की बैठक में पार्टी के वरिष्ठ नेता व केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर केंद्रीय पर्यवेक्षक के रूप में मौजूद रहेंगे। प्रदेश प्रभारी दुष्यंत कुमार गौतम व रेखा वर्मा भी इस मौके पर मौजूद रहेंगे।


सीएम बनने वाले पांचवें सांसद थे तीरथ


आपको बता दें कि तीरथ रावत से पहले भी चार सांसद उत्तराखंड के सीएम बन चुके हैं। इनको विधानसभा सदस्य बनने के लिए बाद में उपचुनाव लड़ना पड़ा था। इस परंपरा की शुरुआत 2002 में तत्कालीन सीएम एनडी तिवारी ने की थी।


वह नैनीताल से लोकसभा के सांसद थे। सीएम बनने के बाद उन्होंने रामनगर विधानसभा सीट से उपचुनाव जीता था। इसी तरह पौड़ी गढ़वाल से ही सांसद रह चुके भुवन चंद्र खंडूड़ी राज्य का सीएम बनने के बाद धूमाकोट से विधायक बने।


इसके बाद टिहरी से सांसद विजय बहुगुणा जब कांग्रेस की ओर से सीएम बने तो उन्होंने सितारगंज से विधानसभा का चुनाव जीता था। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत जब सीएम बने तब उन्होंने धारचूला से विधानसभा का चुनाव जीता था। उनके लिए पार्टी के ही विधायक हरीश धामी ने सीट छोड़ी थी।



कैसे और क्यों चूक रही है उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी


आपको ध्यान होगा 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार थी। हरीश रावत से बगावत कर कांग्रेस के दस से ज्यादा विधायक इधर से उधर हो गए। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से हरीश सरकार फिर से बनी लेकिन विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा। तब कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी कांग्रेस को ले डूबी थी अब बागी कांग्रेसी जो बीजेपी में ना सिर्फ शामिल हुए बल्कि वर्तमान में विधायक भी हैं वो लगातार सरकार को अस्थिर कर रहे हैं। बाहर से बीजेपी में शामिल हुए उत्तराखंड के ऐसे ज्यादातर विधायक खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार मान कर चलते हैं। ये भी सच है कि कांग्रेस की तरफ से एनडी तिवारी और बीजेपी की तरफ से भगत सिंह कोश्यारी के अलावा पहाड़ का सर्वमान्य नेता कोई एक नहीं है।


2017 में मुख्यमंत्री बनने के बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने पार्टी की अन्तर्कलह को काफी हद तक थामे रखा था लेकिन बीजेपी केंद्रीय नेतृत्व इस आंकलन में चूक गया कि असल में पहाड़ों पर भूस्खलन कभी भी और कहीं भी हो जाता है। केदारनाथ आपदा के बाद तो उत्तराखंड में सियासी पहाड़ी सुनामी आम बात है। केंद्र को लगा कि उत्तराखंड में डबल इंजन की सरकार में उसका इंजन ज्यादा ताकतवर है लेकिन राज्य की सियासी गुणाभाग में वो यहीं चूक गया। एक रावत हटा कर दूसरा रावत देना और फिर तीरथ सिंह का केंद्र की उम्मीदों पर खरा ना उतरना भी उनके इस्तीफे की प्रमुख वजह रहा।


केंद्रीय नेतृत्व को लगा था कि तीरथ पार्टी,संगठन के पुराने नेता हैं और वो सब थाम लेंगे लेकिन इससे पहले की तीरथ सरकार की कमान सही तरीके से थाम पाते उनके बयान बेलगाम हो गए। फिर स्थिति ऐसी बनी कि तीरथ को जाना पड़ा।


इसके अलावा एक बड़ी समस्या ये भी है कि आम आदमी पार्टी ने चुनाव होने की स्थिति में कर्नल अजय कोठियाल को अपना उम्मीदवार बनाने का ऐलान कर दिया था। सेना और पहाड़ का रिश्ता भी पुराना है। ऐसे में अगर चुनाव होता और नतीजा फंसता तो बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए समस्या पैदा हो जाती। फिलहाल उत्तराखंड के मैदान में कांग्रेस और बीजेपी ही बड़े खिलाड़ी हैं लेकिन आम आदमी पार्टी की वर्तमान दस्तक चुनाव से ठीक छ महीने पहले उत्तराखंड के लोगों को दिशाभ्रम में तो डाल ही देती। शायद ये बात कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही नहीं चाहते हैं।


इस घटनाक्रम के बाद इतना तो साफ है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड ही बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनने जा रहा है। जिस प्रकार झारखंड में पूर्ण बहुमत की बीजेपी सरकार को रघुवर दास वापसी कराने में नाकाम रहे और उधर हरियाणा में खट्टर को साझे की सरकार चलाने पर मजबूर होना पड़ा उसी तरह उत्तराखंड भी फिलहाल बीजेपी के हाथ से फिसलता दिख रहा है।



अब तक बनाए गए मुख्यमंत्री

नित्यानंद स्वामी                    09 नवंबर 2000 से 29 अक्तूबर 2001
भगत सिंह कोश्यारी              30 अक्तूबर 2001 से 01 मार्च 2002
एनडी तिवारी                       02 मार्च 2002 से 07 मार्च 2007
भुवन चंद्र खंडूरी                   08 मार्च 2007 से 23 जून 2009 (11 सितंबर 2011 से 13 मार्च 2012 में भी रहे)
रमेश पोखरियाल निंशक        24 जून 2009 से 10 सितंबर 2011        
विजय बहुगुणा                     13 मार्च 2012 से 31 जनवरी 2014
हरीश रावत                         1 फरवरी 2014 से 27 मार्च 2016 / 21 अप्रैल 2016 से 22 अप्रैल 2016 / 11 मई 2016 से 18 मार्च 2017
त्रिवेंद्र सिंह रावत                 18 मार्च 2017 से 09 मार्च 2021
तीरथ सिंह रावत                10 मार्च 2021(मुख्यमंत्री पद की शपथ ली)



टीम स्टेट टुडे